सोमवार, 22 जनवरी 2018

मेघालय के मातृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की सियासी शून्यता!



3 मार्च 2018 को ये तय हो जाएगा कि मेघालय की सत्ता किसके हाथों में होगी।वर्तमान में मेघालय की कमान कांग्रेस के मुकुल एम.संगमा के हाथों में है।चुनाव आयोग के मुताबिक 18 फ़रवरी को मेघालय की जनता अपने मताधिकार का उपयोग कर 12वें मुख्यमंत्री का चयन करेगी।60 विधानसभा सीट वाले इस राज्य की राजनीति में पुरुषों का दबदबा है।महिला विधायकों की संख्या मात्र 5 है,यानि विधानसभा में मात्र 8.33% महिलायें प्रतिनिधित्व करती हैं।ये स्थिती तब है,जब मेघालय एक महिला प्रधान राज्य है।मेघालय एक महिला प्रधान राज्य है,ये सुनकर आप आश्चर्यचकित हो गए ना,लेकिन हक़ीकत यही है कि यहां की आधे से भी अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व महिलाएं करतीं है।आने वाले दिनों में यहां की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कितनी बढ़ती है,ये आगामी चुनाव में पता चल जाएगा।राजनीति में भले हीं महिलाओ की भागीदारी है,इससे इतर इस राज्य में महिलाओ की एक हक़ीकत साझा करने से पहले,ये कहना चाहता हूं मेघालय की राजनीति में हीं महिलाओं की स्थिति ऐसी हैं,ऐसा बिल्कुल नही है।दरअसल भारतीय राजनीति में अभी भी पुरूषवादी सोच के साथ और भी कई कारण है,जो राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में बाधक हैं।और ये एक अलग चर्चा का विषय है।
ख़ैर अब आते हैं उस हक़ीकत पर,जो पुरूषवादी सोच और पितृसत्तात्मक समाज से बिल्कुल उलट है।मैं रिसर्च तो मेघालय की राजनीति में युवा पीढ़ी की महिलाओं की भागीदारी पर कर रहा था,लेकिन मेरे हाथ ये हक़ीक़त लगी। इस हक़ीक़त के बारे में जब मैं पढ़ा,तो मेरे 'और जानने की लालसा' ने कई घटों तक रिसर्च करने के लिए प्रेरित किया।मगर अफ़सोस की कई घटों तक रिसर्च करने के बाद मेघालय की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और खासी समुदाय के बारे में हिन्दी या अंग्रेज़ी में मुझे कोई ताज़ा जानकारी हासिल नही हो पाई।शायद इसके पीछे भौगोलिक दुरी और भाषाई विषमता भी हो सकती है। एक रिपोर्ट 2013 की हाथ लगी जिसमें वर्षों पुरानी 'मातृसत्तात्मक' प्रथा को लेकर जानकारी मिली।
मेघालय को 'बादलों का निवास स्थान ' भी कहा जाता है और इसी निवास स्थान से जुड़ी यहां की हक़ीक़त ये है कि यहां की खासी समुदाय में विवाह के पश्चात पुरूषों का निवास स्थान पत्नी का घर होता है।राज्यभर में इस समुदाय की आबादी लगभग 50% है और भारत के पूरब का स्कॉटलैण्ड यानि मेघालय की राजधानी शिलांग में ज़्यादातर खासीयों की हीं जनसंख्या है।