मोदी सरकार द्वारा ग़रीब सवर्णों को 10% आरक्षण के प्रावधान के बाद से उत्तर भारत की राजनीति और क्षेत्रीय किन्तु ख़ुद को राष्ट्रीय कहने वाले पत्रकारीय संस्थानों के पत्रकारों में बेचैनी का माहौल है। क्योंकि आज़ादी के बाद से ग़रीब सवर्णों के आरक्षण के प्रावधान से पहले तक जाति के नाम पर वो सियासत के जिस सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा थे,उसको झटका लगा है। ख़ैर राजनीतिक दल 'लेकिन' शब्द का इस्तेमाल कर अपने-अपने वोट बैंक के हिसाब से ग़रीब सवर्णों के आरक्षण पर बोल रहे हैं। कमोबेश नेताओं जैसी ही हालत पत्रकारों की भी है। ये बात दीगर है कि पत्रकारों को पत्रकारिता के नाम पर, ना तो उसके कार्यशैली पर सवाल उठाना पसन्द है और ना ही उनसे सवाल पूछना। क्योंकि वो ख़ुद को सर्वज्ञानी और सर्वोपरि समझने लगे हैं।
आरक्षण पर चर्चा के इस दौर में मैंने भी दो चर्चा का हिस्सा बना। पहली चर्चा क़रीब दस-साला अनुभवी दो पत्रकारों से और दूसरी चर्चा तीन-साला अनुभवी एक पत्रकार से। एक के बाद एक, दोनों चर्चा को आप के साथ साझा कर रहा हूँ।
आरक्षण पर चर्चा के इस दौर में मैंने भी दो चर्चा का हिस्सा बना। पहली चर्चा क़रीब दस-साला अनुभवी दो पत्रकारों से और दूसरी चर्चा तीन-साला अनुभवी एक पत्रकार से। एक के बाद एक, दोनों चर्चा को आप के साथ साझा कर रहा हूँ।
पहली चर्चा-
सवर्णों को आरक्षण के प्रावधान पर चर्चा होते-होते, चर्चा इस सवाल पर पहुँच गई कि हरिजनों का उत्थान कैसे होगा? वो कौन-कौन से बिन्दु हैं,जिससे समाज में समानता आएगी? पूरी चर्चा के दौरान मेरा ज़ोर हरिजनों को शिक्षित किया जाना चाहिए,इस बात पर रहा। इसके अलावा मैंने किसी बिन्दु पर चर्चा नहीं की। क्योंकि मेरा माना है कि शिक्षा ही एक मात्र उपाय है,समाज में समानता लाने का। मैंने अपनी सारी दलील दस-साला अनुभवी दोनों पत्रकारों के सामने शिक्षा के इर्द-गिर्द दी। लेकिन दोनों पत्रकारों की नज़र में समाज में समानता लाने का एकमात्र और अन्तिम उपाय 'अन्तरजातीय विवाह ' है।
सवर्णों को आरक्षण के प्रावधान पर चर्चा होते-होते, चर्चा इस सवाल पर पहुँच गई कि हरिजनों का उत्थान कैसे होगा? वो कौन-कौन से बिन्दु हैं,जिससे समाज में समानता आएगी? पूरी चर्चा के दौरान मेरा ज़ोर हरिजनों को शिक्षित किया जाना चाहिए,इस बात पर रहा। इसके अलावा मैंने किसी बिन्दु पर चर्चा नहीं की। क्योंकि मेरा माना है कि शिक्षा ही एक मात्र उपाय है,समाज में समानता लाने का। मैंने अपनी सारी दलील दस-साला अनुभवी दोनों पत्रकारों के सामने शिक्षा के इर्द-गिर्द दी। लेकिन दोनों पत्रकारों की नज़र में समाज में समानता लाने का एकमात्र और अन्तिम उपाय 'अन्तरजातीय विवाह ' है।
दूसरी चर्चा-
आज दोपहर में भोजन के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार से मैं चर्चा कर रहा था कि उत्तर भारतीय लेखकों और दक्षिण भारतीय लेखकों में क्या अन्तर है। उदारहण के रुप मैं बता रहा था कि जाति को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के लेखकों में क्या भिन्नता है। लेकिन तपाक से एक युवा पत्रकार ने वही कहा जो दस-साला अनुभवी दोनों पत्रकारों ने कहा था। युवा पत्रकार भी अन्तरजातीय विवाह का पैरोकार थे। फिर मेरी बहस शुरू हो गई। मैंने कहा कि अन्तरजातीय विवाह समाज में समानता लाने के लिए 'दूर की कौड़ी' जैसा है। मैंने बहुत सारी दलीलें इस सन्दर्भ में दी कि अन्तरजातीय विवाह समाज में समानता लाने का उपाय नहीं हो सकता है। लेकिन युवा पत्रकार भी मेरी बात को मानने को राज़ी नहीं हुए।
आज दोपहर में भोजन के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार से मैं चर्चा कर रहा था कि उत्तर भारतीय लेखकों और दक्षिण भारतीय लेखकों में क्या अन्तर है। उदारहण के रुप मैं बता रहा था कि जाति को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के लेखकों में क्या भिन्नता है। लेकिन तपाक से एक युवा पत्रकार ने वही कहा जो दस-साला अनुभवी दोनों पत्रकारों ने कहा था। युवा पत्रकार भी अन्तरजातीय विवाह का पैरोकार थे। फिर मेरी बहस शुरू हो गई। मैंने कहा कि अन्तरजातीय विवाह समाज में समानता लाने के लिए 'दूर की कौड़ी' जैसा है। मैंने बहुत सारी दलीलें इस सन्दर्भ में दी कि अन्तरजातीय विवाह समाज में समानता लाने का उपाय नहीं हो सकता है। लेकिन युवा पत्रकार भी मेरी बात को मानने को राज़ी नहीं हुए।
अब आपसे भी सवाल है कि क्या आपको भी लगता है कि समाज में समानता लाने का एकमात्र और अन्तिम उपाय 'अन्तरजातीय विवाह ' है? क्या शिक्षा से समाज में समानता नहीं आएगी?
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