देवघर कोषागार से 89.4 लाख की अवैध निकासी मामले में,बिहार के पुर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा शनिवार को चारा घोटाले मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद,लालू के शासन काल की बात हो रही हैं।मैंने भी लालू के शासन काल को जानने के लिए कई लेखों को पढ़ा।लेखों को पढ़ने के बाद करीब-करीब तस्वीर साफ़ हो गई किस हाल में था मेरा बिहार।कारवां पत्रिका की 2010 की एक लेख हाथ लगी,जिसका शीर्षक है 'The Great Leap Forward?लेख अंग्रेजी में है जिसका हिन्दी रुपान्तरण पेश कर रहा हूं।लेख की बात बताने से पहले,ये बता देना चाहता हूं कि उन लोगों के ये लेख ज़रुर पढ़ना चाहिए,जिनको ये पता है कि लालू के शासन-काल में भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी,असुरक्षा,रंगदारी,डकैती,बलात्कार,धोखाधड़ी, किडनैपिंग,घोटाला,नेताओं के संंरक्षण में पल रहे अपराधियों के कारण अपने चरम सीमा पर थी,के बावज़ूद भी लालू के शासन-काल को एक उपलब्धि के रुप में बताते हैं।कुछ लोग लालू की खुबियां ये कहते हुए बघारते हैं कि,लालू ने सर्वणों द्वारा दलितों पर होने वाले अत्याचार बंद करवा दिया था।ये कहते वक़्त भूल जाते हैं कि लालू के शासन-काल में बिहार को जातीय हिंसा की फैक्ट्री कही जाती थी।वो इसलिए की लालू काल में दलित,सर्वणों पर अत्याचार करते थें, जिसकी वज़ह से हिंसा होती थी।मतलब ऐसा कहा जा सकता है कि बदले की कार्रवाई के लिए लालू की सरकार थी।अपनी राजनीतिक निष्ठा की वज़ह से बदले की कार्रवाई को उपलब्धि बताने वालों को ये सोचना चाहिए कि एक नागरिक के रूप में समाज में भाईचारा को समाप्त करने में योगदान क्यों कर रहा है। ऐसे दल,नेता और उनके समर्थकों से दूरी बनानी चाहिए,जो बदले की कार्रवाई को उपलब्धि मानते हैं।किसी भी सरकार में हिंसा का होना,उस सरकार के अनियंत्रित और कमज़ोर शासन का प्रतीक होता है।किसी भी दल के समर्थक को ये समझना चाहिए वो पहले एक देश का नागरिक है,जिसकी ज़िम्मेदारी है कि समाज में भाईचारा कायम करें।हर बात को सियासत की नज़रिए से देखकर क्या समाज का भला हो सकता है?मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बिहार पुलिस की वेबसाइट के मुताबिक,साल 2000 से 2005 के बीच 18189 हत्याएं हुईं।इन आंकड़ें को ध्यान में रखकर कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि 15 सालों में कितनी हत्याएं हुईं होंगी। हैरानी की बात यह है कि सिर्फ़ घोषित अपराधी ही मर्डर नहीं किया करते बल्कि सांसदों-विधायकों के इशारों पर भी हत्याएं होती थीं।शाम ढलने के बाद लोग लालटेन इसलिए नहीं जलाते थें कि क्या पता कब और किधर से बदमाश-डकैत आकर लूट लेंगे या हत्या कर देंगे।लोग जानते थें कि पुलिस तब आएगी जब हत्या या डकैती हो जाएगी।रोटी और बेटी को बचाने की चुनौती थी।
अब बात करते हैं पत्रिका में छपी लेख के बारे में।कहानी बिहार के उस ज़िले की है,जिसको कभी गांधी ने 'अहिंसा की धरती' कहा था,लालू के शासन-काल में उसको 'किडनैपिंग कैपिटल अॉफ़ बिहार' के नाम से जाना जाता था।चम्पारण की तरफ़ यात्रा करते वक़्त डरावनी चेतावनी सामने आती थी।चेतावनी ये होती थी कि घात लगाकर बैठे कुख्यात डाकुओं के द्वारा अापको 6 इंच छोटा किया जा सकता है।यदि डाकुओं से बच गए तो जेबकतरों द्वारा सबकुछ लूटा जा सकता है।