शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

अस्पताल के कर्मचारियों को अपने भीतर की मानवता को बचाए रखना चाहिए!

अभी कुछ दिन पहले भिवाड़ी,राजस्थान में एक बच्चों के अस्पताल जाना हुआ था। अस्पताल का नाम नहीं लिखूंगा क्योंकि मेरा मक़सद हॉस्पिटल को बदनाम करने का नहीं है। मेरा मक़सद है कि मैंने जो अस्पताल में उपचार की व्यवस्था और मरीज़ के परिजनों से अस्पताल के कर्मचारियों द्वारा किए उस व्यवहार को लिखूं, ताकि अस्पताल में काम करने वाला कोई भी शख़्स पढ़े तो ध्यान रखे कि अस्पताल में वो किसी व्यवसायी नहीं बल्कि जीवन रक्षक के रूप में काम कर रहा है। अस्पताल में काम करने वाले हरेक कर्मचारियों को हर स्तर पर ज़्यादा से ज़्यादा नैतिकता का पालन करने की कोशिश करनी चाहिए। नैतिकतापूर्ण सेवा उनका धर्म है और मरीज़ के परिजनों से हर स्तर पर संवाद करना उनका परम कर्तव्य है। हर परिजन समय-समय पर यह जानना चाहता है कि जिसका इलाज वो करवा रहा है, उसकी स्थिति कैसी है। स्थिर है या सुधार हो रहा है। मरीज़ की हालात को परिजनों को समय-समय पर बताना चाहिए।

मैंने जो देखा उसको लिखने से पहले एक बात साफ़ कर दे रहा हूँ कि बहुत सारे ऐसे हॉस्पिटल भी हैं जो मरीज़ के परिजनों को समय-समय पर मरीज़ की स्थिति बताते हैं। जिस अस्पताल के बारे में मैं यहां ज़िक्र कर रहा हूँ,उस अस्पताल में सबसे ग़लत बात जो है,वो है रिकॉर्ड मेंटेन रखने के नाम पर जांच रिपोर्ट्स को अपने क़ब्ज़े में रखना। किसी भी हस्पताल में ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए कि मरीज़ का परिजन जब भी चाहे, बिना किसी रोक-टोक के जांच रिपोर्ट्स को एक्सेस कर सके। रिपोर्ट को दिखाकर किसी अन्य डॉक्टर से भी सलाह ले सके। 

यहां पर मैं जिस अस्पताल की बात कर रहा हूँ, उससे जुड़ी दो बातें हैं जिसकी वज्ह से मैंने शीर्षक दिया है ‘अस्पताल के कर्मचारियों को अपने भीतर की मानवता को बचाए रखना चाहिए!’
जब मैं अस्पताल गया था तो सुब्ह से लेकर शाम तक वहां रहना हुआ था। इस दौरान वहां मौजूद लोगों से मैंने अलग-अलग बिन्दुओं पर बात की। बात के दरमियान एक व्यक्ति ने जिस घटना का ज़िक्र किया उसने मुझे भीतर से झकझोर दिया। व्यक्ति ने बताया कि 4 दिन से अस्पताल में इलाज करवा रहे बच्चे को एक दिन सुब्ह में ही चार बजे, जब उजाला भी नहीं हुआ था अस्पताल के कर्मचारियों ने ले जाने को कहा दिया। फिर वहां मौजूद मेरे रिश्तेदार और अन्य लोगों ने अस्पतालकर्मियों के इस व्यवहार से नाराज़गी ज़ाहिर की। फिर बाद मे क़रीब सुब्ह 6 बजे बच्चे को उसके परिजन दूसरे अस्पताल में लेकर चले गए। बाद में मैंने अपने रिश्तेदार से उस ऑटोचालक का मोबाइल नम्बर लेकर घटना के बारे में विस्तार से बात की। बिहार के भागलपुर के रहने वाले मनु ने मुझसे बताया कि 10 दिन के उनके लड़के की अचानक से तबीयत बिगड़ गई,जिसे बाद उन्होंने इस हस्पताल में अपने बच्चे को भर्ती कराया। भर्ती करने के बाद मनु को बताया गया कि उनके बच्चे का इलाज जिस मशीन से हो रहा है उसके प्रति दिन का चार्ज 3500 रुपये है, दवाई अलग से ख़रीद कर देना होगा। बच्चा 2 दिन में ठीक हो जाएगा। 2 दिन इलाज कराने के बाद मनु ने जब बच्चे की स्थिती के बारे में पूछा तो, अस्पताल के स्टाफ़ ने कहा कि दो दिन तक अभी कुछ नहीं कह सकते हैं और अब बच्चे दो दिन एक दूसरी मशीन पर रखनी पड़ेगी, जिसका चार्ज 5500 रूपये प्रति दिन, दवाई अलग से ख़रीदना पड़ेगा। मनु की आर्थिक स्थिति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब तक हुए इलाज का पैसा, मनु के साले ने दिया था। स्टाफ़ के जवाब से निराश मनु ने निश्चय किया कि वो अपने बच्चे का इलाज अब इस अस्पताल में नहीं करायेंगे। क्योकि दो दिन के इलाज के बाद भी बच्चे की हालत नहीं बता रहे हैं,तो ऐसे में कैसे अपने बच्चे को यहां छोड़ दें। मनु ने बताया कि वो बच्चे को दूसरे अस्पताल ले गयें, जहां दो 2 दिन इलाज होने के बाद उनका बच्चा ठीक हो गया। जिस दूसरे अस्पताल में मनु ले गए थे, वहां मशीन और दवाई का खर्चा 3500 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से लगा। 2 दिन इलाज करने के बाद अस्पताल वालों ने कुछ सावधानी बरतने की बात बताकर बच्चे को घर भेज दिया। मनु ने मुझसे कहा कि अब उनका बच्चा बिल्कुल ठीक है।
दूसरी घटना जिसको मैंने ख़ुद देखा। एक बच्चा जन्म लिया,जिसको सांस की समस्या थी। उसको ‘शीशे’ में रखे पांच मिनट भी नहीं हुए होंगे, पैसे मांगने लगे। बच्चे के परिजन ने कहा कि अभी तो उनके पास उतने पैसे नहीं है जितने वो मांग रहें हैं। स्टाफ़ ने कहा कि पैसे जमा करने होंगे। परिजन ने किसी भी तरह से 2500 रूपये इकट्ठा कर जमा कर दिए। फिर स्टाफ़ ने कहा कि बाक़ी पैसा भी जल्दी जमा करा दो।
  

