रविवार, 24 जून 2018

नाराज़ मत होइए, सियासत में सब कुछ जायज़ मानते हैं नेता!

                                                     फ़ोटो-टाइम्स अॉफ़ इण्डिया
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद के इस👇 बयान से आप नाराज़ हैं? आख़िर क्यों? आज़ाद ने ऐसा नया क्या कह दिया है कि आप नाराज़ होकर अपना खून जला रहें हैं? पहली बार तो है नहीं कि कांग्रेस के किसी नेता ने कश्मीर और सेना को लेकर ग़लत बयान दिया है। कांग्रेस के नेताओं की लम्बी फ़ेहरिस्त है, या यूं कहें कि इनकी आदत पड़ चुकी है ऐसे बयान देते रहने की। शुक्रवार को ही सैफ़ुद्दिन सोज़ ने पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ के बयान को सही ठहराते हुए कश्मीर के आज़ादी की बात कही। 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के बेटे ने तो सेनाध्यक्ष को 'सड़क छाप गूंडा कह दिया था। पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम ने तो कहा कि कश्मीर को और स्वायत्तता देने की ज़रूरत है। कांग्रेस नेताओं के ऐसे तमाम बयान गूगल पड़ मिल जाएंगे। आप उनसे मिल लीजिए जो गुलाम जैसे बयान के 'गुलाम' हैं,वो मस्त है। मोदी-विरोध और दूसरे की मानसिकता के इतने गुलाम हो गये हैं कि वो सही-ग़लत में फ़र्क नहीं कर पा रहें हैं। आज़ाद ने एक न्यूज़ चैनल से बातचीत में जो कहा उसका पूरा तो नही,लेकिन उस हिस्से को मैं शब्दस: यहां लिख रहा हूँ,जिसको लेकर विवाद हुआ है।एंकरों की जमात चीखते-चिल्लाते रहें,लेकिन मूल सवाल को किसी ने नहीं पूछा। आज़ाद ने कहा- '' 4 आतंकी के ख़िलाफ़ एक्शन करते हैं और 20 सिविलियन को 'मार देते हैं।' तो ये इनका एक्शन आतंकियों के ख़िलाफ़ कम होता है सिविलियन के ख़िलाफ़ ज़्यादा होता है।''अब आप यहां गौर कीजिए कि गुलाम ने किस शब्द का प्रयोग किया है। उन्होंने 'मार देते हैं' शब्द का प्रयोग किया है। ये सही है कि नागरिकों की मौतें हुई,जो दुखद तो है।लेकिन ये कहना कैसे उचित है कि सेना नागरिकों को मारती है? क्या आज़ाद और उनके बयान से हां में हां मिलाने वाले इस सवाल का जवाब देंगे? यदि आप में कोई भी आज़ाद के बयान से इत्तेफ़ाक रखता है,तो बताएं कि आज़ाद का बयान कैसे अनुचित नहीं है? आज़ाद ने मुताबिक 4 आतंकी के ख़िलाफ़ एक्शन में 20 सिविलियन को 'मार देते हैं।आज़ाद के बयान को यदि विश्लेषित करें तो 1 आतंकी पर एक्शन से 5 नागरिकों की जान जाती है। इण्डियास्पेण्ड के मुताबिक पिछले तीन साल में 471 आतंकवादियों मारे गये हैं। तो आज़ाद के अनुसार 471x5=2355  नागरिक होना चाहिए।इतने नागरिक की जान तो उस वक़्त भी नहीं गई जब साल 1995 में सबसे ज़्यादा आतंकी घटनाएं हुई।साल 1995 में 5938 आतंकी घटनाएं हुई थी, जिसमें 1031 नागरिकों की मौत हुई थी। इण्डियास्पेण्ड का आंकड़ा बताता है कि 3 साल में 72 नागरिकों की जान गई है।आख़िर आज़ाद नागरिको की मौत को  बढ़ा-चढ़ाकर क्यों पेश कर रहें है? इससे उनका या कांग्रेस का क्या लाभ होगा? कब तक ऐसी सियासत की वजह से कश्मीर को मुद्दा बनाये रखेंगे? सच में यदि नागरिकों की इतनी चिन्ता है,तो क्यों नही पाकिस्तान के ख़िलाफ़ तमाम राजनीतिक दलों को एकजुट कर कार्रवाई करने की बात करते हैं? नागरिक और जवान शहीद होते रहते हैं और उसी बीच में क्यों पाकिस्तान से बात करने का राग अलापते रहते हैं? इतिहास से लेकर वर्तमान तक,कौन सी सरकार ने पाकिस्तान से बात करने की कोशिश नहीं की, लेकिन नतीजा क्या निकला? रोज़ जवान शहीद हो रहें हैं और आम नागरिकों की जान जा रही है।

शनिवार, 9 जून 2018

मनरेगा: मुफाजात के चार साल!


