सोमवार, 10 जून 2019

आज़ादी से सम्बन्धित।

लेखक व राजनीतिज्ञ एंड्रयू मालरो ने ठीक ही कहा था कि अंग्रेज़ों द्वारा भारत छोड़ने का निर्णय 'शताब्दी की सबसे अहम वास्तविकता थी ' इस क़दम से जार्ज-6 का आधिपत्य रातभर में ही 'तीसरे दर्जे' का रह गया और इससे यह साबित हो गया कि यूरोपीय साम्राज्यवाद अब ज़्यादा समय तक टिक नहीं पाएगा। पेज- परिचय 8

अमेरिका की आज़ादी की लड़ाई का पैट्रिक हैनरी का जुमला- मुझे आज़ादी दो या मौत।
                                                                                                              पेज- परिचय 17




गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

काले झण्डे के समर्थक अबतक ख़ामोश हैं।


हो सकता है आपको याद भी हो, याद नहीं भी है तो इस बात के लिए गूगल कर लीजिए कि साल 2014 से अब तक कितने ऐसे मौक़े आएं जब लिखने और कहने वालों ने काले झण्डे दिखाए जाने को सही माना और कहा कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज़/प्रक्रिया का सम्मान होना चाहिए। कुछ दिनों पहले बिहार के बेगूसराय से काले झण्डे दिखाएं जाने की ख़बर आई थी,तब से लेकर आजतक मैं उन लोगों कि लेखनी और वक्तव्य को ढूंढ रहा हूँ, जो तब लोकतंत्र में काले झण्डे का समर्थन कर रहे थें। जानना चाहता हूं कि इस घटना में उन लोगों ने काले झण्डे का समर्थन किया है या नहीं। यदि मैं बात करूं अपने मित्रों को जो काले झण्डे के समर्थन में इन पांच सालों में अपनी आवाज़ बुलन्द किएं। अब ख़ामोश हैं। कुछ तो ऐसे व्यवहार कर रहें हैं कि उनको पता ही नहीं है कि कन्हैया को काला झण्डा दिखाया गया है।
ख़ैर अब हम मुद्दे पर लौटते हैं। जैसा कि हम सब जानते ही हैं कि बेगूसराय से कन्हैया कुमार चुनाव लड़ रहे हैं। कन्हैया सीपीआई के उम्मीदवार हैं। इनका मुक़ाबला बीजेपी के नेता गिरिराज सिंह और राजद के तनवीर हसन  से हैं। कन्हैया, प्रचार करने बेगूसराय के गढ़पुरा थाना के किसी क्षेत्र में गए थें। रोड-शो में कुछ लोगों ने उनको काले झण्डे दिखाएं, जिसके बाद कन्हैया के कारकूनों( कार्यकर्ताओं) ने लाठी-डंडों से काले झण्डे दिखाने वालों की जमकर पिटाई की। इस दौरान किसी व्यक्ति ने मना किया तो लाठी-डंडे वालों ने मना करने व्यक्ति की उसी के घर में घुसकर पिटाई की। किसी तरह वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने मामले को शान्त किया। अब यहां आप कन्हैया के छात्र राजनीति से मुख्यधारा की राजनीति के सफ़र को याद कीजिए। आप पाएंगे कि मोदी सरकार की नीतियों के विरोध से ही कन्हैया का,देश की मुख्यधारा की राजनीति मे प्रवेश हुआ है। देशभर में कन्हैया खुलकर मोदी सरकार का विरोध करते रहें हैं,जिससे समाज के एक तबके को लगा कि कन्हैया एक बेहतर रहनुमा बन सकते हैं। मुख्यधारा के नेताओं से दीगर एक छवि तैयार हुई,जिसकी बदौलत आज वो चुनावी मैदान में हैं।
अब यहां दो तस्वीर आपके सामने है। दोनों में विरोध है। पहले में आपने देखा कि सत्ता का विरोध करने वाले का विरोध है, तो दूसरे में सत्ता का विरोध है। अब यहां सवाल ये है कि क्या लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ सिर्फ़ सत्ता पक्ष के लिए होता है? यदि बात सिर्फ़ पीएम नरेन्द्र मोदी को झण्डा दिखाएं जाने के सन्दर्भ में ही करें तो, पिछले पांच सालों में ये स्थापित करने की कोशिश गई कि पीएम मोदी के जलसे में काले झण्डे ले जाने से रोकना या उसकी जांच करना, लोकतांत्रिक नहीं तानाशाही रवैया है। तो क्या इसी कसौटी पर कन्हैया और उनके कार्यकर्ताओं के कारनामे को नहीं कसा जाना चाहिए? या फिर तब काले झण्डे का समर्थन करने वाले अब इसलिए ख़ामोश हैं कि इस बार मामला कन्हैया का है। क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया व्यक्ति और पार्टी देखकर लागू होगा? कन्हैया तो अभी मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश ही किये हैं। अभी से ही लाठी-डंडों के ज़ोर पर सियासत कर रहे हैं तो बाक़ी नेताओं से दीगर कैसे हैं? देशभर के अलग-अलग हिस्सों से कन्हैया के समर्थन में बेगूसराय जाकर उनका प्रचार करने वाले ज़्यादातर लोग सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय हैं। लेकिन कोई भी कन्हैया और उनके कार्यकर्ताओं की करतूत पर बोल नहीं रहा है कि उन लोगों ने ग़लत किया या सही।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नाम एक खुला ख़त।

