गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

काले झण्डे के समर्थक अबतक ख़ामोश हैं।


हो सकता है आपको याद भी हो, याद नहीं भी है तो इस बात के लिए गूगल कर लीजिए कि साल 2014 से अब तक कितने ऐसे मौक़े आएं जब लिखने और कहने वालों ने काले झण्डे दिखाए जाने को सही माना और कहा कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज़/प्रक्रिया का सम्मान होना चाहिए। कुछ दिनों पहले बिहार के बेगूसराय से काले झण्डे दिखाएं जाने की ख़बर आई थी,तब से लेकर आजतक मैं उन लोगों कि लेखनी और वक्तव्य को ढूंढ रहा हूँ, जो तब लोकतंत्र में काले झण्डे का समर्थन कर रहे थें। जानना चाहता हूं कि इस घटना में उन लोगों ने काले झण्डे का समर्थन किया है या नहीं। यदि मैं बात करूं अपने मित्रों को जो काले झण्डे के समर्थन में इन पांच सालों में अपनी आवाज़ बुलन्द किएं। अब ख़ामोश हैं। कुछ तो ऐसे व्यवहार कर रहें हैं कि उनको पता ही नहीं है कि कन्हैया को काला झण्डा दिखाया गया है।
ख़ैर अब हम मुद्दे पर लौटते हैं। जैसा कि हम सब जानते ही हैं कि बेगूसराय से कन्हैया कुमार चुनाव लड़ रहे हैं। कन्हैया सीपीआई के उम्मीदवार हैं। इनका मुक़ाबला बीजेपी के नेता गिरिराज सिंह और राजद के तनवीर हसन  से हैं। कन्हैया, प्रचार करने बेगूसराय के गढ़पुरा थाना के किसी क्षेत्र में गए थें। रोड-शो में कुछ लोगों ने उनको काले झण्डे दिखाएं, जिसके बाद कन्हैया के कारकूनों( कार्यकर्ताओं) ने लाठी-डंडों से काले झण्डे दिखाने वालों की जमकर पिटाई की। इस दौरान किसी व्यक्ति ने मना किया तो लाठी-डंडे वालों ने मना करने व्यक्ति की उसी के घर में घुसकर पिटाई की। किसी तरह वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने मामले को शान्त किया। अब यहां आप कन्हैया के छात्र राजनीति से मुख्यधारा की राजनीति के सफ़र को याद कीजिए। आप पाएंगे कि मोदी सरकार की नीतियों के विरोध से ही कन्हैया का,देश की मुख्यधारा की राजनीति मे प्रवेश हुआ है। देशभर में कन्हैया खुलकर मोदी सरकार का विरोध करते रहें हैं,जिससे समाज के एक तबके को लगा कि कन्हैया एक बेहतर रहनुमा बन सकते हैं। मुख्यधारा के नेताओं से दीगर एक छवि तैयार हुई,जिसकी बदौलत आज वो चुनावी मैदान में हैं।
अब यहां दो तस्वीर आपके सामने है। दोनों में विरोध है। पहले में आपने देखा कि सत्ता का विरोध करने वाले का विरोध है, तो दूसरे में सत्ता का विरोध है। अब यहां सवाल ये है कि क्या लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ सिर्फ़ सत्ता पक्ष के लिए होता है? यदि बात सिर्फ़ पीएम नरेन्द्र मोदी को झण्डा दिखाएं जाने के सन्दर्भ में ही करें तो, पिछले पांच सालों में ये स्थापित करने की कोशिश गई कि पीएम मोदी के जलसे में काले झण्डे ले जाने से रोकना या उसकी जांच करना, लोकतांत्रिक नहीं तानाशाही रवैया है। तो क्या इसी कसौटी पर कन्हैया और उनके कार्यकर्ताओं के कारनामे को नहीं कसा जाना चाहिए? या फिर तब काले झण्डे का समर्थन करने वाले अब इसलिए ख़ामोश हैं कि इस बार मामला कन्हैया का है। क्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया व्यक्ति और पार्टी देखकर