शीर्षक में जो 'मुफाजात' शब्द आप देख रहें हैं, इसका इस्तेमाल हमने वाक्य को जटिल बनाने के लिए नहीं, बल्कि इस शब्द के आसरे मनरेगा की हालत बताना चाहता हूँ। मुफाजात का मतलब आशा के विपरीत होता है।साल 2014 में जब देश ने देश की बागडोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सौंपा तो देश की एक बड़ी आबादी जो गावों में रहती है, में भी उम्मीद जागी, बिल्कुल उसी रूप में जैसे चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में उम्मीद जगाई थी। एक योजना है मनरेगा यानि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना जिसके बारे में आप ने सुना ही होगा। इस योजना को साल 2014 में विश्व बैंक ने ग्रामीण विकास का अनुपम उदारहण करार दिया था। इसी योजना को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'गढ्ढे ख़ोदने' वाली योजना कह कर मज़ाक उड़ाया था ।  फ़रवरी 2015 में संसद में पीएम मोदी ने अपनी राजनीति सूझबूझ की तारीफ़ करते हुए कहा कि 'मेरी राजनीतिक सूझबूझ कहती है कि मनरेगा बन्द मत करो। मैं ऐसी ग़लती नहीं कर सकता हूँ, क्योंकि मनरेगा आपकी(कांग्रेस की) विफ़लता का जीता-जागता स्मारक है।आज़ादी के 60 साल बाद आपको लोगों को गढ्ढे ख़ोदने के लिए भेजना पड़ा। मैं गाजे-बाजे के साथ इस स्मारक का दुनिया में ढोल पीटता रहूंगा।' प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नज़र में जब ये गढ्ढे ख़ोदने वाली योजना थी, तो इसको बन्द क्यों नहीं किया? क्यों सुखा प्रभावित इलाकों में 50 अतिरिक्त दिन काम उपलब्ध कराने का फ़ैसला किया?
मनरेगा अपने अस्तित्व से लेकर वर्तमान में भी ये एक मात्र ऐसी रोज़गार योजना है जिसकी क़ानूनी गारंटी के बाद भी कोई गारंटी नहीं है कि साल में 100 दिन काम मिलेगा ही और 15 दिनों के अन्दर भुगतान हो ही जाएगा।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 2013-14 से 2016-17 तक मज़दूरी भुगतान के लिए बने आधे से कम फ़ण्ड ट्रांसफ़र ऑर्डर(एफटीओ) पर समय से हस्ताक्षर हुए। एफटीओ पर हस्ताक्षर को सरकार मज़दूरों को भुगतान हो जाना मानती है, जबकि हक़ीक़त ये है कि यह प्रक्रिया हो जाने के बाद भी मज़दूरी भुगतान में महीनों लग जाते हैं। 2016-17  में 10 राज्यों में 90 लाख हुए मज़दूरी भुगतान पर स्वतंत्र शोधकर्ताओं ने अध्यन्न में पाया कि केवल 21% मामलों में ही काम करने के 15 दिनों के अन्दर मज़दूर के खाते में मज़दूरी हस्तान्तरित हुई है। दोबारा शोधकर्ताओं ने अप्रैल से सितम्बर 2017 में हुए मज़दूरी भुगतानों में पाया कि केवल 32% मज़दूरों को हीं समय पर मज़दूरी मिली।मज़दूरी में अनियमितता के कई कारण होते हैं।जैसे प्रशासनिक लापरवाही, मज़दूरों के खाते से फर्ज़ी निकासी, आधार सीडिंग और मैनेजमेंट इनफ़ॉर्मेशन सिस्टम के साथ जोड़ने में ग़लतियां वगैरह।
मोदी सरकार के चार साल में मज़दूरों की मज़दूरी समय पर ना मिलने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दो बार सख़्त रूख़ अपनाया। मई 2016 में न्यायमूर्ती एमबी लोकुर और न्यायमूर्ती एनवी रमण के पीठ ने केन्द्र सरकार से राज्यों के मनरेगा के लिए बकाया राशि देने को कहा था। पीठ ने आगे कहा था कि सरकार अपने वित्तीय कमी का रोना रोकर अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह नहीं छिपा सकती है। मई 2018 में भी न्यायमूर्ती एमबी लोकुर और न्यायमूर्ती एनवी रमण की ही पीठ ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार और केन्द्र शासित प्रदेश मिलकर मज़दूरी और बेरोज़गारी भत्ता समय देने की तिथी निर्धारित करें। 
देशभर में मज़दूरों को मज़दूरी और काम मिलने की कहानी बहुत निराश करने वाली हैं, लेकिन फिर आपको कुछ ताज़ा मामला बताना चाहता हूँ। ताकि आपको भी पता चल सके कि मोदी सरकार में कितना बदला मनरेगा की हालत। हिमाचल प्रदेश के बजवाड़ गांव के बुधिया राम को 2017-18 के तहत 138 दिनों की मज़दूरी का डेढ़ साल से इन्तज़ार है।हरियाणा के रोहतक के कारौर गांव में 15 दिन काम करवा कर ठेकेदार ने मज़दूरों को हटा दिया।मज़दूरों का कहना कि ठेकेदार शहर से मज़दूर लाने की बात कर रहा है। छत्तीसगढ़ के बेमेतरा के ग्राम कंतेली में कम मज़दूरी मिलने से मज़दूरों ने पंचायत भवन के सामने प्रदर्शन किया।ऐसी इतनी कहानियां की मैं लिखते-लिखते थक जाऊंगा और आप पढ़ते-पढ़ते।

मंगलवार, 29 मई 2018

दलीलों के भरोसे जारी है तेल का खेल!

