सोमवार, 25 दिसंबर 2017

रोटी और बेटी को बचाने की भी चुनौती थी लालू के कुशासन-काल में!

देवघर कोषागार से 89.4 लाख की अवैध निकासी मामले में,बिहार के पुर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा शनिवार को चारा घोटाले मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद,लालू के शासन काल की बात हो रही हैं।मैंने भी लालू के शासन काल को जानने के लिए कई लेखों को पढ़ा।लेखों को पढ़ने के बाद करीब-करीब तस्वीर साफ़ हो गई किस हाल में था मेरा बिहार।कारवां पत्रिका की 2010 की एक लेख हाथ लगी,जिसका शीर्षक है 'The Great Leap Forward?लेख अंग्रेजी में है जिसका हिन्दी रुपान्तरण पेश कर रहा हूं।लेख की बात बताने से पहले,ये बता देना चाहता हूं  कि उन लोगों के ये लेख ज़रुर पढ़ना चाहिए,जिनको ये पता है कि लालू के शासन-काल में भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी,असुरक्षा,रंगदारी,डकैती,बलात्कार,धोखाधड़ी, किडनैपिंग,घोटाला,नेताओं के संंरक्षण में पल रहे अपराधियों के कारण अपने चरम सीमा पर थी,के बावज़ूद भी लालू के शासन-काल को एक उपलब्धि के रुप में बताते हैं।कुछ लोग लालू की खुबियां ये कहते हुए बघारते हैं कि,लालू ने सर्वणों द्वारा दलितों पर होने वाले अत्याचार बंद करवा दिया था।ये कहते वक़्त भूल जाते हैं कि लालू के शासन-काल में बिहार को जातीय हिंसा की फैक्ट्री कही जाती थी।वो इसलिए की लालू काल में दलित,सर्वणों पर अत्याचार करते थें, जिसकी वज़ह से हिंसा होती थी।मतलब ऐसा कहा जा सकता है कि बदले की कार्रवाई के लिए लालू की सरकार थी।अपनी राजनीतिक निष्ठा की वज़ह से बदले की कार्रवाई को उपलब्धि बताने वालों को ये सोचना चाहिए कि एक नागरिक के रूप में समाज में भाईचारा को समाप्त करने में योगदान क्यों कर रहा है। ऐसे दल,नेता और उनके समर्थकों से दूरी बनानी चाहिए,जो बदले की कार्रवाई को उपलब्धि मानते हैं।किसी भी सरकार में हिंसा का होना,उस सरकार के अनियंत्रित और कमज़ोर शासन का प्रतीक होता है।किसी भी दल के समर्थक को ये समझना चाहिए वो पहले एक देश का नागरिक है,जिसकी ज़िम्मेदारी है कि समाज में भाईचारा कायम करें।हर बात को सियासत की नज़रिए से देखकर क्या समाज  का भला हो सकता है?मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बिहार पुलिस की वेबसाइट के मुताबिक,साल 2000 से 2005 के बीच 18189 हत्याएं हुईं।