लागू होगा? कन्हैया तो अभी मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश ही किये हैं। अभी से ही लाठी-डंडों के ज़ोर पर सियासत कर रहे हैं तो बाक़ी नेताओं से दीगर कैसे हैं? देशभर के अलग-अलग हिस्सों से कन्हैया के समर्थन में बेगूसराय जाकर उनका प्रचार करने वाले ज़्यादातर लोग सोशल मीडिया पर बहुत सक्रिय हैं। लेकिन कोई भी कन्हैया और उनके कार्यकर्ताओं की करतूत पर बोल नहीं रहा है कि उन लोगों ने ग़लत किया या सही।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नाम एक खुला ख़त।

आदरणीय अखिलेश जी
मैंने ये ख़त इसलिए नहीं लिखा है कि कुछ दिनों पहले आपकी पार्टी के नेता आज़म ख़ान ने जया प्रदा के लिए शर्मसार करने वाले शब्द का इस्तेमाल किया और पार्टी के मुखिया होने नाते आप ने उनपर कोई कार्रवाई क्यूं नहीं की। इसलिए भी नहीं कि आपके कार्रवाई कर देने से आज़म ख़ान की बदज़ुबानी बन्द हो जाएगी। इसलिए भी नहीं कि आज़म ख़ान के बयान पर आप ख़ामोश क्यूं रहें। इसलिए भी नहीं कि आपने जब अपनी ख़ामोशी तोड़ी, तो मीडिया पर आरोप लगाते हुए आज़म ख़ान का बचाव क्यूं किया। इसलिए भी नहीं कि आपने आज़म ख़ान पर होने वाले मौखिक हमले का जवाब देते हुए सियासी नैतिकता का मिसाल क़ायम किया है। हर दल का मुखिया यही करता है जो आप ने अपने नेता के बचाव में किया है। हमारा समाज भी इस बात को अच्छी तरह जानता है। आज़म ख़ान के बयान के बाद सोशल मीडिया पर एक तबके ने आपके जैसा ही मीडिया को दोषी बताते हुए, दूसरे तबके से सवाल करना शुरू कर दिया। सवाल पूछने वाले में आपके समर्थक तो थें ही, कुछ पत्रकार भी शामिल थें। जैसे पत्रकार आशुतोष में रोहित सरदाना से पूछा कि “कठुआ बलात्कार पर मोदी जी ने कुछ बोला क्या?”
अब मैं उन बातों की बात करता हूँ कि आपको मैंने क्यूं ये ख़त लिखा है। अपने सवालों को आपके साथ साझा करने से पहले एक बात साफ़ कर देता हूं कि आपके और आज़म ख़ान के बयान से ये साफ़ हो गया है कि इस विवाद का दोषी मीडिया है। लेकिन सच्चाई ये है कि जनता जान गई है कि बोलते समय नेता कुछ भी बोल देते हैं, और बाद में मीडिया को दोषी ठहरा देते हैं। मीडिया की यही नियती है। ख़ैर अब सवालों की तरफ़ बढ़ रहा हूं। इसमें से कुछ सवाल डिम्पल की बातों से भी है,क्योंकि पीसी में उन्होंने भी इस मसले पर बोला है।
आज़म ख़ान के जिस बयान को ज़्यादातर लोगों को समझ में आया कि उन्होंने जया प्रदा के बारे में ही बोला है, आपने किस आधार पर बीजेपी का ध्यान भटकाने वाला क़दम बताया? आपको और आपकी पार्टी के नेताओं और समर्थकों को छोड़कर,क्या हिन्दुस्तान के सारे लोग ना समझ हैं? कोई भी दल जब सरकार में होता है तो हरसम्भव महिलाओं की सुरक्षा और बेहतरी के लिए काम करता हैं,तो क्या इस आधार पर उस दल के किसी नेता का महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार पर, ये कह कर बात को टाल दिया जा सकता है कि जब वो सरकार में थें तो अमुक-अमुक काम किया था? आज़म ख़ान के बयान एक तरफ़ तो आप कहते हैं कि बीजेपी ध्यान भटकाने में माहिर है, तो वहीं दूसरी तरफ़ आपकी पत्नी डिम्पल कहती हैं कि महिलाओं