अगर आप पेट्रोल-डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों से परेशान है तो आप चुपचाप देशहित में तेल भरवाते रहिए। क्योंकि आजकल सारा काम देशहित में हो रहा है। आप के हंगामा, प्रर्दशन और नारेबाज़ी करने से कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला है। ऐसा सरकार की बातों और रवैये से लगभग स्पस्ट हो चुका है। जब से लोगों ने तेल की लगातार बढ़ती कीमतों पर आवाज़ उठाना शुरू किया है, तब से रोज़ केन्द्र सरकार के मंत्री अलग-अलग बात बोल रहें हैं। जनता इसी में कन्फ़यूज है कि किसकी बात पर भरोसा करें किस की बात पर नहीं। कोई बोल रहा है कि सरकार तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर चिन्तित है।जल्द कोई ना कोई रास्ता निकाल लिया जाएगा। लेकिन ये रास्ता कितनों दिनों में निकलेगा, ये कोई नहीं बता रहा है। कोई सरकार के उस लॉन्ग टर्म सॉल्यूशन की बात कर रहा है, जो चार साल में भी नहीं निकल पाया। पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में लाने की वकालत करने वाले की बात को जीएसटी काउंसिल से जुड़े बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने ख़ारिज कर दिया है।उन्होने साफ़ कर दिया है कि पेट्रोल-डीजल को अभी जीएसटी में लाने का कोई विचार नहीं है। केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और नितिन गडकरी ने तो देशहित की बात कर दी है।भला कौन ऐसा होगा जो देश की विकास में बाधक कहलाना पसंद करेगा? रविशंकर प्रसाद ने कहा कि टैक्स के पैसे से देश में विकास का काम होता है। इसमें नया क्या है ये तो सब जानते हैं। नितिन गडकरी ने कहा है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में सब्सिडी को बढ़ावा देना सरकार की समाज कल्याण योजनाओं को प्रभावित कर सकता है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में सब्सिडी देने के लिए हमें सिंचाई योजनाओं, गावों तक फ़्री एलपीजी देने की उज्जवला योजना, ग्रामीण विद्युतीकरण प्रक्रिया, लोन के लिए मुद्रा योजना और अन्य कई योजनाओं को बन्द करना पड़ेगा। गडकरी ने ये भी कहा कि हम 10 करोड़ परिवारों के लिए स्वास्थय बीमा योजना पर काम कर रहें हैं। फ़सल बीमा योजना पर भी काम चल रहा है। हमारे पास सीमित पैसा है।अगर हमने पेट्रोल-डीजल पर सब्सि़डी दी तो सब गड़बड़ हो जाएगा।नितिन गडकरी के बयान से तो ये साफ़ हो रहा है कि विकास का सारा काम पेट्रोल-डीजल से मिलने वाले टैक्स से हो रहा है।
दरअसल बात ये है कि डीजल-पेट्रोल के रोज़-रोज़ बढ़ते दामों की मार झेल रही जनता के लिए तेल के खेल की प्रक्रिया पहले से ही इतनी जटिल है कि वो या तो समझ नहीं पाती है या फिर उसके पास बैठकर समझने का समय नहीं है। यदि जनता तेल के खेल को समझती तो सरकार से पूछती कि 9 बार एक्सरसाइज ड्यूटी बढ़ाकर,एक बार किस खुशी मे घटाया?अब 25 रूपये तक तेल की कीमतों को सस्ती करने वाली पार्टी कांग्रेस की बात करतें हैं।जब से तेल की कीमतों में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है,तब से विपक्षी दल बड़े-बड़े बयान दे रहें हैं।स्टुडियो में बैठकर कांग्रेस के प्रवक्ता चीख-चीख जनता से अपनी हमदर्दी दिखा रहें हैं।एंकर जब पूछता है कि अभी तक दाम कम क्यों नही किए,तो सवाल को ये कहकर टाल देते हैं कि हम ही सबसे पहले कम करेंगे। लेकिन ये नहीं बताते हैं कि अभी तक क्यों नहीं किए। हक़ीक़त ये है कि अभी जिन राज्यों में इनका शासन है वहां अबतक एक रूपया भी कम नहीं किया है और ना ही कभी इनके शासनकाल में 25 रूपये कम करने का कोई प्रमाण है। सितम्बर 2012 में राष्ट्र को संबोधित करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने डीजल की कीमतों में वृद्धि और सब्सिडी युक्त गैस सीमित किए जाने के फ़ैसले का बचाव करते हुए कहा था कि 'पैसे पेड़ पर नहीं उगते।' 25 रूपये दाम कम करने का फ़ॉर्मूला देने वाले पूर्व वित्तमंत्री पी.चिदम्बरम,जो आग महंगाई को लेकर जनता की दुहाई देेेते फिर रहें हैं। उन्होंने ये कहकर जनता का मज़ाक उड़ाया था कि 'देश के लोग पन्द्रह रूपये का पानी और बीस रूपये का आइसक्रीम खरीदने के लिए तैयार हैं, लेकिन एक रूपये चावल और गेहूं का भाव बढ़ता है, तो बवाल करने लगते हैं।तब बीजेपी नेता शाहनवाज हुसैन ने चिदम्बरम के बयान की निन्दा करते हुए कहा था कि ''जब अमेरिका चश्मे से ग़रीबी की हक़ीक़त समझने की कोशिश की जाएगी तो ऐसी ही बातें कही जाएंगी।" क्या शाहनवाज हुसैन को आज भी ग़रीबों का इतना ख़याल रखते हैं?
चित्र में आज से पांच साल पहले भी 76 के पार पेट्रोल की कीमत थी, लेकिन उस वक़्त शायद जनता को इतना पता नहीं चलता होगा।क्योंकि उस वक़्त की सरकार आपसे तेल पर कम टैक्स लेकर,आपके किसी अन्य टैक्स के पैसे से सब्सिडी देती थी। लेकिन वर्तमान सरकार इसके उल्टा कर रही है। आपसे तेल पर ज़्यादा टैक्स लेकर सब्सिडी कम दे रही है। सब्सिडी के संदर्भ में सरकार का क्या कहना है,ऊपर बता ही दिया हूँ। तो यही है तेल में खेल।


गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

बीजेपी शासित राज्य देश के पिछड़ेपन का कारण है!


नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अमिताभ कान्त ने 'चैलेंज अॉफ़ ट्रांसफ़ॉरमिंग इण्डिया' पर बोलते हुए कहा कि सामाजिक संकेतकों के मामले में बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के कारण भारत पिछड़ा बना हुआ है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया,नई दिल्ली में प्रथम अब्दुल गफ्फार ख़ान स्मारक व्याख्यान के दौरान श्री कान्त ने दक्षिण-पश्चिमी राज्यों की पीठ थपथपाई।कहा कि, दक्षिण-पश्चिम के राज्य बहुत अच्छा कर रहें हैं और तेज़ी से आगे बढ़ रहें हैं।
नीति आयोग को हिंदी में राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान के नाम से जाना जाता है।यह योजना आयोग का परिवर्तित रूप है। इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता हैं।यह सरकार का थिंक टैंक होता है।इसकी ज़िम्मेदारी देश के समग्र विकास के लिए नीतियां बनाकर, क्रियान्वित करना है।इस संस्थान का निर्माण 2015 में हुआ है।
सतत विकास के महत्व पर ज़ोर देते हुए श्री कान्त ने कहा कि देश में शिक्षा और स्वास्थ्य बदहाल स्थिति में है,जिसकी वज़ह से देश पिछड़ रहा है।हमारे सीखने के परिणाम बहुत दुखद है।एक पांचवीं कक्षा का छात्र दूसरी कक्षा के जोड़-घटाव नहीं कर पाता है। पांचवीं कक्षा का छात्र अपनी मातृभाषा तक नहीं पढ़ पाता है। शिशु-मृत्यु दर बहुत ज़्यादा है।ये वो बिन्दु है जिनपर सुधार किए बिना सतत विकास करना बहुत मुश्किल होगा।
वर्तमान में बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शासन में है।एमपी और छत्तीसगढ़ में पिछले 15 साल से बीजेपी की सरकार है।इक्कीसवीं सदी के राजस्थान में 2013 से बीजेपी की सरकार है।इससे पहले 2003-2008 में भी बीजेपी की शासन में थी।जंगल राज के बाद से बिहार में काफ़ी लम्बे अरसे से सरकार की सहयोगी है बीजेपी हैं।2005 के बाद से अबतक के बीच में क़रीब 20 महीने के लिए जदयू का साथ छूटा था।यूपी में बीजेपी को शासन करते हुए मात्र एक साल हुए हैं।

सोमवार, 23 अप्रैल 2018

कांग्रेस की मुख्य न्यायाधीश को हटाने की मुहिम फ़्लॉप!


मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ महाभियोग पर संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्पय,लोकसभा के महासचिव,पूर्व विधि सचिव पीके मल्होत्रा,पूर्व विधाई सचिव संजय सिंह और राज्यसभा सचिवालय के अधिकारियों से माथापच्ची के बाद आज उपराष्ट्रपति ने तकनीकी आधार पर ख़ारिज कर दिया। अब कांग्रेस के पास विकल्प है कि वह सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। गौरतलब है कि शुक्रवार को कांग्रेस समेत सात विपक्षी दलों ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को हटाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 217 के साथ 124(4) के तहत राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति एम वैंकेया नायडू को नोटिस दिया था। कांग्रेस का आरोप था कि चीफ़ जस्टिस मिश्रा, पद का दुरूपयोग कर रहें है और चीफ़ जस्टिस पद की गरिमा को नुक़सान पहुंचा रहें हैं। महाभियोग पर कपिल सिब्बल ने प्रेस कांफ्रेंस कर कहा था  कि 'भारत के मुख्य न्यायाधीश' पद की गरिमा बनी रही, इसलिए हमने महाभियोग प्रस्ताव लाया है। कांग्रेस की पीसी के बाद सोशल मीडिया पर मोदी सरकार और मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के आलोचना की बाढ़ सी आ गई थी। आलोचकों में ज़्यादातर वो लोग थें, जो कांग्रेस की तरह ही सियासी विरोध में संविधान की मर्यादा का ख़याल रखना भुल गये थे। कांग्रेस का तो इतिहास है कि एक व्यक्ति और सत्ता के लिए लोगों के संवैधानिक अधिकार तक को छिन लिया था। न्यायपालिका को किसी हद तक अपने कब्ज़े में कर लिया था। वर्तमान में दु:ख की बात तो ये है कि कांग्रेस पार्टी तो जज लोया की मौत और चार जजों के सहारे राजनीति कर रही है, लेकिन क्या आम लोगों को भी यही करना चाहिए? क़ानून के तमाम जानकारों ने कांग्रेस के इस कदम को पूर्ण रूप से सियासी बताया था और कहा था कि यदि संसद में इस महाभियोग पर कार्यवाही हुई तो न्यायालय से लोगों का भरोसा समाप्त होने लगेगा।यहां तक की कांग्रेस के ही पेेेशे से वकील कई बड़े नेताओं ने इस कदम को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। इसलिए मैंने सोचा कि सोशल मीडिया से इत्तर संविधान या क़ानून के जानकार, कांग्रेस के इस महाभियोग प्रस्ताव पर क्या सोचते हैं, उसको आप तक पहुंचाऊं, ताकि आप सही ग़लत में फ़र्क समझ सके। क्योंकि सोशल मीडिया के युग में सही-ग़लत में फ़र्क करना बेहद मुश्किल हो गया है। इस युग में एक हीं विषय पर घंटों और सालों तक अध्यन करने वाले ख़ुद को एकान्त में पड़ी किसी वस्तु जैसा महसूस कर रहे होंगे।क्योंकि सोशल मीडिया पर हर कोई हर विषय पर एेसे ज्ञानोत्सर्जन कर रहा है,जैसे उस विषय का वह ज्ञाता है।पहले इस कैटेगरी में राजनीतिक दलों के प्रवक्ता आते थें, लेकिन अब तो ख़ुद को पत्रकार कहने वाले युवा भी इस रेस में शामिल हो गयें। मोदी विरोध में वो कब पत्रकार से पक्षकार बन गए, उन्हें ही पता नहीं चला। इसलिए ज़रुरी है किसी अंतिम सत्य तक पहुंचने से पहले ख़ुद भी मेहनत करें और हक़ीक़त जानने की कोशिश करें।
दरअसल इस मामले की शुरुआत 12 जनवरी को 4 जजों के प्रेस कांन्फ्रेंस के बाद हुई।जजों ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर कई आरोप लगायें, जिसमें से एक है जज लोया की संदिग्ध मौत की सुनवाई का और केस के बंटवारे का। जजों की पीसी के बाद विपक्ष को ये एक मुद्दा मिल गया। बजट सत्र के दौरान भी महाभियोग विपक्ष के एजेंडे में था, लेकिन कुछ क्षेत्रिये पार्टियों ने साथ देने से इंकार कर दिया था। इसलिए अब जब सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की मौत को स्वाभाविक बताया, तो कांग्रेस की अगुवाई में सात विपक्षी दलों ने महाभियोग प्रस्ताव लाया। लेकिन इस बार पार्टी टीएमसी और डीएमके का साथ नहीं मिला। मतलब साफ़ है कि फै़सला पसंद नहीं आया तो महाभियोग ले आये। संविधान के जानकार इसे ख़तरनाक बता रहें। इनका कहना है कि यदि इस प्रक्रिया को बढ़ावा दिया गया तो संसद के दोनों सदनों में बहुमत वाली पार्टी जब चाहे किसी भी न्यायधीश को, उसके मन मुताबिक फ़ैसला ना देने पर हटा सकती है। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद या चाहे कोई भी कहे कि इस महाभियोग का जज लोया कि मौत से लेना-देना नहीं है‌। लेकिन आप महाभियोग की कवायद के समय पर गौर कीजिए, मक़सद पता चल जाएगा।