इन आंकड़ें को ध्यान में रखकर कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि 15 सालों में कितनी हत्याएं हुईं होंगी। हैरानी की बात यह है कि सिर्फ़ घोषित अपराधी ही मर्डर नहीं किया करते बल्कि सांसदों-विधायकों के इशारों पर भी हत्याएं होती थीं।शाम ढलने के बाद लोग लालटेन इसलिए नहीं जलाते थें कि क्या पता कब और किधर से बदमाश-डकैत आकर लूट लेंगे या हत्या कर देंगे।लोग जानते थें कि पुलिस तब आएगी जब हत्या या डकैती हो जाएगी।रोटी और बेटी को बचाने की चुनौती थी।
अब बात करते हैं पत्रिका में छपी लेख के बारे में।कहानी बिहार के उस ज़िले की है,जिसको कभी गांधी ने 'अहिंसा की धरती' कहा था,लालू के शासन-काल में उसको 'किडनैपिंग कैपिटल अॉफ़ बिहार' के नाम से जाना जाता था।चम्पारण की तरफ़ यात्रा करते वक़्त डरावनी चेतावनी सामने आती थी।चेतावनी ये होती थी कि घात लगाकर बैठे कुख्यात डाकुओं के द्वारा अापको 6 इंच छोटा किया जा सकता है।यदि डाकुओं से बच गए तो जेबकतरों द्वारा सबकुछ लूटा जा सकता है।1965 और 1971 भारत-पाक युद्ध के चम्पारण के योद्धा बद्री पाण्डेय ने कहा कि जब 1990 में लालू यादव पुर्ण बहुमत से चुनकर आए तो उस वक़्त मैं राजपूताना राइफल्स में था।बीमार माता-पिता की सुरक्षा के लिए मुझे समय से पुर्व नौकरी छोड़कर अपने गांव सिसवा बसंतपुर आना पड़ा।क्योंकि बदमाश उन लोगों को परेशान करते थें।गांव लौटकर मैंने टास्कफ़ोर्स के तर्ज़ पर 'शहीदी जत्था' का गठन किया।जत्थे के सदस्यों ने अपनी ज़िन्दगी  की कुर्बानी तक देकर 'बेटी और रोटी' की सुरक्षा करने की शपथ ली।अन्त में 324 पंचायतों में ग्राम सुरक्षा दल और विलेज डिफ़ेंस कमिटी बनाया।पंचायतवासियों को ख़ुद पर भरोसा रखने और हथियारों का प्रशिक्षण  दिया गया।1990 के दशक में पंचायतवासियों  के साहसिक और खूनी संघर्ष के बाद,सत्तन यादव,भांगर यादव और रामपाल यादव जैसे कुख्यात अपराधी शर्म से अपनी मुंछ मुड़वा लिए या तो आतंक को त्याग दिये।ग्राम सुरक्षा दल के अस्त्रों से डाकु डर गये थे।बहुत सारे डाकुओं ने हथियार छोड़कर नेपाल सीमा के पर स्थित स्पेशल टास्क फ़ोर्स के सामने  अात्म समर्पण कर दिया था।
बद्री पाण्डेय की कोशिश ये बताती है कि यदि समाज एकजुट होकर किसी भी बुराई के ख़िलाफ़ लड़ता है,तो उस बुराई को ख़त्म किया जा सकता है।ऐसी ही एकजुटता आज की ज़रुरत है समाजिक बुराईयों और भ्रष्टाचार को समाप्त करने करने के लिए।वरना नेता और उनके समर्थक अपने सियासी  फ़ायदे के लिए हमें एक-दूसरे से जाति-धर्म के नाम पर बाटते रहेंगे







मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

वो बुनियादी बातें जो कांग्रेस को भाजपा से सीखनी चाहिए।

ऐसा पहली बार है जब देश के 29 राज्यों में से 19 राज्यों में कोई एक पार्टी सरकार चला रही है।दो राज्य हिमाचल प्रदेश और गुजरात में जीत के बाद 19 राज्यों में भाजपा सरकार चला रही है।इससे पहले आज से 24 साल पहले कांग्रेस की 18 राज्यों में सरकार थी।साढे़ तीन साल पहले भाजपा की स्थिती ऐसी थी कि मात्र पांच राज्यों में मुख्यमंत्री,एक राज्य में गठबंधन की सरकार लेकिन अब 14 राज्यों में बीजेपी के मुख्यमंत्री,पांच राज्यों में गठबंधन की सरकार है।आख़िर कैसे?इस बात पर तमाम राजनीतिक दलों और राजनीतिशास्त्र के शोधार्थियों को शोध करना चाहिए।इंदिरा गांधी के समय 23 राज्य थें,अब 29 राज्य है।साल 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद चुनाव-दर-चुनाव कांग्रेस के हाथ से 10 राज्य निकलता चला गया।भाजपा को लगातार मिलती जीत कोई रहस्य तो है नही।कहीं-ना-कहीं बीजेपी के नेता और कार्यकर्ता अपने संगठन को मज़बूत करने के लिए ज़मीनी स्तर पर कड़ी मेहनत तो करते ही है।बीजेपी के चुनाव प्रचार अभियान के तरीके को यदि गौर से देखा जाए तो पता चलता है कि बाकि दलों की अपेक्षा बीजेपी ज़्यादा आक्रामक दिखती है।ऐसा प्रतीत होता है बीजेपी के लिए हरेक चुनाव किसी अंतिम मौके की तरह होता है।कार्यकर्ता से लेकर तमाम केन्द्रीय मंत्रियों के साथ,अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री समेत राज्यमंत्री भी चुनाव प्रचार करते है।ताज़ा उदाहरण गुजरात है।जितनी सिद्दत से एक दल के रूप में भाजपा के नेता चुनाव के वक़्त ज़मीनी स्तर पर काम करते हैं,उतनी ही सिद्दत से उसके सहयोगी संगठनों के लोग स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर काम करते हैं,जो भाजपा को ज़मीनी स्तर से मज़बूती प्रदान करता है।इसी ज़मीनी स्तर की मज़बूती की कमी कांग्रेस में हमेशा दिखाई देती है।हर चुनाव में राजनीति के जानकार इस बात की तरफ़ इशारा करते तो करते हीं हैं, लेकिन पता नही कांग्रेस को नेता,सहयोगी संगठनों और कार्यरता के बीच एकजुटता वाला मॉडल क्यूं पसंद नहीं आता है।
अब उन बुनियादी बातों के बारे में बात करते हैं,जो हर राजनीतिक दल से भाजपा को अलग और सशक्त बनाती है।जो कांग्रेस में नहीं दिखती है।
-जब से अमित शाह पार्टी अध्यक्ष बने है।वो मतदाता सूची के हर एक पन्ने में से एक पन्ना प्रमुख को चुनते हैं।पन्ना प्रमुख की ज़िम्मेदारी होती है कि उनकी सूची में जितने मतदाता होते हैं उनको केन्द्र सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को समझाकर अपने पाले में लाना।इस पद्धति का जनक अमित शाह को माना जाता है।
-ग्रामीण और शहरी इलाकों के हर वर्ग के लोगों में भाजपा की मज़बूत पकड़ का होना।
-प्रचार के दौरान बीजेपी का 'वन मैन आर्मी' ना होकर सामूहिक रूप से मेहनत करना।
-क्षेत्रीय भाषा बोलने वाले लोकप्रिय नेताओं का होना भाजपा की मज़बूती का एक सबसे बड़ा कारण है।जिसकी कमी कांग्रेस में गुजरात चुनाव में भी दिखी।प्रधानमंत्री से लेकर तमाम स्थानीय नेताओं ने गुजराती में लोगों को संबोधित किया।
एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विपक्ष का मज़बूत होना बहुत ज़रूरी होता है।और विपक्ष तब ही मज़बूत हो सकता है,जब दल के किसी एक नेता के भरोसे या उसके कार्यकर्ता उस दल के प्रमुख नेता के भरोसे काम नहीं करेंगे।ये बात बीजेपी में दिखती है,शायद इसी वज़ह से सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की सबसे बड़ी सियासी पार्टी है।

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

जानिए, पद्मावती विवाद के लिए कैसे दोनों पक्ष ज़िम्मेदार हैं!

