3 मार्च 2018 को ये तय हो जाएगा कि मेघालय की सत्ता किसके हाथों में होगी।वर्तमान में मेघालय की कमान कांग्रेस के मुकुल एम.संगमा के हाथों में है।चुनाव आयोग के मुताबिक 18 फ़रवरी को मेघालय की जनता अपने मताधिकार का उपयोग कर 12वें मुख्यमंत्री का चयन करेगी।60 विधानसभा सीट वाले इस राज्य की राजनीति में पुरुषों का दबदबा है।महिला विधायकों की संख्या मात्र 5 है,यानि विधानसभा में मात्र 8.33% महिलायें प्रतिनिधित्व करती हैं।ये स्थिती तब है,जब मेघालय एक महिला प्रधान राज्य है।मेघालय एक महिला प्रधान राज्य है,ये सुनकर आप आश्चर्यचकित हो गए ना,लेकिन हक़ीकत यही है कि यहां की आधे से भी अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व महिलाएं करतीं है।आने वाले दिनों में यहां की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कितनी बढ़ती है,ये आगामी चुनाव में पता चल जाएगा।राजनीति में भले हीं महिलाओ की भागीदारी है,इससे इतर इस राज्य में महिलाओ की एक हक़ीकत साझा करने से पहले,ये कहना चाहता हूं मेघालय की राजनीति में हीं महिलाओं की स्थिति ऐसी हैं,ऐसा बिल्कुल नही है।दरअसल भारतीय राजनीति में अभी भी पुरूषवादी सोच के साथ और भी कई कारण है,जो राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में बाधक हैं।और ये एक अलग चर्चा का विषय है।
ख़ैर अब आते हैं उस हक़ीकत पर,जो पुरूषवादी सोच और पितृसत्तात्मक समाज से बिल्कुल उलट है।मैं रिसर्च तो मेघालय की राजनीति में युवा पीढ़ी की महिलाओं की भागीदारी पर कर रहा था,लेकिन मेरे हाथ ये हक़ीक़त लगी। इस हक़ीक़त के बारे में जब मैं पढ़ा,तो मेरे 'और जानने की लालसा' ने कई घटों तक रिसर्च करने के लिए प्रेरित किया।मगर अफ़सोस की कई घटों तक रिसर्च करने के बाद मेघालय की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और खासी समुदाय के बारे में हिन्दी या अंग्रेज़ी में मुझे कोई ताज़ा जानकारी हासिल नही हो पाई।शायद इसके पीछे भौगोलिक दुरी और भाषाई विषमता भी हो सकती है। एक रिपोर्ट 2013 की हाथ लगी जिसमें वर्षों पुरानी 'मातृसत्तात्मक' प्रथा को लेकर जानकारी मिली।
मेघालय को 'बादलों का निवास स्थान ' भी कहा जाता है और इसी निवास स्थान से जुड़ी यहां की हक़ीक़त ये है कि यहां की खासी समुदाय में विवाह के पश्चात पुरूषों का निवास स्थान पत्नी का घर होता है।राज्यभर में इस समुदाय की आबादी लगभग 50% है और भारत के पूरब का स्कॉटलैण्ड यानि मेघालय की राजधानी शिलांग में ज़्यादातर खासीयों की हीं जनसंख्या है।इस समुदाय की विशेषता ये है कि ये मातृसत्तात्मक परिवार होते हैं अर्थात महिला घर की मुखिया होती है।वंशावली नारी से ही चलती है,और बच्चों को उनकी मांओं का उपनाम दिया जाता है।आमतौर पर महिलाओं को समानता के साथ अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते सुना होगा,लेकिन यहां पुरुषों ने अपने अधिकारों के लिए 1960 के आस-पास जंग शुरु की थी,लेकिन उसी वक़्त खासी जाति की महिलाओं ने एक विशाल सशस्त्र प्रदर्शन किया,जिसके बाद पुरूषों का विरोध ठंडा पर गया।इसी वक़्त रिम्पाई थिम्पाई नामक एक संस्था का गठन होता है,जो वर्तमान में भी पुरूषों की अधिकार की लड़ाई लड़ रही है।भारतीय संविधान के अनुसार भारत की जनजातियां अपने पारंपरिक नियम ख़ुद बना सकती है।यहां हमेशा जाति के नियम और संविधान का टकराव होता है।जब लैंगिग मतभेद बहुत ज़्यादा बढ़ता है,तो न्यायालय को दख़ल देना पड़ता है।ऐसा सुनने में आता है कि पहले सिर्फ़ महिला अधिकारों की बात होती थी,पुरूषों की नही।लेकिन महिलाएं इस बात को ख़ारिज करती हैं।
रिम्पाई थिम्पाई संगठन के एक कार्यकर्ता पारियात सिंगखोंग इस परम्परा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहें हैं। शिलांग के 60 साल के कारोबारी पारियात का मानना है कि खासी जाति के पुरूषों के लिए यह तरीक़ा बिल्कुल ग़लत है।मर्दों पर किसी तरह की ज़िम्मेदारी नहीं होती है,तो वे जीवन को आसानी से लेते हैं।इसकी वज़ह से वह ड्रग्स और शराब में फ़स जाते हैं और उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है।अगर किसी पुरूष को अपनी सास के घर पर रहना पड़े,तो चुपचाप रहना पड़ता है।अाप सिर्फ़ बच्चा पैदा करने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं।कोई भी आपकी आवाज़ को सुनने को तैयार नही होता है।किसी भी फ़ैसले में पुरूषों का कोई दख़ल नही होता है।पारियात की इन बातों में किसी हद तक सच्चाई तो है ही। इसी संगठन से जुड़े 41 साल के टीबोर लंगखोंगजी का कहना है कि खासी जाति के पुरूषों के पास सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं है।उनके पास ज़मीन नहीं है,वे परिवार का बिजनेस नहीं चला सकते और वे किसी काम के नहीं हैं।
खासी परम्परा के मुताबिक़ परिवार की सबसे छोटी बेटी सभी सम्पत्ति की वारिस होती है।इसकी वज़ह ये है कि माता-पिता को लगता है कि बेटी मरते दम तक उनकी देखभाल कर सकती है और वे अपनी बेटी पर आश्रित रह सकते हैं।महिलाओं का कहना है कि दिल्ली की घटना निर्भया गैंगरेप की दुखद घटना पूरी दुनिया में सुर्खियों में रही,इससे मातृसत्तात्मक समाज की प्रासंगिकता बढ़ गई है,और ये एक अच्छी परम्परा है।इसकी वज़ह से अधिकार महिलाओं के साथ रहता है और कई बुराइयां दूर रहती है।