कांग्रेस का इतिहास पहले बता दिया हूं। कपिल सिब्बल का भी महाभियोग से जुड़ा एक इतिहास जान लीजिए। महाभियोग के इतिहास में पहली बार किसी मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ महाभियोग लाया गया,तो आरोपी न्यायाधीश वी राधास्वामी के समर्थन में संसद में घंटों बहस किया था। वी राधास्वामी ने बाद में इस्तिफ़ा दे दिया था। राधास्वामी पर 1991 में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। नियुक्ति में गड़बड़ी की बात संसद भवन तक पहुंच गया था।
महाभियोग पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  ने हस्ताक्षर नहीं किया है‌। कांग्रेस के तरफ़ ये दलील दी गई है कि वो पूर्व पीएम है इसलिए उनको शामिल नहीं किया गया है। अब संविधान के जानकार,कुछ वरिष्ठ वकीलों और यूपीए के कार्यकाल में क़ानून मंत्री रह चुके लोगों की राय बताता हूं कि वो कांग्रेस के इस महाभियोग प्रस्ताव के बारे में उनका क्या कहना था। थोड़ा वक़्त लगा है पढ़ने में थोड़ा और वक़्त लगा दीजिए,क्योंकि मामला न्यायपालिका का है।यदि आप ग़लत सही में फ़र्क नहीं करेंगे और चुपचाप बैठे रहेंगे तो न्यायपालिका की हालत आपातकाल जैसी हो जाएगी,तो न्याय के लिए कहां जाएंगे?
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने कहा था कि महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस राजनीतिक कदम है और  न्यायपालिका और सरकार को शर्मिन्दा करने वाला है।आगे कहा था कि संविधान में अक्षमता और दुर्व्यवहार जैसे अपराधों पर किसी जज को हटाने का प्रावधान तो हैं,लेकिन महाभियोग का नहीं,इसलिए राज्यसभा के सभापति विपक्ष की अर्जी को ख़ारिज भी कर सकते हैं।
वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने कहा था कि कांग्रेस का प्रस्ताव रद्दी का टुकड़ा है।संविधान के ख़िलाफ़ है।ऐसा लगता है कि कांग्रेस के नेताओं को न तो संविधान की जानकारी है।और ना ही वो संविधान को पढ़ने की कोशिश करते हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज एस एन ढींगरा ने कहा कि ये सियासी चाल है।न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश है।कांग्रेस के पास ना तो नम्बर है।और कांग्रेस के तरफ़ से जो प्रस्ताव दिए गए है, वो महाभियोग के दायरे में नहीं आते हैं। इससे चीफ़ जस्टिस पर आंच नहीं आएंगे। कांग्रेस का प्रस्ताव गिर जाएगा लेकिन न्यायपालिका पर जो दाग लगेगा वो दु:ख की बात है। जिस मक़सद के लिए आलोचना की जा रही है, वो ग़लत है। आलोचना न्यायपालिका को बेहतर करने के लिए हो, तो समझ आती है। यहां तो न्यायिक तंत्र की ही आलोचना की जा रही है।
यूपीए सरकार के दो क़ानून मंत्री की राय-
सलमान खुर्शीद ने कहा कि जो भी निर्णय आता है वो अंतिम निर्णय होता है एससी का। आगे उसको चैलेंज करने के लिए और भी कई प्रावधान है।ईमानदारी और विश्वसनीयता पर सवाल करना सही नहीं है। मुझे लगता है कि जो भी वकील होगा ऐसा नहीं करेगा। महाभियोग एक गंभीर मुद्दा है।इसे कोर्ट के किसी फ़ैसले,राय या फ़िर असहमति की वजह से नही लाना चाहिए।
आश्विनी कुमार ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ महाभियोग लाना ठीक नहीं है।ये ना होता तो अच्छा होता। न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव नहीं होना चाहिए।
                                                                        अभिषेक मनु सिंघवी का बयान बड़ा दिलचस्प था।सिंघवी ने कहा कि ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।हम मैं या मेरी पार्टी खुशी या हर्ष से ये नहीं कर रहें  हैं।मैं ख़ुद इसका विरोध कर रहा था,लेकिन पार्टी के वफ़ादार सैनिक होने की वजह से हस्ताक्षर किए हैं।














मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

अब कर्नाटक के सियासत में महंथों की दस्तक!

अगले महीने होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सियासत कर वो रंग अब खुलकर सामने लगा है,जो इससे पहले यहां की सियासत में कभी दिखाई नहीं दिया।विकास के भरोसे राजनीति करने का दम्भ भरने वाली दो बड़ी पार्टियां भगवा के भरोसे अपनी सियासी नैया पार कराने में जुट गई है।भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की सियासी दौड़ जारी है। मठ,मन्दिर और दरगाह सियासत का केन्द्र बन गए हैं।क़ानून की दुहाई देने वाले दोनों बड़ी पार्टी के अध्यक्षों की लगातार धार्मिक स्थानों पर दौरे की ख़बरें आ रही हैं,जो संवैधानिक रूप से ग़लत है।आनेवाले समय में लोकतंत्र के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को चुनाव आयोग कितना अक्षुण्ण रख पाएगी ये तो आनेवाला वक़्त ही बताएगा।जनप्रतिनिधित्व क़ानून 1951 की धारा 13(3) साफ़ कहती है कि कोई भी उम्मीदवार या उसका एजेंट धर्म,जाति,समुदाय या भाषा के आधार पर वोट नहीं मांग सकता।
इन नेताओं के दौरे के बीच,भाषाई भिन्नता होने के कारण बोलते वक़्त में होने वाली गड़बड़िया एक-दूसरे पर हमलावर होेने का मौका दे रही हैं,तो वहीं जनता के लिए हास्य का विषय।लेकिन इन सब के बीच अचानक से एक साथ चार महतों की यहां के सियासत में एंट्री,बीजेपी के लिए कम लेकिन कांग्रेस के लिए ज़्यादा परेशानी का सबब बनता दिखाई दे रहा है।उडुपी से लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी,धारवाड़ से बासवानन्दा स्वामी, मेंगलुरू से राजशेखरनन्दा स्वामी और चित्रदुर्ग से मद्रचेन्नया स्वामी बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। दिलचस्प बात ये है कि इन चारों के निशाने पर कांग्रेस हैं।हालांकि मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने इन सबको टिकट देने को लेकर कोई वादा नहीं किया।ये लोग हमेशा से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काम और नीतियों की भी तारीफ़ करते रहे हैं।इन चारों के अलावा कई और साधु-संतों के भी चुनाव लड़ने के संकेत मिल रहे हैं।साधु-संत भी अब इस बात को समझने लगें हैं जब राजनीति 'धर्म' के इर्द-गिर्द घुमने लगी है तो सियासी इस्तेमाल होने से अच्छा है,ख़ुद क्यों ना नेता बन जाए।इसलिए इतनी बड़ी संख्या में साधु-संतों ने दिलचस्पी दिखाई है।
उडुपी के आठ प्राचीन श्रीकृष्ण मठों में एक शिरूर मठ के मठाधीश लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी ने यहां तक कह दिया है कि उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो निर्दलीय भी लड़ सकते हैं।स्वामी के ऐलान ने राजनेताओं की नीन्द उड़ा दी  है।भाजपा के पूर्व विधायक रघुपति भट के अलावा कई नेता उनका विरोध भी कर रहें है।स्वामी की राजनीति में आने से भक्त खुश हैं।स्वामीजी का कहना है कि वह हिन्दू के पक्षधर हैं।इसका मतलब ये नहीं है कि वहां के ईसाई और मुसलमान मेरी इज्ज़त नहीं करते।सब मुझे बहुत सम्मान देते हैं.जिसकी वजह से मैं लोगों का सेवा करना चाहता हूं।ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जिनके पास विकास की रौशनी तक अभी भी पहुंचना बाकी है।
व्रजदेही मठ के राजशेखरनन्दा स्वामी तो छह बार के विधायक और कर्नाटक सरकार में वन मंत्री रमानाथ के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना चाहते हैं।राजशेखरनन्दा स्वामी बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हैं।इनको भड़काऊ और विवादस्पद भाषण के लिए जाना जाता है।
बात दक्षिण भारत की राजनीति में महंतों की भूमिका की हो रही है तो दक्षिण भारत के ही एक प्रसिद्ध संत की बड़ी दिलचस्प जानकारीआपके साथ साझा कर रहा हूं,जो मुझे शोध के दौरान मिली।ये जानकारी संत माणिक्कवाचकर और आज के साधु-संतो की सियासी सोच में कितना फ़र्क है ये बतायेगा।नौवीं सदी में द.भारत के प्रसिद्ध संत माणिक्कवाचकर पांड्य राजवंश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे।उनमें जब आध्यात्मिकता जगी,तो उन्होंने सबसे पहले प्रधानमंत्री पद का त्याग किया और लिखा-'कटारैयान वेंडेन करपडम इनियुम।'यानि इससे आगे वो चतुर या राजनीतिज्ञों का साथ नहीं चाहते हैं।उनका मानना था कि राजसत्ता और राजनीति के लिए जिस चतुराई की ज़रुरत होती है,वह अध्यामिकता की दुश्मन होती है।आध्यात्मिक साधक की सेवा-भावना को नष्ट करने के लिए सत्ता से जुड़ा ऐश्वर्य और अहंकार पर्याप्त होता है।इसलिए सच्चे संतों और समाज सेवियों ने स्वयं को सत्ता से दूर रखा है। 