आदरणीय अखिलेश जी
मैंने ये ख़त इसलिए नहीं लिखा है कि कुछ दिनों पहले आपकी पार्टी के नेता आज़म ख़ान ने जया प्रदा के लिए शर्मसार करने वाले शब्द का इस्तेमाल किया और पार्टी के मुखिया होने नाते आप ने उनपर कोई कार्रवाई क्यूं नहीं की। इसलिए भी नहीं कि आपके कार्रवाई कर देने से आज़म ख़ान की बदज़ुबानी बन्द हो जाएगी। इसलिए भी नहीं कि आज़म ख़ान के बयान पर आप ख़ामोश क्यूं रहें। इसलिए भी नहीं कि आपने जब अपनी ख़ामोशी तोड़ी, तो मीडिया पर आरोप लगाते हुए आज़म ख़ान का बचाव क्यूं किया। इसलिए भी नहीं कि आपने आज़म ख़ान पर होने वाले मौखिक हमले का जवाब देते हुए सियासी नैतिकता का मिसाल क़ायम किया है। हर दल का मुखिया यही करता है जो आप ने अपने नेता के बचाव में किया है। हमारा समाज भी इस बात को अच्छी तरह जानता है। आज़म ख़ान के बयान के बाद सोशल मीडिया पर एक तबके ने आपके जैसा ही मीडिया को दोषी बताते हुए, दूसरे तबके से सवाल करना शुरू कर दिया। सवाल पूछने वाले में आपके समर्थक तो थें ही, कुछ पत्रकार भी शामिल थें। जैसे पत्रकार आशुतोष में रोहित सरदाना से पूछा कि “कठुआ बलात्कार पर मोदी जी ने कुछ बोला क्या?”
अब मैं उन बातों की बात करता हूँ कि आपको मैंने क्यूं ये ख़त लिखा है। अपने सवालों को आपके साथ साझा करने से पहले एक बात साफ़ कर देता हूं कि आपके और आज़म ख़ान के बयान से ये साफ़ हो गया है कि इस विवाद का दोषी मीडिया है। लेकिन सच्चाई ये है कि जनता जान गई है कि बोलते समय नेता कुछ भी बोल देते हैं, और बाद में मीडिया को दोषी ठहरा देते हैं। मीडिया की यही नियती है। ख़ैर अब सवालों की तरफ़ बढ़ रहा हूं। इसमें से कुछ सवाल डिम्पल की बातों से भी है,क्योंकि पीसी में उन्होंने भी इस मसले पर बोला है।
आज़म ख़ान के जिस बयान को ज़्यादातर लोगों को समझ में आया कि उन्होंने जया प्रदा के बारे में ही बोला है, आपने किस आधार पर बीजेपी का ध्यान भटकाने वाला क़दम बताया? आपको और आपकी पार्टी के नेताओं और समर्थकों को छोड़कर,क्या हिन्दुस्तान के सारे लोग ना समझ हैं? कोई भी दल जब सरकार में होता है तो हरसम्भव महिलाओं की सुरक्षा और बेहतरी के लिए काम करता हैं,तो क्या इस आधार पर उस दल के किसी नेता का महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार पर, ये कह कर बात को टाल दिया जा सकता है कि जब वो सरकार में थें तो अमुक-अमुक काम किया था? आज़म ख़ान के बयान एक तरफ़ तो आप कहते हैं कि बीजेपी ध्यान भटकाने में माहिर है, तो वहीं दूसरी तरफ़ आपकी पत्नी डिम्पल कहती हैं कि महिलाओं के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की टिप्पणी करना अच्छी बात नहीं है। आपकी पत्नी डिम्पल ने बुधवार को ये भी कहा कि उनके और प्रियंका गांधी के ख़िलाफ़ टिप्पणी पर मीडिया सवाल नहीं पूछता है। लेकिन जब बीजेपी के नेताओं के ख़िलाफ़ बोला जाता है, तभी ये बात क्यूं उठती है। क्या अब महिलाओं के साथ बदसलूकी और बदज़ुबानी को इस आधार पर देखा जाएगा? डिम्पल को शायद याद नहीं कि दयाशंकर ने मायावती के लिए जब अपशब्द का इस्तेमाल किया था,तो इसी मीडिया ने जिस पर आज वो सवाल खड़ा कर रहीं हैं, कितना दिखाया था और बीजेपी ने क्या कार्रवाई की थी। ख़ैर,डिम्पल भी नेता है वो जानने लगी हैं कि सियासत कैसे की जाती है।
अब मैं इस ख़त का अन्त इस उम्मीद के साथ कर रहा हूं कि यदि आप तक ये पहुंच जाएगा तो, अपने क़ीमती समय में से थोड़ी समय निकाल कर आप मेरे सवालों का जवाब देंगे।
आपका अनुज
आदित्य शुभम्

