आदरणीय अखिलेश जी
मैंने ये ख़त इसलिए नहीं लिखा है कि कुछ दिनों पहले आपकी पार्टी के नेता आज़म ख़ान ने जया प्रदा के लिए शर्मसार करने वाले शब्द का इस्तेमाल किया और पार्टी के मुखिया होने नाते आप ने उनपर कोई कार्रवाई क्यूं नहीं की। इसलिए भी नहीं कि आपके कार्रवाई कर देने से आज़म ख़ान की बदज़ुबानी बन्द हो जाएगी। इसलिए भी नहीं कि आज़म ख़ान के बयान पर आप ख़ामोश क्यूं रहें। इसलिए भी नहीं कि आपने जब अपनी ख़ामोशी तोड़ी, तो मीडिया पर आरोप लगाते हुए आज़म ख़ान का बचाव क्यूं किया। इसलिए भी नहीं कि आपने आज़म ख़ान पर होने वाले मौखिक हमले का जवाब देते हुए सियासी नैतिकता का मिसाल क़ायम किया है। हर दल का मुखिया यही करता है जो आप ने अपने नेता के बचाव में किया है। हमारा समाज भी इस बात को अच्छी तरह जानता है। आज़म ख़ान के बयान के बाद सोशल मीडिया पर एक तबके ने आपके जैसा ही मीडिया को दोषी बताते हुए, दूसरे तबके से सवाल करना शुरू कर दिया। सवाल पूछने वाले में आपके समर्थक तो थें ही, कुछ पत्रकार भी शामिल थें। जैसे पत्रकार आशुतोष में रोहित सरदाना से पूछा कि “कठुआ बलात्कार पर मोदी जी ने कुछ बोला क्या?”
अब मैं उन बातों की बात करता हूँ कि आपको मैंने क्यूं ये ख़त लिखा है। अपने सवालों को आपके साथ साझा करने से पहले एक बात साफ़ कर देता हूं कि आपके और आज़म ख़ान के बयान से ये साफ़ हो गया है कि इस विवाद का दोषी मीडिया है। लेकिन सच्चाई ये है कि जनता जान गई है कि बोलते समय नेता कुछ भी बोल देते हैं, और बाद में मीडिया को दोषी ठहरा देते हैं। मीडिया की यही नियती है। ख़ैर अब सवालों की तरफ़ बढ़ रहा हूं। इसमें से कुछ सवाल डिम्पल की बातों से भी है,क्योंकि पीसी में उन्होंने भी इस मसले पर बोला है।
आज़म ख़ान के जिस बयान को ज़्यादातर लोगों को समझ में आया कि उन्होंने जया प्रदा के बारे में ही बोला है, आपने किस आधार पर बीजेपी का ध्यान भटकाने वाला क़दम बताया? आपको और आपकी पार्टी के नेताओं और समर्थकों को छोड़कर,क्या हिन्दुस्तान के सारे लोग ना समझ हैं? कोई भी दल जब सरकार में होता है तो हरसम्भव महिलाओं की सुरक्षा और बेहतरी के लिए काम करता हैं,तो क्या इस आधार पर उस दल के किसी नेता का महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार पर, ये कह कर बात को टाल दिया जा सकता है कि जब वो सरकार में थें तो अमुक-अमुक काम किया था? आज़म ख़ान के बयान एक तरफ़ तो आप कहते हैं कि बीजेपी ध्यान भटकाने में माहिर है, तो वहीं दूसरी तरफ़ आपकी पत्नी डिम्पल कहती हैं कि महिलाओं के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की टिप्पणी करना अच्छी बात नहीं है। आपकी पत्नी डिम्पल ने बुधवार को ये भी कहा कि उनके और प्रियंका गांधी के ख़िलाफ़ टिप्पणी पर मीडिया सवाल नहीं पूछता है। लेकिन जब बीजेपी के नेताओं के ख़िलाफ़ बोला जाता है, तभी ये बात क्यूं उठती है। क्या अब महिलाओं के साथ बदसलूकी और बदज़ुबानी को इस आधार पर देखा जाएगा? डिम्पल को शायद याद नहीं कि दयाशंकर ने मायावती के लिए जब अपशब्द का इस्तेमाल किया था,तो इसी मीडिया ने जिस पर आज वो सवाल खड़ा कर रहीं हैं, कितना दिखाया था और बीजेपी ने क्या कार्रवाई की थी। ख़ैर,डिम्पल भी नेता है वो जानने लगी हैं कि सियासत कैसे की जाती है।
अब मैं इस ख़त का अन्त इस उम्मीद के साथ कर रहा हूं कि यदि आप तक ये पहुंच जाएगा तो, अपने क़ीमती समय में से थोड़ी समय निकाल कर आप मेरे सवालों का जवाब देंगे।