मंगलवार, 13 मार्च 2018

कदाचार और भ्रष्टाचार मुक्त परीक्षा की मांग पर अड़े हैं छात्र।

हाथ में तिरंगा झण्डा,'आखें खोलिए मोदी जी,आपका युवा दर-दर की ठोकर खा रहा है' और 'ना मंदिर चाहिए,ना मस्जिद चाहिए,हमें सिर्फ़ नौकरी चाहिए' जैसे लिखित और मौखिक नारों के साथ देश के भविष्य कहे जाने वाले अपने ही भविष्य की लड़ाई लड़ रहें है।कर्मचारी चयन आयोग से लड़ने वाले इन योद्धाओं को लड़ाई में विजय हासिल हो,उसके लिए मेरी शुभकामनाएं।27 फ़रवरी से लगातार प्रदर्शन कर रहे इन अभ्यर्थियों को सरकार की तरफ़ से भी सार्वजनिक रुप से 'स्पेशल थैंक्स' बोला जाना चाहिए,क्योंकि ये 'एक पंथ दो काज' कर रहें हैं।प्रदर्शन कर ये अभ्यर्थी अपने भविष्य की चिन्ता तो जता हीं रहे हैं,साथ हीं सरकार को निन्द से जगा रहे हैं कि उठिये...देखिए,आज़ादी के 70 साल बाद भी हमारे पास ना तो कदाचार मुक्त परीक्षा व्यवस्था है और ना ही भ्रष्टाचार मुक्त संस्थान।
प्रदर्शन कर रहे इन छात्रों के कथित आरोपों के बाद कर्मचारी चयन आयोग में  पुर्ण रुप से आत्मविश्वास की कमी दिखी।जब छात्रों ने आरोप लगाया कि पेपर लीक में एसएससी के अधिकारी और ऑनलाइन परीक्षा संचालन करने वाली एजेंसी भी शामिल है।तब एसएससी ने आरोपों को ख़ारिज कर,छात्रों पर हीं आरोप लगा दिया।आयोग ने बयान जारी कर कहा कि सभी आरोप बेबुनियाद है।हमने अपने आंतरिक सूत्र से आरोपों की जांच की है और पाया है कि आरोप पूरी तरह से शरारतपूर्ण है।छात्रों द्वारा ये कदम बदनियती से और परीक्षा से ध्यान हटाने के लिए उठाया गया।अब आप ही सोचिए कि,क्या कोई भी छात्र ऐसा चाहेगा कि जिसके लिए वो ना जाने कितने मुश्किलों का सामना कर,सालों से परीक्षा की तैयारी कर रहा है और जब परीक्षा का समय आए तो वो शरारत करने लगे,अपवाद की बात नहीं कर रहा हूं।छात्र जब सीबीआई जांच की मांग पर अड़े रहें तो,क्यों आयोग ने छात्रों से मिलकर गहन जांच की बात कही?आयोग क्यों इस बात पर नहीं अड़ा रहा कि हमने कदाचार मुक्त परीक्षा कराई?शायद इसलिए कि एक छात्र के नाम पर क़रीब 750 प्रवेश-पत्र इसी संस्थान द्वारा किया जा सकता है।बयान में आयोग ख़ुद को जितना गंभीर बता रहा है,तो क्यों हर तरह की जांच को पास करने के बाद भी सालों से अभ्यर्थी अपने नियुक्ति पत्र का इन्तज़ार कर रहें हैं?
अब बात करते है कि हमारी सरकारों ने अबतक छात्रों के आन्दोलन को कितनी गम्भीरता से लिया,क्योंकि चुनाव के वक़्त इन लोगों को युवाओं के बेरोज़गारी की चिन्ता बहुत सता रही थी।मुझे सबसे ज़्यादा प्रधानमंत्री की ख़ामोशी हैरान कर रही है कि ऐसा क्या कर दिया है इन छात्रों ने कि पीएम कुछ बोल नहीं रहें है?वो तो देश की युवा शक्ति पर गर्व करते हैं।पीएम की चुप्पी पर कई लोग ये दलील दे रहें है कि हर चीज़ पर बोले तब तो हो गया।मैं ऐसे लोगों से पूछना चाहता हूं कि क्या ऐसी कोई सूची है जिसमें लिखा हो कि पीएम इस मसले पर बोलेंगे,इसपे नही?चुप्पी के मामले में मुख्यमंत्री भी पीछे नहीं है।देश के अलग-अलग राज्यों से युवाओंं की जमात 'दिल्ली चलों' का पालन कर रहा है,लेकिन अरविन्द केजरीवाल को छोड़कर किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने इस मसले पर बोलना उचित नहीं समझा है,शायद इसलिए की ये धार्मिक नही बल्कि रोज़गार का मसला है।जिस देश में एक फ़िल्म को लेकर मीडिया और सियासत में क़रीब तीन महीने तक चर्चा हो जाए।क़रीब-क़रीब आठ से दस राज्यों के मुख्यमंत्री में से कुछ सर्वोच्च न्यायालय पहुंच जाए और उसी देश मेें कदाचार और भ्रष्टाचार को लेकर प्रदर्शन कर रहे युवाओं को नेताओं का सहयोग ना मिले तो क्या ये समझा जाए कि सरकार की नज़र में धार्मिक मसला महत्वपूर्ण है,रोज़गार नहीं?
दिल्ली स्थित एसएससी मुख्यालय के बाहर 27 फ़रवरी से प्रदर्शन शुरु होती है,उसके 5 दिन बाद यानी 4 मार्च को दिल्ली बीजेपी के अध्यझ मनोज तिवारी और सांसद मीनाक्षी लेखी अभ्यर्थियों से मिलने पहुंचते हैं।इन दोनों को किसी और राज्य के सांसदों का साथ नही मिला,जबकि राज्यों के ज़्यादातर सांसद अपने संसदीय क्षेत्र छोड़कर दिल्ली में ही डेरा जमाए रहते हैं।मनोज तिवारी का कार्य सराहनीय रहा,लेकिन अब तक उनका कोई फ़ायदा नही दिख रहा है।तिवारी ने गृहमंत्री राजनाथ सिह,भाजपा अध्यझ अमित शाह और पीएमओ में मंत्री जितेन्द्र सिंह को मिलकर छात्रों की मांग से अवगत कराया।मीनाक्षी लेखी ने वही कहा,जो आज कल चलन में है।जब कोई अपनी मांग को लेकर प्रदर्शन करता है,तो ये बता दिया जाता है कि इसमें बाहरी लोगों का हाथ है।गृहमंत्री द्वारा सीबीआई जांच के आश्वासन के बाद भी आज तक छात्र प्रदर्शन कर रहें हैं,क्योंकि उनको जिस बात का शक था वही हुआ।सीबीआई जांच शुरू हुआ कि नही?यदि जांच शुरू हो गया है,तो जांच कहां तक पहुंची?ऐसे सवालों का सरकार के तरफ़ से कोई जवाब नही दिया जा रहा है।जिससे छात्र आश्वस्त हो सके।







भारत की राज-व्यवस्था

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