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

दास्तान-ए-दर्द नि:संग ललद्यय की!

14वीं सदी के जिस ललद्यय की दास्तान-ए-दर्द को आपसे साझा करने जा रहा हूं, वैसी ही कई ललद्यय आज भी हमारे समाज में है,जो ना जाने कितनी तसद्दुद को ख़ामोशी से सहती हैं। महिलाओं के प्रति हमारा समाज, तब और आज में सिर्फ़ ‘सदी’ में ही बदला है। मैं ऐसा क्यूं कह रहा है, जब आप पूरी कहानी को पढ़ेंगे तो पता चल जाएगा। कश्मीर के इतिहास में एक तरफ़ ललद्यय की मूर्तिपूजा, ब्राह्ममणवाद को लेकर मुखर विरोध दर्ज हैं, तो वहीं दूसरी तरफ़ उन्होंने ख़ुद अपनी रचनाओं के माध्यम से तब के समय में महिलाओं की स्थिति को कलमबन्द किया है।
ललद्यय को लल और पद्मावती के नाम से भी जाना गया। इसलिए मैं भी आगे लल शब्द का ही इस्तेमाल कर रहा हूँ। लल की जन्म स्थान को लेकर दो मत हैं। पहला है पाम्पोर के निकट सिम्पोर और दूसरा है श्रीनगर से 3 मील दूर पानद्रेठन की,जो अब श्रीनगर का हिस्सा है। ऐसे ही जन्म साल को लेकर भी दो मत है। पहला है 1317-1320 के बीच तो दूसरा है 1335। लल का जन्म एक ब्राह्ममण परिवार में हुआ था। 12 साल की उम्र में उनकी शादी पाम्पोर के निक्क भट्ट हुई। शादी के बाद कश्मीर की तत्कालीन पम्परा के अनुसार उनका नाम बदलकर पद्मावती कर दिया गया है। यहां मैं एक बात बता रहा हूं कि लल की शादी के बाद से उनकी ज़िन्दगी की बहुत सारी कहानियां है,लेकिन मैं यहां सिर्फ़ उसी कहानी की बात करूंगा जो तब था और आज भी मौज़ूद है।
शादी के कुछ दिनों बाद ही निक्क और लल की विवाह-विच्छेद हो जाता है। जियालाल कौल से लेकर प्रेमनाथ बज़ाज़ तक, विवाह-विच्छेद का कारण लल की सेक्स में अरूचि को लेकर मानते हैं। सेक्स में अरूचि होने की वजह लल की धार्मिक आस्थाओं में रूचि को बताते हैं। अब यहां आप ख़ुद से सवाल कीजिए कि वर्तमान में हमारा समाज कितना बदल गया है। क्या किसी लड़की के माता-पिता पहली नज़र में अपनी बेटी की शादी के लिए उससे राय लेने लगे हैं? क्या क़ानून बना देने से कम उम्र में लड़कियों की शादी होने बन्द हो गये हैं? या फिर आप इस बात से संतुष्ट हो गए हैं कि ऐसा करना अब तो अपराध की श्रेणी में आता है।जो भी ऐसा करेगा उसको तो सज़ा होगी हीं?