‘इतिहास में कोई पद्मावती थी भी या नही?’ का पता तमाम विवाद और आरोपों के बाद भी पता नही चल पाया।इतिहास को ग़लत बताते हुए फ़िल्म ‘पद्मावती’ से वास्तविक ‘पद्मावती’ के होने की बात को बताने का जो हिंसक तरीका अपनाया गया था,एक लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद ख़तरनाक है।वैश्विक शान्ति के दूत महात्मा गांधी अपनी धरती हिन्दुस्तान,जहां से दुनियाभर में शान्ति पहुंचाने में अपनी ज़िन्दगी खपा दी।उन्हीं की धरती पर विवादित फ़िल्म को लेकर किसी के सिर कलम करने,तो किसी के नाक काटने तक की धमकी,आगजनी और किसी भी तरह की हिंसा का होना एक गंभीर और सोचनीय सवाल है,जिसपे व्यक्तिगत और सामाजिक रुप से सोचा जाना चाहिए।गांधी जी के कथन “अहिंसा सबसे बड़ा कर्तव्य है।यदि हम इसका पालन नही कर सकते हैं तो हमे इसकी भावना को अवश्य समझना चाहिए और जहां तक सम्भव हो हिंसा से दूर रहकर मानवता का पालन करना चाहिए।” को उग्र मत के सिद्धान्त को मानने वाले उन तमाम संगठनो और इंसानो के लिए,गली-मुहल्ले के चप्पे-चप्पे पर बड़े-बड़े अक्षरों में छपवा कर चिपका देना चाहिए।इस नेक स्व और परसंबंध कार्य की ज़िम्मेदारी समाज के हर व्यक्ति को निभाना चाहिए।
संजय लीला भंसाली की विवादित फ़िल्म पद्मावती ने पहली बार पद्मावती के काल्पनिक और वास्तविक चरित्र को लेकर साहित्यकारों और इतिहासकारों को सीरियस चुनौती पेश की। राजस्थान के राजपुताने के इतिहास पर काम करने वाली इरा चंद ओझा ने बीबीसी से बातचीत में साफ़-साफ़ कहा है कि ये चरित्र पुरी तरह काल्पनिक है।हिन्दी साहित्य के विद्वान रामचन्द्र शुक्ल ने भी इसे काल्पनिक चरित्र माना है।पद्मावती के काल्पनिक चरित्र होने की पुष्टि इस बात से भी होती है कि फ़िल्म पद्मावती, महाकाव्य ‘पद्मावत’ पर आधारित है जिसकी रचना 16वीं शताब्दी की है,जबकि अलाउद्दीन ख़िलजी का काल 14वीं शताब्दी की शुरुआत से शुरु होता है।इसलिए इस बात की संभावना ज़्यादा है कि महाकाव्य ‘पद्मावत’ के सूफ़ी कथाकार मलिक मुहम्मद जायसी ने कहानी को आगे बढ़ाने के लिए कल्पना का सहारा लिया हो।अलाउद्दीन के काल में जो रचनाएं लिखी गईं,उनमें तो पद्मावती नाम का कोई चरित्र भी नही है।
जनवरी में शुरु हुए इस विवाद को अबतक दोनों पक्षों की एक के बाद एक ग़लत कदम ने आग में घी का काम किया।करणी सेना और उनके समर्थकों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में जो उपद्रव मचाया,वो सरकारों की सियासी मज़बूरियां और नाकामियों का ही प्रमाण है।हंगामेबाज़ो को ये समझना होगा कि उनके कृत्यों से समाज में बुरा प्रभाव पड़ता है।किसी भी विवाद को सुलझाने का एक मात्र तरीका संवाद ही है।समाज के हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है कि किसी भी विवाद में हिंसा को बढ़ावा ना दें।