इस समुदाय की विशेषता ये है कि ये मातृसत्तात्मक परिवार होते हैं अर्थात महिला घर की मुखिया होती है।वंशावली नारी से ही चलती है,और बच्चों को उनकी मांओं का उपनाम दिया जाता है।आमतौर पर महिलाओं को समानता के साथ अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते सुना होगा,लेकिन यहां पुरुषों ने अपने अधिकारों के लिए 1960 के आस-पास जंग शुरु की थी,लेकिन उसी वक़्त खासी जाति की महिलाओं ने एक विशाल सशस्त्र प्रदर्शन किया,जिसके बाद पुरूषों का विरोध ठंडा पर गया।इसी वक़्त रिम्पाई थिम्पाई नामक एक संस्था का गठन होता है,जो वर्तमान में भी पुरूषों की अधिकार की लड़ाई लड़ रही है।भारतीय संविधान के अनुसार भारत की जनजातियां अपने पारंपरिक नियम ख़ुद बना सकती है।यहां हमेशा जाति के नियम और संविधान का टकराव होता है।जब लैंगिग मतभेद बहुत ज़्यादा बढ़ता है,तो न्यायालय को दख़ल देना पड़ता है।ऐसा सुनने में आता है कि पहले सिर्फ़ महिला अधिकारों की बात  होती थी,पुरूषों की नही।लेकिन महिलाएं इस बात को ख़ारिज करती हैं।
रिम्पाई थिम्पाई संगठन के एक कार्यकर्ता पारियात सिंगखोंग इस परम्परा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहें हैं। शिलांग के 60 साल के कारोबारी पारियात का मानना है कि खासी जाति के पुरूषों के लिए यह तरीक़ा बिल्कुल ग़लत है।मर्दों पर किसी तरह की ज़िम्मेदारी नहीं होती है,तो वे जीवन को आसानी से लेते हैं।इसकी वज़ह से वह ड्रग्स और शराब में फ़स जाते हैं और उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है।अगर किसी पुरूष को अपनी सास के घर पर रहना पड़े,तो चुपचाप रहना पड़ता है।अाप सिर्फ़ बच्चा पैदा करने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं।कोई भी आपकी आवाज़ को सुनने को तैयार नही होता है।किसी भी फ़ैसले में पुरूषों का कोई दख़ल नही होता है।पारियात की इन बातों में किसी हद तक सच्चाई तो है ही। इसी संगठन से जुड़े 41 साल के टीबोर लंगखोंगजी का कहना है कि खासी जाति के पुरूषों के पास सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं है।उनके पास ज़मीन नहीं है,वे परिवार का बिजनेस नहीं चला सकते और वे किसी काम के नहीं हैं।
खासी परम्परा के मुताबिक़ परिवार की सबसे छोटी बेटी सभी सम्पत्ति की वारिस होती है।इसकी वज़ह ये है कि माता-पिता को लगता है कि बेटी मरते दम तक उनकी देखभाल कर सकती है और वे अपनी बेटी पर आश्रित रह सकते हैं।महिलाओं का कहना है कि दिल्ली की घटना निर्भया गैंगरेप की दुखद घटना पूरी दुनिया में सुर्खियों में रही,इससे मातृसत्तात्मक समाज की प्रासंगिकता बढ़ गई है,और ये एक अच्छी परम्परा है।इसकी वज़ह से अधिकार महिलाओं के साथ रहता है और कई बुराइयां दूर रहती है।