अब आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि ससुराल में उनके साथ व्यवहार होता है। लल की सास बहुत क्रूर थी और उनके साथ मिलकर उनका पति भी लल पर ज़ुल्म करता था। लल की सास थाली में पत्थर रख उसे चावल से ढंक देती थी। उस थोड़े से चावल को ही खाकर लल पूरे दिन काम मे लगी रहती थी। एक बार लल के ससुराल में ग्रहशान्ति का अनुष्ठान हुआ। लल जब पानी भरने गई तो उनकी सखियों ने छेड़ते हुए कहा कि आज तो तुझे खाने के लिए पकवान मिलेगा। इस पर लल ने कहा- ‘हौंड मांरितन किन लठ, ललि नीलवठ चलि न जांह’ मतलब ये हुआ कि घर में चाहे भेड़ कटे या बकरा, लला के भाग्य में तो पत्थर ही लिखा है। लल सुबह पानी भरने जल्दी निकलती और रास्ते में कहीं एकान्त में बैठकर साधना करने लगती और जब घर लौटती तो सास ताने देती कि वो प्रेमी से मिलकर आ रही है। ऐसे ही एक दिन सास के उकसाने पर पति ने पानी लेकर लौटी लल के घड़े पर लाठी से प्रहार कर दिया। मिट्टी का घड़ा तो टूट गया, लेकिन पानी ज्यों का त्यों रह गया। ज़रूरत का पानी लेकर उन्होंने जो पानी फेंक दिया,उससे एक जलकुण्ड बन गया, जो ललत्राग के नाम से जाना गया। दूर-दूर तक इस घटना का प्रचार हो गया, जिससे लोग मिलने आने लगे। इसी समय उन्होंने घर छोड़ने का निर्णय लिया। संन्यासिनी बन गई और विवस्त्र होकर सड़कों पर घूमने लगी। बाद में उन्होंने अपने नैहर का नाम अपना लिया।
इसके बाद लल ने समाज में स्त्रियों की स्थिति और परिवार में उत्पीड़न को लेकर कविताएं लिखी, जो वाख कही जाती है। नि:सग हुई लल को दैवी स्त्री-सा सम्मान तो मिला, लेकिन वाख में उन्होंने जो लिखा आज भी उसको समाज में देखा जा सकता है। अब उनके कुछ वाख को आप के साथ साझा कर रहा हूँ। एक बार उन्होंने लिखा कि “न ज़ायस त न प्यायास, न खेयम हन्द त न शोंठ” इसका मतलब ये है कि न गर्भिणी हुई,न प्रसूता और न प्रसूता का आहार ही किया। आप इसको कैसे देख रहे हैं? विरक्ति के रूप में या टीस के रूप में। एक दूसरे वाख में उन्होंने लिखा कि ‘काठ के धनुष के लिए बाण मिला तो घास का,राजमहल के लिए बढ़ई मिला तो वह निपट मूर्ख। मेरी स्थिति बीच बाज़ार में ताला रहित दुकान सी हो गई है। देह मेरी तीर्थ विहीन हो रही है। मेरी यह विवशता को भला कौन जान सकता है।‘
लल एक वाख में कहती हैं- एक से हैं मेरे लिए ज़िन्दगी और मौत, ज़िन्दगी में भी खुश और मौत में भी, न मुझे किसी का शोक न मेरे लिए शोकग्रस्त। यह नि:संगता दु:ख की कड़वी चाशनी में घुली है।
एक पितृसत्तात्मक समाज में देह पर तो स्त्री का अधिकार तो दूर की बात है, प्रेम भी अत्याचार सा लगची है, और उससे पैदा हुई अरुचि जब बाक़ी उत्पीड़नों के साथ मिलती है तो, आज भी कई लल हैं जिनको घर छोड़ना ही मुक्ति लगता है।