के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की टिप्पणी करना अच्छी बात नहीं है। आपकी पत्नी डिम्पल ने बुधवार को ये भी कहा कि उनके और प्रियंका गांधी के ख़िलाफ़ टिप्पणी पर मीडिया सवाल नहीं पूछता है। लेकिन जब बीजेपी के नेताओं के ख़िलाफ़ बोला जाता है, तभी ये बात क्यूं उठती है। क्या अब महिलाओं के साथ बदसलूकी और बदज़ुबानी को इस आधार पर देखा जाएगा? डिम्पल को शायद याद नहीं कि दयाशंकर ने मायावती के लिए जब अपशब्द का इस्तेमाल किया था,तो इसी मीडिया ने जिस पर आज वो सवाल खड़ा कर रहीं हैं, कितना दिखाया था और बीजेपी ने क्या कार्रवाई की थी। ख़ैर,डिम्पल भी नेता है वो जानने लगी हैं कि सियासत कैसे की जाती है।
अब मैं इस ख़त का अन्त इस उम्मीद के साथ कर रहा हूं कि यदि आप तक ये पहुंच जाएगा तो, अपने क़ीमती समय में से थोड़ी समय निकाल कर आप मेरे सवालों का जवाब देंगे।
आपका अनुज
आदित्य शुभम्

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

दास्तान-ए-दर्द नि:संग ललद्यय की!

14वीं सदी के जिस ललद्यय की दास्तान-ए-दर्द को आपसे साझा करने जा रहा हूं, वैसी ही कई ललद्यय आज भी हमारे समाज में है,जो ना जाने कितनी तसद्दुद को ख़ामोशी से सहती हैं। महिलाओं के प्रति हमारा समाज, तब और आज में सिर्फ़ ‘सदी’ में ही बदला है। मैं ऐसा क्यूं कह रहा है, जब आप पूरी कहानी को पढ़ेंगे तो पता चल जाएगा। कश्मीर के इतिहास में एक तरफ़ ललद्यय की मूर्तिपूजा, ब्राह्ममणवाद को लेकर मुखर विरोध दर्ज हैं, तो वहीं दूसरी तरफ़ उन्होंने ख़ुद अपनी रचनाओं के माध्यम से तब के समय में महिलाओं की स्थिति को कलमबन्द किया है।
ललद्यय को लल और पद्मावती के नाम से भी जाना गया। इसलिए मैं भी आगे लल शब्द का ही इस्तेमाल कर रहा हूँ। लल की जन्म स्थान को लेकर दो मत हैं। पहला है पाम्पोर के निकट सिम्पोर और दूसरा है श्रीनगर से 3 मील दूर पानद्रेठन की,जो अब श्रीनगर का हिस्सा है। ऐसे ही जन्म साल को लेकर भी दो मत है। पहला है 1317-1320 के बीच तो दूसरा है 1335। लल का जन्म एक ब्राह्ममण परिवार में हुआ था। 12 साल की उम्र में उनकी शादी पाम्पोर के निक्क भट्ट हुई। शादी के बाद कश्मीर की तत्कालीन पम्परा के अनुसार उनका नाम बदलकर पद्मावती कर दिया गया है। यहां मैं एक बात बता रहा हूं कि लल की शादी के बाद से उनकी ज़िन्दगी की बहुत सारी कहानियां है,लेकिन मैं यहां सिर्फ़ उसी कहानी की बात करूंगा जो तब था और आज भी मौज़ूद है।
शादी के कुछ दिनों बाद ही निक्क और लल की विवाह-विच्छेद हो जाता है। जियालाल कौल से लेकर प्रेमनाथ बज़ाज़ तक, विवाह-विच्छेद का कारण लल की सेक्स में अरूचि को लेकर मानते हैं। सेक्स में अरूचि होने की वजह लल की धार्मिक आस्थाओं में रूचि को बताते हैं। अब यहां आप ख़ुद से सवाल कीजिए कि वर्तमान में हमारा समाज कितना बदल गया है। क्या किसी लड़की के माता-पिता पहली नज़र में अपनी बेटी की शादी के लिए उससे राय लेने लगे हैं? क्या क़ानून बना देने से कम उम्र में लड़कियों की शादी होने बन्द हो गये हैं? या फिर आप इस बात से संतुष्ट हो गए हैं कि ऐसा करना अब तो अपराध की श्रेणी में आता है।जो भी ऐसा करेगा उसको तो सज़ा होगी हीं?
