गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

दास्तान-ए-दर्द नि:संग ललद्यय की!

14वीं सदी के जिस ललद्यय की दास्तान-ए-दर्द को आपसे साझा करने जा रहा हूं, वैसी ही कई ललद्यय आज भी हमारे समाज में है,जो ना जाने कितनी तसद्दुद को ख़ामोशी से सहती हैं। महिलाओं के प्रति हमारा समाज, तब और आज में सिर्फ़ ‘सदी’ में ही बदला है। मैं ऐसा क्यूं कह रहा है, जब आप पूरी कहानी को पढ़ेंगे तो पता चल जाएगा। कश्मीर के इतिहास में एक तरफ़ ललद्यय की मूर्तिपूजा, ब्राह्ममणवाद को लेकर मुखर विरोध दर्ज हैं, तो वहीं दूसरी तरफ़ उन्होंने ख़ुद अपनी रचनाओं के माध्यम से तब के समय में महिलाओं की स्थिति को कलमबन्द किया है।
ललद्यय को लल और पद्मावती के नाम से भी जाना गया। इसलिए मैं भी आगे लल शब्द का ही इस्तेमाल कर रहा हूँ। लल की जन्म स्थान को लेकर दो मत हैं। पहला है पाम्पोर के निकट सिम्पोर और दूसरा है श्रीनगर से 3 मील दूर पानद्रेठन की,जो अब श्रीनगर का हिस्सा है। ऐसे ही जन्म साल को लेकर भी दो मत है। पहला है 1317-1320 के बीच तो दूसरा है 1335। लल का जन्म एक ब्राह्ममण परिवार में हुआ था। 12 साल की उम्र में उनकी शादी पाम्पोर के निक्क भट्ट हुई। शादी के बाद कश्मीर की तत्कालीन पम्परा के अनुसार उनका नाम बदलकर पद्मावती कर दिया गया है। यहां मैं एक बात बता रहा हूं कि लल की शादी के बाद से उनकी ज़िन्दगी की बहुत सारी कहानियां है,लेकिन मैं यहां सिर्फ़ उसी कहानी की बात करूंगा जो तब था और आज भी मौज़ूद है।
शादी के कुछ दिनों बाद ही निक्क और लल की विवाह-विच्छेद हो जाता है। जियालाल कौल से लेकर प्रेमनाथ बज़ाज़ तक, विवाह-विच्छेद का कारण लल की सेक्स में अरूचि को लेकर मानते हैं। सेक्स में अरूचि होने की वजह लल की धार्मिक आस्थाओं में रूचि को बताते हैं। अब यहां आप ख़ुद से सवाल कीजिए कि वर्तमान में हमारा समाज कितना बदल गया है। क्या किसी लड़की के माता-पिता पहली नज़र में अपनी बेटी की शादी के लिए उससे राय लेने लगे हैं? क्या क़ानून बना देने से कम उम्र में लड़कियों की शादी होने बन्द हो गये हैं? या फिर आप इस बात से संतुष्ट हो गए हैं कि ऐसा करना अब तो अपराध की श्रेणी में आता है।जो भी ऐसा करेगा उसको तो सज़ा होगी हीं?
अब आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि ससुराल में उनके साथ व्यवहार होता है। लल की सास बहुत क्रूर थी और उनके साथ मिलकर उनका पति भी लल पर ज़ुल्म करता था। लल की सास थाली में पत्थर रख उसे चावल से ढंक देती थी। उस थोड़े से चावल को ही खाकर लल पूरे दिन काम मे लगी रहती थी। एक बार लल के ससुराल में ग्रहशान्ति का अनुष्ठान हुआ। लल जब पानी भरने गई तो उनकी सखियों ने छेड़ते हुए कहा कि आज तो तुझे खाने के लिए पकवान मिलेगा। इस पर लल ने कहा- ‘हौंड मांरितन किन लठ, ललि नीलवठ चलि न जांह’ मतलब ये हुआ कि घर में चाहे भेड़ कटे या बकरा, लला के भाग्य में तो पत्थर ही लिखा है। लल सुबह पानी भरने जल्दी निकलती और रास्ते में कहीं एकान्त में बैठकर साधना करने लगती और जब घर लौटती तो सास ताने देती कि वो प्रेमी से मिलकर आ रही है। ऐसे ही एक दिन सास के उकसाने पर पति ने पानी लेकर लौटी लल के घड़े पर लाठी से प्रहार कर दिया। मिट्टी का घड़ा तो टूट गया, लेकिन पानी ज्यों का त्यों रह गया। ज़रूरत का पानी लेकर उन्होंने जो पानी फेंक दिया,उससे एक जलकुण्ड बन गया, जो ललत्राग के नाम से जाना गया। दूर-दूर तक इस घटना का प्रचार हो गया, जिससे लोग मिलने आने लगे। इसी समय उन्होंने घर छोड़ने का निर्णय लिया। संन्यासिनी बन गई और विवस्त्र होकर सड़कों पर घूमने लगी। बाद में उन्होंने अपने नैहर का नाम अपना लिया।
इसके बाद लल ने समाज में स्त्रियों की स्थिति और परिवार में उत्पीड़न को लेकर कविताएं लिखी, जो वाख कही जाती है। नि:सग हुई लल को दैवी स्त्री-सा सम्मान तो मिला, लेकिन वाख में उन्होंने जो लिखा आज भी उसको समाज में देखा जा सकता है। अब उनके कुछ वाख को आप के साथ साझा कर रहा हूँ। एक बार उन्होंने लिखा कि “न ज़ायस त न प्यायास, न खेयम हन्द त न शोंठ” इसका मतलब ये है कि न गर्भिणी हुई,न प्रसूता और न प्रसूता का आहार ही किया। आप इसको कैसे देख रहे हैं? विरक्ति के रूप में या टीस के रूप में। एक दूसरे वाख में उन्होंने लिखा कि ‘काठ के धनुष के लिए बाण मिला तो घास का,राजमहल के लिए बढ़ई मिला तो वह निपट मूर्ख। मेरी स्थिति बीच बाज़ार में ताला रहित दुकान सी हो गई है। देह मेरी तीर्थ विहीन हो रही है। मेरी यह विवशता को भला कौन जान सकता है।‘
लल एक वाख में कहती हैं- एक से हैं मेरे लिए ज़िन्दगी और मौत, ज़िन्दगी में भी खुश और मौत में भी, न मुझे किसी का शोक न मेरे लिए शोकग्रस्त। यह नि:संगता दु:ख की कड़वी चाशनी में घुली है।
एक पितृसत्तात्मक समाज में देह पर तो स्त्री का अधिकार तो दूर की बात है, प्रेम भी अत्याचार सा लगची है, और उससे पैदा हुई अरुचि जब बाक़ी उत्पीड़नों के साथ मिलती है तो, आज भी कई लल हैं जिनको घर छोड़ना ही मुक्ति लगता है।

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