फ़िल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली,उनके समर्थन में सिर्फ़ अभिव्यक्ति की आज़ादी एवं रचनात्मकता स्वतंत्रता की बात करने वाले और राजपूत समाज को भला-बुरा कहने वाले ये भूल गये कि बिना प्रतिबंध वाला कोई भी व्यक्ति और समाज अव्यवस्था के रसातल की ओर चला जाएगा। भंसाली और करणी सेना जैसों के समर्थन में खड़े लोगों, ख़ासकर पत्रकारों के साथ मुख्यत: तीन समस्या होती है।पहला-वो एकपक्षीय हो जाते हैं,दूसरा- अपनी विचारधारा के अनुसार हीं चीजों को पढ़ते हैं और तीसरा- स्वतंत्रता के बारे में सिर्फ़ इतना ही जानतें हैं कि ‘हम’ यानि कर्ता जो भी कर रहा है वो सही है। ऐसे लोगों के लिए मैं एक जानकारी दे रहा हूं। उदारवाद के इतिहास के सबसे प्रभावशाली दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल का एक 'हानि सिद्धान्त' है।इस सिद्धांत को बताने से पहले ये बता दें रहा हूं मिल के अनुसार प्रतिबंध तभी लगाए जा सकते हैं जब किसी को पहुंचने वाली हानि अत्यंत गंभीर हो। सामान्य नुकसान के लिए कानूनी शक्ति के स्थान पर मात्र सामाजिक स्तर पर अमान्य करार देने की राय देते है।मिल ने अपने सिद्धांत में स्वसंबंद्ध और परसंबंद्ध कार्यों में अन्तर स्पस्ट किया है।स्वसंबंद्ध कार्य वे हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि मेरा कार्य आपको किसी प्रकार से प्रभावित नहीं करता है तो इससे आपका कोई लेना देना नहीं हैं। परसंबंद्ध कार्य वे हैं जिनके बारे में यह कहा जा सकता है कि कर्ता के किसी गतिविधियों अथवा क्रियाकलापों से किसी को हानि पहुंचती है तो किसी-न-किसी बाहरी सत्ता का कर्त्तव्य है कि उन हानिकारक कार्यों से सुरक्षा प्रदान करें। स्वतंत्रता से संबंधित विषयों में राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसे क्रियाकलाप अथवा गतिविधियां करने से रोक सकता है जो किसी अन्य के लिए हानिकारक हो।अब आप परसंबंद्ध से फ़िल्म पद्मावती के विवाद के कारणों को जोड़ कर देखिए,पता चल जाएगा कि भंसाली ने कैसे समाज के एक जनमानस ठेस पहुंचाया है।
अब यहां पर फ़िल्म पद्मावती को लेकर भंसाली की एक के बाद की गई कुछ ग़लतियों के बारे में बताता हूं,जो विवाद का मुख्य कारण है-
-फ़िल्म को लेकर जब शुरू से ही विवाद है तो ट्रेलर में क्यों नहीं लिखा की फ़िल्म काल्पनिक है?
-करणी सेना और राजपूत सभा के अनुसार जब भंसाली ने राजपूत संगठनों से वादा किया था कि जब भी फिल्म -रिलीज होगी उससे पहले राजपूत संगठनों को यह फिल्म दिखाई जाएगी। उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?
-फ़िल्म को लेकर जब पहली बार विवाद हुआ,तब से लेकर अबतक भंसाली ने विवाद को सुलझाने के लिए दूसरे पक्षों से बात क्यों नहीं की।यदि दूसरे पक्ष ने बात करने से इंकार किया तो लोगों को क्यों नहीं बताया?
-फ़िल्म को आख़िर भंसाली ने किस उद्देश्य से केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड को दिखाने से पहले कुछ चुनिंदा पत्रकारों को दिखाया?
-भंसाली जब संसदीय समिति के सामने ये कह रहें हैं कि फ़िल्म पद्मावती एक काल्पनिक है,तो किरदारों का नाम ऐतिहासिक क्यों रखा है?