सोमवार, 17 जून 2019

बिहार की फ़िज़ा में डॉ. हर्षवर्धन की बातें गूंजने की क्या वजह है?

#2019 में #2014 की बात हो रही है। वैसे इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है और ना होनी चाहिए,क्योंकि एक नागरिक के रूप में हम इस रवायत के वाहक हैं। रविवार को मुज़फ़्फ़रपुर,बिहार के #SKMCH में केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री Dr. Harshvardhan बीमार बच्चों का हाल जानने के बाद मीडिया से गुफ़्तगू में जो बात कही, वही बात विपक्षी दलों और आम लोगों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। बात ये है कि 2014 में इसी हस्पताल में 20-22 जून के अपने दौरे के बाद डॉक्टर हर्षवर्धन ने एक ब्लॉग लिखा था। वो आज भी मौजूद है। चाहे तो पढ़ भी सकते हैं।
डॉक्टर हर्षवर्धन ने ब्लॉग के माध्यम से जो कहा था उसकी कुछ ज़रूरी बातें इस प्रकार है-
- #SKMCH में बच्चों के लिए 100 बिस्तर की व्यवस्था की जाएगी।
- मुज़फ़्फ़रपुर और दरभंगा में उच्चस्तरीय रिसर्च सेंटर क़ायम किया जाएगा।
- गया, भागलपुर, बेतिया, पावापुरी और नालन्दा में वायरोलॉजी लैब स्थापित किए जाएंगे।
- सौ फ़ीसद बच्चों का टीकाकरण होना चाहिए,एक भी नहीं छुटना चाहिए।
- मेडिकल कॉलेजों में सीटों की संख्या बढ़ेगी।
                                   क्या आप जानते हैं कि मंत्री जी ने जो-जो बातें कही थी, वो इन पांच सालों में पूरे हो गये? शायद नहीं। मेरे ख़याल में इसकी एक मात्र वजह है कि लोगों का सियासत का शिकार हो जाना। ये बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि रिसर्च के दौरान मैंने कहीं नहीं पाया कि मंत्री जी ने जो वादे किए थे,उसको लेकर सालभर,दो साल या तीन बाद भी इब्तिदा ना होने की वजह से लोग एहतेजाज के लिए अपने घरों से बाहर आए थे। हमारे मुल्क में ऐसी रवायत है कि एक मंत्रालय में शायद ही कोई मंत्री पांच साल बिताता होगा और अपने दृष्टिकोण के आधार पर काम कर पाता होगा, अपवाद को छोड़ दीजिएगा। यहां एक बात जोड़ना चाहता हूं कि पीएम Narendra Modi ने 2014 लोकसभा चुनाव प्रचार के दरमियान कहा था कि यदि हमारी सरकार बनेगी तो हमारे काम करने का तरीक़ा अलग होगा। वज़ारत तब्दीली की व्यवस्था केन्द्र और राज्य दोनों में है। इसके कारण क्या हैं,ये अलग चर्चा का विषय है। तो इसी व्यवस्था का शिकार हुए थे डॉक्टर हर्षवर्धन। दौरे के बाद उनका मंत्रालय बदल गया था और जेपी नड्डा को हमारे मुल्क के स्वास्थ्य विभाग की ज़िम्मावारी सौंपी गई थी। नड्डा जी ने एक स्वास्थय मंत्री होने के नाते, डॉक्टर हर्षवर्धन के वादों का कहीं ज़िक्र किया ऐसा कहीं पढ़ने को नहीं मिला। आप भी 2014 से अबतक #NEWINDIA की बातों में खोये रहें और #NEWINDIA का सपना दिखाने वाली हमारी सरकार भी। नतीजा ये हुआ कि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ 'चमकी' बुखार से अबतक सौ से ज़्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। 2014 में 139 बच्चों की मौत हुई थी। अब मैं यहां ये कहना चाहता हूँ कि एक ज़िम्मावार नागरिक बनिए, सियासत को किनारे रखिए। वरना बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बच्चे मरते रहेंगे,और नेताओं के भी रस्मी दौरे चलते रहेंगे। इसलिए रस्मी दौरों और बातों के चक्कर में अब से भी ना पड़िए, अपने विधायक, सांसद और मंत्रियों से अपनी बुनियादी ज़रूरतों की पूरा करने की मांग पर अड़े रहिए।