1965 और 1971 भारत-पाक युद्ध के चम्पारण के योद्धा बद्री पाण्डेय ने कहा कि जब 1990 में लालू यादव पुर्ण बहुमत से चुनकर आए तो उस वक़्त मैं राजपूताना राइफल्स में था।बीमार माता-पिता की सुरक्षा के लिए मुझे समय से पुर्व नौकरी छोड़कर अपने गांव सिसवा बसंतपुर आना पड़ा।क्योंकि बदमाश उन लोगों को परेशान करते थें।गांव लौटकर मैंने टास्कफ़ोर्स के तर्ज़ पर 'शहीदी जत्था' का गठन किया।जत्थे के सदस्यों ने अपनी ज़िन्दगी की कुर्बानी तक देकर 'बेटी और रोटी' की सुरक्षा करने की शपथ ली।अन्त में 324 पंचायतों में ग्राम सुरक्षा दल और विलेज डिफ़ेंस कमिटी बनाया।पंचायतवासियों को ख़ुद पर भरोसा रखने और हथियारों का प्रशिक्षण दिया गया।1990 के दशक में पंचायतवासियों के साहसिक और खूनी संघर्ष के बाद,सत्तन यादव,भांगर यादव और रामपाल यादव जैसे कुख्यात अपराधी शर्म से अपनी मुंछ मुड़वा लिए या तो आतंक को त्याग दिये।ग्राम सुरक्षा दल के अस्त्रों से डाकु डर गये थे।बहुत सारे डाकुओं ने हथियार छोड़कर नेपाल सीमा के पर स्थित स्पेशल टास्क फ़ोर्स के सामने अात्म समर्पण कर दिया था।
बद्री पाण्डेय की कोशिश ये बताती है कि यदि समाज एकजुट होकर किसी भी बुराई के ख़िलाफ़ लड़ता है,तो उस बुराई को ख़त्म किया जा सकता है।ऐसी ही एकजुटता आज की ज़रुरत है समाजिक बुराईयों और भ्रष्टाचार को समाप्त करने करने के लिए।वरना नेता और उनके समर्थक अपने सियासी फ़ायदे के लिए हमें एक-दूसरे से जाति-धर्म के नाम पर बाटते रहेंगे
अब बात करते हैं पत्रिका में छपी लेख के बारे में।कहानी बिहार के उस ज़िले की है,जिसको कभी गांधी ने 'अहिंसा की धरती' कहा था,लालू के शासन-काल में उसको 'किडनैपिंग कैपिटल अॉफ़ बिहार' के नाम से जाना जाता था।चम्पारण की तरफ़ यात्रा करते वक़्त डरावनी चेतावनी सामने आती थी।चेतावनी ये होती थी कि घात लगाकर बैठे कुख्यात डाकुओं के द्वारा अापको 6 इंच छोटा किया जा सकता है।यदि डाकुओं से बच गए तो जेबकतरों द्वारा सबकुछ लूटा जा सकता है।1965 और 1971 भारत-पाक युद्ध के चम्पारण के योद्धा बद्री पाण्डेय ने कहा कि जब 1990 में लालू यादव पुर्ण बहुमत से चुनकर आए तो उस वक़्त मैं राजपूताना राइफल्स में था।बीमार माता-पिता की सुरक्षा के लिए मुझे समय से पुर्व नौकरी छोड़कर अपने गांव सिसवा बसंतपुर आना पड़ा।क्योंकि बदमाश उन लोगों को परेशान करते थें।गांव लौटकर मैंने टास्कफ़ोर्स के तर्ज़ पर 'शहीदी जत्था' का गठन किया।जत्थे के सदस्यों ने अपनी ज़िन्दगी की कुर्बानी तक देकर 'बेटी और रोटी' की सुरक्षा करने की शपथ ली।अन्त में 324 पंचायतों में ग्राम सुरक्षा दल और विलेज डिफ़ेंस कमिटी बनाया।पंचायतवासियों को ख़ुद पर भरोसा रखने और हथियारों का प्रशिक्षण दिया गया।1990 के दशक में पंचायतवासियों के साहसिक और खूनी संघर्ष के बाद,सत्तन यादव,भांगर यादव और रामपाल यादव जैसे कुख्यात अपराधी शर्म से अपनी मुंछ मुड़वा लिए या तो आतंक को त्याग दिये।ग्राम सुरक्षा दल के अस्त्रों से डाकु डर गये थे।बहुत सारे डाकुओं ने हथियार छोड़कर नेपाल सीमा के पर स्थित स्पेशल टास्क फ़ोर्स के सामने अात्म समर्पण कर दिया था।
बद्री पाण्डेय की कोशिश ये बताती है कि यदि समाज एकजुट होकर किसी भी बुराई के ख़िलाफ़ लड़ता है,तो उस बुराई को ख़त्म किया जा सकता है।ऐसी ही एकजुटता आज की ज़रुरत है समाजिक बुराईयों और भ्रष्टाचार को समाप्त करने करने के लिए।वरना नेता और उनके समर्थक अपने सियासी फ़ायदे के लिए हमें एक-दूसरे से जाति-धर्म के नाम पर बाटते रहेंगे