सोमवार, 14 जनवरी 2019

हरिजनों को ख़ुद को इस मानसिकता से बचाना होगा।

मोदी सरकार द्वारा ग़रीब सवर्णों को 10% आरक्षण के प्रावधान के बाद से उत्तर भारत की राजनीति और क्षेत्रीय किन्तु ख़ुद को राष्ट्रीय कहने वाले पत्रकारीय संस्थानों के पत्रकारों में बेचैनी का माहौल है। क्योंकि आज़ादी के बाद से ग़रीब सवर्णों के आरक्षण के प्रावधान से पहले तक जाति के नाम पर वो सियासत के जिस सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा थे,उसको झटका लगा है। ख़ैर राजनीतिक दल 'लेकिन' शब्द का इस्तेमाल कर अपने-अपने वोट बैंक के हिसाब से ग़रीब सवर्णों के आरक्षण पर बोल रहे हैं। कमोबेश नेताओं जैसी ही हालत पत्रकारों की भी है। ये बात दीगर है कि पत्रकारों को पत्रकारिता के नाम पर, ना तो उसके कार्यशैली पर सवाल उठाना पसन्द है और ना ही उनसे सवाल पूछना। क्योंकि वो ख़ुद को सर्वज्ञानी और सर्वोपरि समझने लगे हैं।
आरक्षण पर चर्चा के इस दौर में मैंने भी दो चर्चा का हिस्सा बना। पहली चर्चा क़रीब दस-साला अनुभवी दो पत्रकारों से और दूसरी चर्चा तीन-साला अनुभवी एक पत्रकार से। एक के बाद एक, दोनों चर्चा को आप के साथ साझा कर रहा हूँ।
पहली चर्चा-
सवर्णों को आरक्षण के प्रावधान पर चर्चा होते-होते, चर्चा इस सवाल पर पहुँच गई कि हरिजनों का उत्थान कैसे होगा? वो कौन-कौन से बिन्दु हैं,जिससे समाज में समानता आएगी? पूरी चर्चा के दौरान मेरा ज़ोर हरिजनों को शिक्षित किया जाना चाहिए,इस बात पर रहा। इसके अलावा मैंने किसी बिन्दु पर चर्चा नहीं की। क्योंकि मेरा माना है कि शिक्षा ही एक मात्र उपाय है,समाज में समानता लाने का। मैंने अपनी सारी दलील दस-साला अनुभवी दोनों पत्रकारों के सामने शिक्षा के इर्द-गिर्द दी। लेकिन दोनों पत्रकारों की नज़र में समाज में समानता लाने का एकमात्र और अन्तिम उपाय 'अन्तरजातीय विवाह ' है।
दूसरी चर्चा-
आज दोपहर में भोजन के दौरान एक वरिष्ठ पत्रकार से मैं चर्चा कर रहा था कि उत्तर भारतीय लेखकों और दक्षिण भारतीय लेखकों में क्या अन्तर है। उदारहण के रुप मैं बता रहा था कि जाति को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत के लेखकों में क्या भिन्नता है। लेकिन तपाक से एक युवा पत्रकार ने वही कहा जो दस-साला अनुभवी दोनों पत्रकारों ने कहा था। युवा पत्रकार भी अन्तरजातीय विवाह का पैरोकार थे। फिर मेरी बहस शुरू हो गई। मैंने कहा कि अन्तरजातीय विवाह समाज में समानता लाने के लिए 'दूर की कौड़ी' जैसा है। मैंने बहुत सारी दलीलें इस सन्दर्भ में दी कि अन्तरजातीय विवाह समाज में समानता लाने का उपाय नहीं हो सकता है। लेकिन युवा पत्रकार भी मेरी बात को मानने को राज़ी नहीं हुए।
अब आपसे भी सवाल है कि क्या आपको भी लगता है कि समाज में समानता लाने का एकमात्र और अन्तिम उपाय 'अन्तरजातीय विवाह ' है? क्या शिक्षा से समाज में समानता नहीं आएगी?