बुधवार, 17 जनवरी 2018

हमारा लोकतंत्र ख़तरे में है नहीं,था!

मैं कानून का जानकार नहीं हूं,इसलिए कोई कानूनी बात नही करुंगा। मगर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क का नागरिक होने के नाते गर्व से कह सकता हूं कि, मेैं स्वस्थ और ख़तरामुक्त लोकतंत्र में निवास कर रहा हूं जहां हर कोई को खुलकर बोलने के लिए स्वतंत्र है। बीते शुक्रवार को मीडिया के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के चार  जज जस्टिस  जे चेलमेश्वर,जस्टिस रंजन गोगोई,जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कूरियन जोसेफ ने प्रेस कांन्फ्रेस कर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के रवैये से अपनी नाराज़गी को देशवासियों के सामने ज़ाहिर की थी।इसके अगले ही दिन शनिवार को जस्टिस रंजन गोगोई ने कोलकत्ता में कहा कि कोई संवैधानिक संकट नहीं है, तो वहीं केरल में जस्टिस कूरियन जोसेफ ने भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में कोई संवैधानिक संकट नहीं है। चार न्यायाधीशों ने सिर्फ़ प्रकिया से जुड़ा सवाल उठाया है।यह संस्थान का अंदरूनी मुद्दा है और संस्था इसका समाधान करेगी। ये कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसमें किसी बाहरी व्यक्ति की मध्यस्थता की ज़रूरत है। दो जजों के इस ह्रदय परिवर्तन से पहले, इन दोनों जजों के साथ दो और जज ने पीसी कर देश-दुनिया को बताया कि,दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पर ख़तरा है, क्योंकि हिन्दुस्तान की न्यायपालिका स्वतंत्र और निष्पक्ष नही है। एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी है। इनकी पीसी के बाद हिन्दुस्तान के जिन लोगों का न्यायालय से भरोसा उठा,उसको फिर से कैसे वापस किया जाएगा, ये एक सवाल है,जिसका अब जवाब तलाश करना होगा।
जैसे ही सुप्रीम कोर्ट के नम्बर दो जस्टिस जे चेलमेश्वर ने कहा था, "हम चारों इस बात पर सहमत हैं कि इस संस्थान को बचाया नही गया तो इस देश में लोकतंत्र ज़िन्दा नही रह पाएगा। स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका अच्छे लोकतंत्र की निशानी है। मेैं नही चाहता कि 20 साल बाद इस देश का कोई बुद्धिमान व्यक्ति ये कहे कि चेलमेश्वर,रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ ने अपनी आत्मा बेच दी है।" वैसे ही वो ज़मात शक्रिय हो गए, जिनको साल 2014 के बाद से बात-बात पर लोकतंत्र ख़तरे में नज़र आता है। अंगुली पर गिनती के इस ज़मात के लोग इतनी विविधता वाले हिन्दुस्तान को अपने नज़रिए और विचार से देखते हैं, असहमति होने पर तानाशाही,अघोषित आपातकाल और लोकतंत्र ख़तरे में है, जैसी अनाप-शनाप बातें करने लगते हैं। ऐसे लोग एक निरंकुश समाज चाहते हैं, जो कि सम्भव नहीं है। क्या हमारा लोकतंत्र इतना कमज़ोर है कि कभी-भी कोई-भी उठकर अपनी असहमति प्रकट कर दे, तो लोकतंत्र पर ख़तरा आ जाएगा?