शनिवार, 9 दिसंबर 2017

गुजरात के किसानों का ऋण कैसे होगा माफ़?

भारत एक कृषि प्रधान देश है, ये हम सब जानते है लेकिन अब हमें इस बात को भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि भारतीय किसान, सियासत का एक मात्र ज़रिया भर बन गये है। वो इसलिए कि किसानों की बेहतरी की बात चुनाव के वक़्त सारे राजनीतिक दल करते हैं। चुनाव प्रचार में नेतावाणी में कर्ज़माफ़ी से किसानों की समस्याओं का समाधान हो जाएगा ही किसानों की असल समस्या है। किसानो को ये समझना होगा कि उनकी समस्या के लिए प्रचार के वक़्त ये नेता लोग जो कर्ज़माफ़ी करने की बात करते है, वो दरअसल इस बात की ओर इशारा होता है कि यदि हम चुन के आएंगे तो भी आपकी मूल समस्या की ओर हम ध्यान नही देंगे। कुछ ऐसा ही गुजरात चुनाव में भी हो रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान सीएम विजय रुपाणी ने किसानो को तीन लाख रुपये तक का ब्याज़ मुक्त कर्ज़ देने की घोषणा की है, तो वहीं राहुल गांधी ने कहा है कि यदि गुजरात में हमारी सरकार बनी तो हम किसानों का कर्ज़ 10 के दिन भीतर माफ़ करेंगे।
साल 2014 के लोकसभा चुनाव के समय गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री ने कहा था कि केन्द्र में यदि भाजपा की सरकार बनेगी तो किसानों की फ़सल के दाम दफ़्तर में बैठकर नही, बल्कि किसान की मेहनत-मज़दूरी पर 50% ज़्यादा पैसे मिलें इस तरह से तय किये जायेंगे। लेकिन तब से लेकर आज तक दिन-प्रतिदिन किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है।
यदि हम गुजरात में सीएस रुपाणी और राहुल के बयानों के सन्दर्भ में किसानों के बारे में बात करें तो,मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25 लाख़ किसान हैं,जो हर साल कर्ज़ लेते हैं।नेशनल सैम्पल सर्वे,भारत सरकार के 2014 रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में 49 लाख़ किसान है,जिनकी एक महीने की आय प्रति परिवार सिर्फ़ 7926 रुपये है।आय के आधार गुजरात के किसानों का स्थान 12 वां है।आईचौक.इन पर रुपाणी के वादे को लेकर एक लेख छपी है,जिसमें अर्थशास्त्री हेमंत शाह ने कहा है कि सरकार के ज़रिये ये एक चक्रव्यूह रचा जा रहा है,जिसके ज़रिए किसान और शहर में रहने वाले मध्यम वर्ग को एक-दूसरे के सामने खड़ा किया जा रहा है।मध्यम वर्ग के लोगों को लगता है कि यहां सबकुछ किसानों के लिये ही किया जा रहा है।लेकिन हकीकत ये है कि किसान सबसे ज़्यादा परेशान हैं।3 लाख तक के जिस लोन पर सरकार बिना ब्याज़ के कर्ज़ देने की बात कर रही है,उसे ही देंखे तो किसान को ये लोन 7 प्रतिशत के ब्याज़ दर पर सब्सिडी दी जाती थी।इसमें से 4 प्रतिशत ब्याज़ के पैसे केन्द्र सरकार देती थी और राज्य सरकार 2 प्रतिशत ब्याज़ देती थी।किसानों को सिर्फ़ 1% ब्याज़ देना होता पड़ता था।हालांकि अब किसान को एक प्रतिशत ब्याज़ भी नही देना होगा।ये प्रतिशत ब्याज़ सरकार भरेगी।सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस ब्याज़ को भरने की वज़ह से सरकार पर 700 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ आएगा।
अब राहुल गांधी के वादे की बात करें तो, राहुल ने कहा है कि हम किसानों का कर्ज़ 10 दिन के भीतर किसानों का कर्ज़ माफ़ करेंगे।इससे पहले राहुल गांधी ने यूपी सरकार द्वारा किसानों के कर्ज़माफ़ी के फ़ैसले का स्वागत करते हुए कहा कि वो खुश हैं कि बीजेपी ऐसा करने पर मज़बूर हुई।किसानों को राहत देने के लिए केन्द्र सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करना चाहिए।राज्यों के नाम पर किसानों के साथ भेदभाव करना ठीक नहीं है।
इन सब के इतर केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यूपी सरकार के ऋण माफ़ी के फ़ैसले के वक़्त ही स्पस्ट कर दिया था कि किसानों का कर्ज़ माफ़ करना केन्द्र सरकार के बस की नहीं है।आगे उन्होंने कहा था कि ऐसा सम्भव नही है कि केन्द्र सरकार एक राज्य का कर्ज़ माफ़ कर दे और बाकी राज्यों का नही।राज्य सरकार यदि ऐसा करती है तो इसका ख़र्च भी उसे ही उठाना होगा।ऐसे में सवाल ये बनता है कि राहुल के कर्ज़ माफ़ी का ऐलान कैसे कर दिया है?
किसानों की समस्याओं में एक समस्या ये भी है कि उनके जो रहनुमा हैं,जिसकी ज़िम्मेदारी है कि वो बेहतरी के लिए सरकार से मांग करे,मगर अफ़सोस कि वो किसी ना किसी राजनीतिक दल का झण्डा थामें हुए हैं।



भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...