सोमवार, 17 दिसंबर 2018

समाज को ऐसे कई ' विजय ' की ज़रुरत है!

16 दिसम्बर 2012 की रात को भला कोई कैसे भूल सकता है,क्योंकि उस रात निर्भया के साथ दरिन्दों ने जो किया, वो अब भी हर रोज़ किसी ना किसी रूप में किसी और निर्भया के साथ हो रहा है। निर्भया दरिन्दगी की शिकार तब हुई थी,जब उस आधी रात को एक अॉटो वाले ने उसकी मदद करने से मना कर दिया था, लेकिन निर्भया काण्ड के ठीक 6 साल से एक दिन पहले यानि 15 दिसम्बर को अॉटो चालक परम चन्द और उनके बेटे विजय की एक ज़िम्मेदार नागरिक होने की सोच ने एक सम्भावित घटना को घटने से बचा लिया। बकौल परम चन्द एक स्कूली छात्रा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उनके अॉटो के पास आई। और बोली की उसको मन्दिर घूमना है। परम चन्द लड़की को छत्तरपुर मन्दिर ले गये। वहाँ के बाद लड़की को इण्डिया गेट, पार्लियामेट हाउस, राष्ट्रपति भवन वगैरह-वगैरह घुमाया। फिर लड़की ने कहा कि उसे भूख लगी है,किसी होटल में खाना खाना है। बंगाली मार्केट के एक होटल में खाना खाने के बाद लड़की थोड़ी दूर चलने के बाद अॉटो से उतर जाती है। फिर परम चन्द ने पूछा कि यहाँ क्या काम है? कहाँ जाना है? रात हो जाएगी,फिर क्या करोगी? फिर लड़की ने मण्डी हाउस पर उतारने को कहा। लड़की को मण्डी हाउस छोड़कर परम चन्द अपने घर चले गए। देर रात परम चन्द अपने घर पहुँचकर बेटे विजय को सारी बात बताई।
पिता की बात सुनकर विजय ने कहा कि आपको ऐसे लड़की को अकेले छोड़कर नहीं आना चाहिए था। आपने ग़लत किया है। चलिए चलकर उस लड़की को ढूंढते हैं। रात के 9 बजे विजय अपने पिता के साथ उस लड़की को ढूंढने निकल जाता है। काफ़ी मशक्कत के बाद लड़की अकेले बैठी नज़र आ जाती है। फिर दोनों लड़की के पास पहुँचकर काफ़ी देर तक बातचीत करते हैं। बातचीत के बाद विजय इस बात को लेकर आश्वस्त हो जाता है कि लड़की घर से भागी हुई है और घर से परेशान है। फिर विजय 100 नम्बर पर कॉल करके पुलिस को सूचित करता है। जिसके बाद पुलिस आकर उस लड़की को ले जाती है। काउंसलिंग में पता चला है कि लड़की प्रतापगढ़,यूपी से भागकर आई है और किसी बात को लेकर अपने परिवार से नाराज़ है। फिर पुलिस उसके परिवार वाले को सूचित कर देती है।
पेशे से होमगार्ड का जवान विजय का मानना है कि अगर हम अपने आप को अवेयर नहीं करेंगे, एक्टिव नहीं रहेंगे। लड़कियों के लिए लापरवाही बरतेंगे तो कभी भी कोई घटना घट सकती है। इसलिए एक नागरिक होने के नाते हम सब की ज़िम्मेदारी है कि हम अपनी ज़िम्मेदारियों को समझे।
काश! विजय की सोच हर नागरिक में समा जाता,तो हर 12 मिनट पर एक महिला के साथ बलात्कार नहीं होता है। केन्द्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के साल 2016 के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं से बलात्कार की घटनाओं में पिछले साल के मुक़ाबले 12% का इज़ाफा हुआ है। इसके अलावा अन्य हिंसाओं में 3% का इज़ाफा हुआ है। ये आंकड़ा साल दर साल बढ़ता जा रहा है। साल 2015 में रेप की 34,651 शिकायतें दर्ज हुई थी,जबकि साल 2016 में 38,947 शिकायतें दर्ज हुई। देश की राजधानी दिल्ली एक शहर और एक राज्य के रूप में रेप की घटनाओं में शीर्ष पर काबिज़ है। एक शहर के रूप में दिल्ली में साल 2016 में महिलाओं के प्रति 13803 घटनाएं हुआ,जिसमें से रेप की 1996 घटनाएं घटी,जबकि एक राज्य के रुप में महिलाओं के प्रति 19169 घटनाएँ घटी,जिसमें से रेप की 2155 घटनाएँ घटी है।