मैंने ये ख़त इसलिए नहीं लिखा है कि कुछ दिनों पहले आपकी पार्टी के नेता आज़म ख़ान ने जया प्रदा के लिए शर्मसार करने वाले शब्द का इस्तेमाल किया और पार्टी के मुखिया होने नाते आप ने उनपर कोई कार्रवाई क्यूं नहीं की। इसलिए भी नहीं कि आपके कार्रवाई कर देने से आज़म ख़ान की बदज़ुबानी बन्द हो जाएगी। इसलिए भी नहीं कि आज़म ख़ान के बयान पर आप ख़ामोश क्यूं रहें। इसलिए भी नहीं कि आपने जब अपनी ख़ामोशी तोड़ी, तो मीडिया पर आरोप लगाते हुए आज़म ख़ान का बचाव क्यूं किया। इसलिए भी नहीं कि आपने आज़म ख़ान पर होने वाले मौखिक हमले का जवाब देते हुए सियासी नैतिकता का मिसाल क़ायम किया है। हर दल का मुखिया यही करता है जो आप ने अपने नेता के बचाव में किया है। हमारा समाज भी इस बात को अच्छी तरह जानता है। आज़म ख़ान के बयान के बाद सोशल मीडिया पर एक तबके ने आपके जैसा ही मीडिया को दोषी बताते हुए, दूसरे तबके से सवाल करना शुरू कर दिया। सवाल पूछने वाले में आपके समर्थक तो थें ही, कुछ पत्रकार भी शामिल थें। जैसे पत्रकार आशुतोष में रोहित सरदाना से पूछा कि “कठुआ बलात्कार पर मोदी जी ने कुछ बोला क्या?”
अब मैं उन बातों की बात करता हूँ कि आपको मैंने क्यूं ये ख़त लिखा है। अपने सवालों को आपके साथ साझा करने से पहले एक बात साफ़ कर देता हूं कि आपके और आज़म ख़ान के बयान से ये साफ़ हो गया है कि इस विवाद का दोषी मीडिया है। लेकिन सच्चाई ये है कि जनता जान गई है कि बोलते समय नेता कुछ भी बोल देते हैं, और बाद में मीडिया को दोषी ठहरा देते हैं। मीडिया की यही नियती है। ख़ैर अब सवालों की तरफ़ बढ़ रहा हूं। इसमें से कुछ सवाल डिम्पल की बातों से भी है,क्योंकि पीसी में उन्होंने भी इस मसले पर बोला है।
आज़म ख़ान के जिस बयान को ज़्यादातर लोगों को समझ में आया कि उन्होंने जया प्रदा के बारे में ही बोला है, आपने किस आधार पर बीजेपी का ध्यान भटकाने वाला क़दम बताया? आपको और आपकी पार्टी के नेताओं और समर्थकों को छोड़कर,क्या हिन्दुस्तान के सारे लोग ना समझ हैं? कोई भी दल जब सरकार में होता है तो हरसम्भव महिलाओं की सुरक्षा और बेहतरी के लिए काम करता हैं,तो क्या इस आधार पर उस दल के किसी नेता का महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार पर, ये कह कर बात को टाल दिया जा सकता है कि जब वो सरकार में थें तो अमुक-अमुक काम किया था? आज़म ख़ान के बयान एक तरफ़ तो आप कहते हैं कि बीजेपी ध्यान भटकाने में माहिर है, तो वहीं दूसरी तरफ़ आपकी पत्नी डिम्पल कहती हैं कि महिलाओं के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की टिप्पणी करना अच्छी बात नहीं है। आपकी पत्नी डिम्पल ने बुधवार को ये भी कहा कि उनके और प्रियंका गांधी के ख़िलाफ़ टिप्पणी पर मीडिया सवाल नहीं पूछता है। लेकिन जब बीजेपी के नेताओं के ख़िलाफ़ बोला जाता है, तभी ये बात क्यूं उठती है। क्या अब महिलाओं के साथ बदसलूकी और बदज़ुबानी को इस आधार पर देखा जाएगा? डिम्पल को शायद याद नहीं कि दयाशंकर ने मायावती के लिए जब अपशब्द का इस्तेमाल किया था,तो इसी मीडिया ने जिस पर आज वो सवाल खड़ा कर रहीं हैं, कितना दिखाया था और बीजेपी ने क्या कार्रवाई की थी। ख़ैर,डिम्पल भी नेता है वो जानने लगी हैं कि सियासत कैसे की जाती है।
अब मैं इस ख़त का अन्त इस उम्मीद के साथ कर रहा हूं कि यदि आप तक ये पहुंच जाएगा तो, अपने क़ीमती समय में से थोड़ी समय निकाल कर आप मेरे सवालों का जवाब देंगे।
आपका अनुज
आदित्य शुभम्
आदित्य शुभम्
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