शुक्रवार को जो कुछ भी हुआ था, उसको मेैं आज़ाद भारत के न्यायपालिका के इतिहास का काला अध्याय तो नही, लेकिन कभी ना भुलने वाला अध्याय ज़रूर कहूंगा। इस अध्याय की दो ख़ास बात ये रही कि जजों ने अपनी बात को बिना हिचक देश के सामने रखा और मीडिया में जजों के प्रेस कांन्फ्रेंस को तरज़ीह दी गई। ये दोनों बातें इस बात कि तो पुष्टि करती ही है कि हमारा लोकतंत्र स्वस्थ और ख़तरे से मु्क़्त है। वरना न्यायपालिका के
इतिहास का एक अध्याय ये भी है जिसको 'लोकतंत्र का काला अध्याय' के नाम से जाना जाता है। स्वलाभ के लिए इस काले अध्याय की रचयिता पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मीडिया पर नियंत्रण करने के साथ-साथ,न्यायपालिका को पुर्ण रुप से  शक्तिविहीन करने की कोशिश की थी, जिसमें तत्कालिक सफ़लता भी मिली थी। वर्तमान में सत्ताधारी पार्टी के भीतर से हीं विरोध के आवाज़ उठते हैं, आपातकाल में तो उच्च पद और सत्ताधारी लोग ने तो अपनी आत्मा की आवाज़ तक को अनसुना कर दिया था। आपातकाल की घोषणा करते वक़्त श्रीमती गांधी ने अपने मंत्रिमंडल तक की सलाह नहीं ली थी। आपातकाल के पहले हफ़्ते में ही संविधान के अनुच्छेद 14,21 और 22 को निलम्बित कर दिया गया था। ऐसा करके सरकार ने कानून की नज़र में सबकी बराबरी,जीवन और सम्पत्ति की सुरक्षा की गारंटी और गिरफ़्तारी के 24 घंटे के अन्दर अदालत के सामने पेश करने के अधिकारों को रोक दिया गया था। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में कई बार बदलाव किए गए। 29 जून 1975 को नज़रबन्दी के बाद बंदियों को कारण जानने का अधिकार भी ख़त्म कर दिया गया। नज़रबन्दी को एक साल से अधिक तक बढ़ाने का प्रावधान कर दिया गया। 16 जुलाई 1975 को इसमें बदलाव करके नज़रबन्दियों को कोर्ट में अपील करने के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया। 10 अक्टूबर 1975 के संसोधन द्वारा नज़रबन्दी के कारणों की जानकारी कोर्ट या किसी को भी देने को अपराध बना दिया गया। जिन 42 जजों ने नज़रबंदियों के मुकदमों में न्यायसंगत फ़ैसले दिए या देने की कोशिश की, उन सबका तबादला कर दिया गया था।नागरिकों के साथ दुर्व्यहार,अन्याय और अत्याचार को लेकर नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले वकीलो को भी नही बख़्शा गया था। वकीलों को ख़ासकर बार काउंसिल के अध्यझ राम जेठमलानी को सबक सिखाने के लिए संसद के कानून द्वारा अटॉर्नी जनरल को इसका अध्यझ बना दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने बिना दण्ड के जेल में न रखे जाने के अधिकार को छीनने की सरकार की कोशिश को असफ़ल कर दिया था। संविधान में 42 वां संसोधन कर इसके ज़रिए संविधान के मूल ढांचे को कमज़ोर करने, उसकी संघीय विशेषताओं को नुकसान पहुंचाने और सरकार के तीनों अंगों के संतुलन को बिगाड़ने का प्रयास किया गया।
अब आपके पास आज़ाद हिन्दुस्तान के न्यायालय की दो तस्वीर है।एक वर्तमानकाल की तो दूसरा आपातकाल की। अब आप ख़ुद तय कीजिए कि आप के लोकतंत्र की हालत कैसी है?







शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

जेपी की नज़र से हार्दिक की राजनीति को जानिए!

                           
गुजरात में लगातार छठी बार जीत दर्ज़ कर बीजेपी ने विपक्षियों को ये संन्देश दे दिया कि है कि उनके लिए गुजरात की सत्ता अभी दूर की कौड़ी है। यूपी में दो लड़कों की तर्ज़ पर, गुजरात में चार लड़कों ने मिलकर भाजपा के विजयी रथ को रोकने की हर सम्भव कोशिश की,लेकिन कोशिश नाकाम रही। गुजरात विधानसभा में कांग्रेस ब्रिगेड,जीत हासिल करने के लिए नये अवतार में दिखी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दलित नेता जिग्नेश मेवाणी,ओबीसी एकता मंच के नेता अल्पेश ठाकोर और पाटीदार नेता हार्दिक पटेल के सहयोग से भाजपा को घेरने की कोशिश करते रहें,लेकिन सफ़लता हाथ नही लगी।
इन तीन लड़कों में से एक ने यानि हार्दिक पटेल ने विधानसभा चुनाव से करीब दो साल(2015) पहले से ही पटेल राजनीति की शुरुआत कर दी थी। 25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद की रेैली में मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक क़रीब 5 लाख़ से ज़्यादा पाटीदार शामिल हुए थे। हार्दिक ने इस दिन को पाटीदार क्रान्ति दिवस घोषित किया। तब से लेकर अब तक हार्दिक की छवि एक युवा क्रान्तिकारी के रुप में बनी हुई है। ऐसे में इस युवा क्रान्तिकारी  की सियासत को समझने की ज़रुरत हैं। क्या आप इतिहास में ऐसे किसी क्रान्तिकारी के बारे में जानते हैं,जो तमाम मुश्किल हालात के बावज़ूद सिर्फ़ अपनी जाति और धर्म के समृद्धि के बारे में बात किया हो? हार्दिक ने अपने आन्दोलन की शुरुआत ही पाटीदारों के आरक्षण के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग(ओबीसी) में शामिल करने की मांग से की थी। 25 अगस्त 2015 की रैली के शाम अहमदाबाद पुलिस ने हार्दिक को गिरफ़्तार कर,आईपीसी की धारा 151 लगाई। हार्दिक की गिरफ़्तारी के बाद हिंसक प्रदर्शन शुरु हो गये थे, जिसके बाद गुजरात सरकार को कर्फ़्यू लगाना पड़ा और सेना बुलानी पड़ी थी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस हिंसा में 44 करोड़ की सरकारी सम्पत्ति का नुकसान हुआ था। सम्पूर्ण क्रान्ति के महानायक जयप्रकाश नारायण,जिनका आज के स्वघोषित क्रान्तिकारी बार-बार ज़िक्र करते हैं,ने कहा था "हिंसक क्रान्ति हमेशा किसी न किसी रुप में तानाशाही को जन्म देती है।"
शुरुआती दिनों में तो हार्दिक सिर्फ़ पाटीदारों के हक की लड़ाई गुजरात सरकार से लड़ते रहें। कहते रहें कि मुझे कुर्सी की कोई चाहत नहीं है,जो हमारे समुदाय को आरक्षण देगा,उसका समर्थन करेंगे। यही राग उन्होंने विधानसभा चुनाव में भी जारी रखा। साथ ही सियासतदां बनने की भी ख़्वाहिश ज़ाहिर कर दिया। कहा,इस बार मेरी चुनाव लड़ने की उम्र नही हुई है,लेकिन उम्र जब हो जाएगी तो चुनाव ज़रुर लड़ूंगा। सम्पूर्ण क्रान्ति के समय जेपी ने कहा था कि ''मेरी रुचि सत्ता पर कब्ज़े में नही है,मगर सत्ता पर जनता के नियंत्रण में है।''
जेपी की दो बातों को हमने आप के सामने रखा है।अब आप ख़ुद सोचिए कि क्रान्ति के नाम पर हार्दिक क्या कर रहें हैं?
गुजरात में पटेल समाज को समृद्ध और व्यापारी वर्ग का चेहरा माना जाता है। इनकी संख्या 12-15% तक है।जानकार बताते हैं कि इनका दुनिया की दो तिहाई डायमंड इंडस्ट्री पर कब्ज़ा माना जाता है। जिस वक़्त आन्दोलन की शुरूआत की उस समय विधानसभा में 50% विधायक समेत मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री भी पटेल समुदाय से हीं आते थें। पाटीदार समाज गुजरात का सबसे बड़ा लैंड होल्डिंग समाज है। 60 के दशक में भू-सुधार आन्दोलन हुआ था,इसमें पटेलों को सबसे ज़्यादा क्षत्रियों की ज़मीन मिली थी। गुजरात में जो नक़दी फ़सलें होती हैं,वे भी इसी समाज के पास है और हर साल इससे यह समाज लाख़ों रुपये कमाते हैं। गुजरात में ज़्यादातर स्कूल,कॉलेज और युनिवर्सिटी में पटेलों का स्वामित्व है। 
इन सब के इतर हार्दिक की अपनी दलील है। हार्दिक कहते हैं कि हाल के वर्षों में पटेलों में बेराज़गारी और अशिक्षा बढ़ी है,हम 12-15% लोग हैं हमारे घरों में चुल्हा नही जलता है,किसानों को फ़सल का उचित दाम नही मिल रहा है वगैरह-वगैरह। अब सवाल ये है कि ऐसी समस्याओं से देश का कौन सा राज्य या समुदाय मुक्त है?क्या गुजरात में पटेलों को छोड़ बाकि समुदाय मेंं ख़ुशहाली है? यदि आपका जवाब नहीं है तो आख़िर क्यों हार्दिक सिर्फ़ पटेलों की बात कर रहें हैं। उनको तो सारे समुदाय के बारे में बात करना चाहिए था। क्या हार्दिक ये चाह रहें हैं कि गुजरात ऐसा राज्य बन जाए,जहां सारे समुदाय के लोग अपनी मांग को लेकर आन्दोलन करें? जिस कांग्रेस ने 1980 में खाम समीकरण (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुसलमान) के तहत आरक्षण से पटेलों को बाहर का रास्ता दिखाया,उसी कांग्रेस से 2017 में आरक्षण की आस में विधानसभा चुनाव में हार्दिक ने पटेलों से सहयोग करवाया। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद,दूसरी अन्य पिछड़ी जातियां भी कोटे में आ गई। 









भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...