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

किसानों का कौन?


हाल ही में देशभर के किसान अपनी माँगों को लेकर दिल्ली में इस उम्मीद से इकट्ठा हुए कि उनकी माँगों को केन्द्र सरकार द्वारा मान लिया जाएगा। लेकिन हुआ वही जो हर बार होता है। किसानों को वापस लौटना पड़ा और उनकी समस्याओं पर चर्चा बन्द हो गई।वो सारे नेता जो किसानों की रैली में हाथ से हाथ जोड़कर फ़ोटो खिंचवाये थें। उनमें से कुछ चुनाव प्रचार में व्यस्त हो गए और कुछ इस उम्मीद में अपने राज्य को लौट गए कि फिर फ़ोटो खिंचवाने का मौका तो आएगा ही।

इस बार किसानों की रैली हर बार की तरह नहीं थी। पहले किसानों की माँग होती थी कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाए,लेकिन इस बार किसानों की माँग थी कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर संसद में बहस हो। जिसमें सिर्फ़ किसानों के क़र्ज या फसल की कीमतों पर ही नहीं,बल्कि समूचे कृषि संकट पर बात हो। साथ ही ऑल इण्डिया किसान संघर्ष समिति द्वारा क़र्जा मुक्ति बिल और एमएसपी का बिल ड्राफ़्ट किया गया था। जिस पर बहस के लिए संसद का कम से कम तीन हफ़्ते का स्पेशल सेशन हो। अब हम सबको उस दिन का इन्तज़ार करना चाहिए कि कब कृषि की समस्याओं पर बहस के लिए संसद का स्पेशल सेशन बुलाया जा रहा है।
किसानों की समस्या वाकई जटिल है,जो एक दिन या एक साल में तो नहीं जाएगा। लेकिन विपक्षी दलों के नेताओं के भाषण सुनने के बाद ऐसा लगता है कि क़र्ज माफ़ी और स्वामीनाथन आयोग के रिपोर्ट में जो एमएसपी तय करने की प्रक्रिया बताई गई है,को लागू कर देने से सारी समस्याओं का निदान हो जाएगा। 30 नवम्बर 2018 के दिन जब किसानों की रैली में राहुल गाँधी,अरविन्द केजरीवाल,सीताराम येचुरी,शरद यादव,फ़ारुक़ अब्दुल्लाह वग़ैरह-वग़ैरह फ़ोटो सेशन से पहले किसानों की क़र्ज माफ़ी को किसानों की समस्या का समाधान बता रहे थें,उसी दिन प्रोफ़ेसर स्वामीनाथन ने अपनी वेबसाइट पर लिखा कि I only feel sorry that in the election politics solutions like loan waiver are given importance. The basic difficulties of farmers can be overcome only if integrated attention is given to pricing, procurement and public distribution. Compounding the difficulties of today,farmers are facing serious problems from climate change. क्या आपने कभी किसी नेता को बदले मौसम से किसानों को होने वाली समस्याओं पर बात करते सुना है? क्यों सुख़ाग्रस्त इलाक़ों से किसानों के द्वारा जल संचय की प्रक्रिया अपनाने की बड़े पैमाने पर कोई तस्वीरें सामने नहीं आती है? सुखाग्रस्त इलाक़ों के किसानों को भी सोचना पड़ेगा कि उनके इलाक़े में पानी का जलस्तर कैसे बढ़ेगा?