शनिवार, 15 जून 2019

‘फूट डालो और शासन करो’




पैट्रिक फ़ैंच  की किताब – आज़ादी या मौत

 

- वायसराय लॉर्ड रीडिंग को इस बात का एहसास था कि अगर ‘फूट डालो और शासन करो’ वाली नीति अपनाई गई तो भविष्य में इसके दुष्परिणाम भुगतने होंगे। 1924 में उसने भारत के राज्य सचिव से कहा था कि ‘हिन्दू-मुसलमान विवाद देश की शान्ति के लिए बड़ा ख़तरा है,लेकिन कुछ अंग्रेज़ो का मानना था कि हम इस बात का फ़ायदा उठा सकते हैं, लेकिन उन्हें यह एहसास नहीं हुआ कि अगर दोनों समुदायों में विरोधाभास लगातार बढ़ता रहा और वे इस झगड़े का निबटारा करने में नाकामयाब रहे, तो ऐसी परिस्थिति कितनी घातक हो सकती है।‘
                                                                                                                    (पेज- 51)

जलियावाला बाग़ से सम्बन्धित


पैट्रिक फ़ैंच  की किताब – आज़ादी या मौत
 


1919 में जलियावाला बाग़ में हुए नरसंहार के बाद बापू ने कहा था कि वहां मरने वाले को  किसी भी रूप में शहीद नहीं कहे जा सकते। शहीद वे तब अगर ( जवाब में ) उन्होंने ने अपनी तलवारें म्यान से निकालकर मुक़ाबला किया होता या कम-से-कम लाठी ही चलाई होती या जब डायर पूरी धृष्टता से वहां घूस आया था तो उसके सामने छाती तान कर खड़े हो जाते। उन्हें  जान बचाकर नहीं भागना चाहिए था।                                                                                          ( पेज- 24)

भारत पर आक्रमण से सम्बन्धित


पैट्रिक फ़ैंच  की किताब – आज़ादी या मौत

997 में गजनी महमूद अफ़गानिस्तान के मार्ग से भारत पर चढ़ आया।  गजनी भारत पर आक्रमण करने वाला पहला इस्लामी आक्रमणकारी था, जो अब हिन्दू राष्ट्रभावना मे पिशाच की तरह जाना जाता है। लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने साम्प्रदायिकता की ओर झुके अपने सहयोगियों का ध्यान इस तरफ़ खींचा कि गजनी का महमूद मुसलमान बाद में था, बुनियादी रूप से वो एक योद्घा था। स्वदेशी राजपूतों को हराकर दिल्ली के सुलतानों ने अपना प्रभुत्व स्थापित कर दिया। दक्षिण भारत के साथ लगभग पूर्ण उत्तर भारत में उनका आधिपत्य हो गया। 1856 में मुग़ल साम्राज्य के पूर्ण पतन से पहले उनका वर्चस्व बना ही रहा। चौदहवीं सदी के अन्त में तैमूरलंग दिल्ली में घुसा।उसी के वंशज बाबर ने मुग़ल साम्राज्य की नींव डाली। गोहत्या बन्द करने और ग़ैर-मुसलमानों पर लगे जजिया टैक्स को ख़त्म करने से सोलहवीं शताब्दी के अन्त में अकबर का सम्मान बहुत बढ़ गया। 1658 में औरंगजेब गद्दी पर बैठा। उसने सम्पूर्ण कठोरता  से अपना राज्य विस्तार किया।                                                                                                              ( पेज-6)

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...