अब आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि ससुराल में उनके साथ व्यवहार होता है। लल की सास बहुत क्रूर थी और उनके साथ मिलकर उनका पति भी लल पर ज़ुल्म करता था। लल की सास थाली में पत्थर रख उसे चावल से ढंक देती थी। उस थोड़े से चावल को ही खाकर लल पूरे दिन काम मे लगी रहती थी। एक बार लल के ससुराल में ग्रहशान्ति का अनुष्ठान हुआ। लल जब पानी भरने गई तो उनकी सखियों ने छेड़ते हुए कहा कि आज तो तुझे खाने के लिए पकवान मिलेगा। इस पर लल ने कहा- ‘हौंड मांरितन किन लठ, ललि नीलवठ चलि न जांह’ मतलब ये हुआ कि घर में चाहे भेड़ कटे या बकरा, लला के भाग्य में तो पत्थर ही लिखा है। लल सुबह पानी भरने जल्दी निकलती और रास्ते में कहीं एकान्त में बैठकर साधना करने लगती और जब घर लौटती तो सास ताने देती कि वो प्रेमी से मिलकर आ रही है। ऐसे ही एक दिन सास के उकसाने पर पति ने पानी लेकर लौटी लल के घड़े पर लाठी से प्रहार कर दिया। मिट्टी का घड़ा तो टूट गया, लेकिन पानी ज्यों का त्यों रह गया। ज़रूरत का पानी लेकर उन्होंने जो पानी फेंक दिया,उससे एक जलकुण्ड बन गया, जो ललत्राग के नाम से जाना गया। दूर-दूर तक इस घटना का प्रचार हो गया, जिससे लोग मिलने आने लगे। इसी समय उन्होंने घर छोड़ने का निर्णय लिया। संन्यासिनी बन गई और विवस्त्र होकर सड़कों पर घूमने लगी। बाद में उन्होंने अपने नैहर का नाम अपना लिया।
इसके बाद लल ने समाज में स्त्रियों की स्थिति और परिवार में उत्पीड़न को लेकर कविताएं लिखी, जो वाख कही जाती है। नि:सग हुई लल को दैवी स्त्री-सा सम्मान तो मिला, लेकिन वाख में उन्होंने जो लिखा आज भी उसको समाज में देखा जा सकता है। अब उनके कुछ वाख को आप के साथ साझा कर रहा हूँ। एक बार उन्होंने लिखा कि “न ज़ायस त न प्यायास, न खेयम हन्द त न शोंठ” इसका मतलब ये है कि न गर्भिणी हुई,न प्रसूता और न प्रसूता का आहार ही किया। आप इसको कैसे देख रहे हैं? विरक्ति के रूप में या टीस के रूप में। एक दूसरे वाख में उन्होंने लिखा कि ‘काठ के धनुष के लिए बाण मिला तो घास का,राजमहल के लिए बढ़ई मिला तो वह निपट मूर्ख। मेरी स्थिति बीच बाज़ार में ताला रहित दुकान सी हो गई है। देह मेरी तीर्थ विहीन हो रही है। मेरी यह विवशता को भला कौन जान सकता है।‘
लल एक वाख में कहती हैं- एक से हैं मेरे लिए ज़िन्दगी और मौत, ज़िन्दगी में भी खुश और मौत में भी, न मुझे किसी का शोक न मेरे लिए शोकग्रस्त। यह नि:संगता दु:ख की कड़वी चाशनी में घुली है।
एक पितृसत्तात्मक समाज में देह पर तो स्त्री का अधिकार तो दूर की बात है, प्रेम भी अत्याचार सा लगची है, और उससे पैदा हुई अरुचि जब बाक़ी उत्पीड़नों के साथ मिलती है तो, आज भी कई लल हैं जिनको घर छोड़ना ही मुक्ति लगता है।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...