मोदी सरकार ने किसानों की क़र्ज माफ़ी और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में  एमएसपी तय करने की प्रक्रिया पर अपना रुख़ पहले ही साफ़ कर दिया है। साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाख़िल करके कह दिया था कि लागत पर 50 प्रतिशत अधिक नहीं दिया जा सकता,क्योंकि ये बाज़ार ख़राब कर देगा। Indiatvpaisa.com पर 20 जून 2017 को ही छपा है कि जब पंजाब सरकार ने 10 लाख़ किसानों के क़र्ज माफ़ किए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। तब केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साफ़-साफ़ कह दिया था कि केन्द्र सरकार किसानों के क़र्ज माफ़ किए जाने के प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है। इससे पहले जब महाराष्ट्र और यूपी सरकार ने भी किसानों की क़र्ज माफ़ी का एलान किया था, तब 12 जून को भी वित्त मंत्री ने कह दिया था कि केन्द्र राज्यों को क़र्ज माफ़ी के लिए सहायना नहीं देगा और अगर वे ऋण माफ़ करते हैं तो उसके लिए धन की व्यवस्था उन्हें अपने कोष से करनी पड़ेगी।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी हर राज्य के चुनावी भाषण में कह रहें है कि अगर कांग्रेस की सरकार बनी तो 10 दिनों के भीतर किसानो का क़र्ज माफ़ करेंगे। लेकिन वर्तमान में जिस राज्य में उनकी सरकार है,वहाँ क्या हालत ये जानना ज़रूरी है। 17 मई 2018 के एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ 24 घंटे के भीतर पंजाब के भठिंडा ज़िले के अलग-अलग गाँवों के 5 किसानों ने क़र्ज की वजह से आत्महत्या कर ली और किसी भी मृतक परिवार से मिलने पंजाब का एक भी मंत्री नहीं गया। पंजाब में ही गन्ना किसान लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। 05 नवम्बर 2018 की रिपोर्ट है कि कर्नाटक में किसानों द्वारा क़र्ज चुकाने में देरी की वजह से बैंकों द्वारा अरेस्ट वारंट भेजा जा रहा है। जिसको लेकर किसान गुस्से में हैं और विधानसभा को घेरने की धमकी भी दिए हैं।
स्वामीनाथन आयोग ने यूपीए-1 के कार्यकाल में चार रिपोर्ट क्रमश: दिसम्बर 2004,अगस्त 2005,दिसम्बर 2005 और अप्रैल 2006 में सौंप दिए थें। अक्टूबर 2006 में अन्तिम और पांचवे रिपोर्ट को सौंपते वक़्त कहा था कि यदि 11 वर्षीय प्लान के साथ काम किया गया तो कृषि में जल्दी और अच्छी विकास होगी। लेकिन कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में किसानों के लिए क्या किया कौन नहीं जानता है।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...