गुरुवार, 27 जुलाई 2017

.....और वो फ़र्श पर बैठ गए।

आज डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम की दूसरी पुण्य तिथि है।आज ही के दिन साल 2015 में,कलाम साहब हमलोग को छोड़ कर चले गए।भारत माता के इस सपूत का अचानक से हम सब को छोड़ के चला जाना अपूर्णीय छति है।अब जब आज वो हमारे बीच नही होते हुए भी हमारे बीच रहते हैं,सिर्फ़ अपने कर्मों की वज़ह से।ऐसे ही लोगों को देखकर कभी-कभी गर्व भी होता है और डर भी लगता है कि ये ना होते तो कैसा होता हमारा देश।कलाम साहब एक किताब थें,जिसका हर पन्ना आपको बेहतर इंसान बनाता है।वो अपनी प्रेरणादायी लेखन और सुवचन के कारण अब भी हमारे बीच हैं।ऐसा ही कुछ वाक्य मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं।
कलाम साहब,जब वो राष्ट्रपति थें तो उनके कार्यकाल के अन्तिम दिनों में उनको रामनाथ गोयनका पुरस्कार कार्यक्रम में बुलाया गया ।पुरस्कार वितरण के बाद इस बात पर बहस होने लगी की 'क्या अच्छी पत्रकारिता बुरा व्यवसाय है?बहस का नतीज़ा आज़ तक तो नही निकला,ना निकलेगा।मंच पर उपस्थित राजदीप सरदेसाई ने कलाम साहब को सलाम और बाय-बाय सर कहा।इसी मंच पर ही उपस्थित बरखा दत्त ने कहा-"राष्ट्रपति जी एन राम आपकी ही बातों का जवाब दे रहें हैं,सुनते जाइए।कलाम साहब लौटते हैं और मंच पर पालथी मार कर बैठ जाते हैं।एन राम और उनके बीच बहस होती है कि विकास कैसे हो?बाद में कलाम ये कहकर चलते बने की इस पर बहस ज़रूर कीजिए,लेकिन ध्यान रखिए कि लोगों को ग़रीबी रेखा से कैसे ऊपर लाया जाए।बात क्या हुई ये महत्वपूर्ण नही है,एक राष्ट्रपति का इस तरह फ़र्श पर बैठ जाना सबको हैरान कर गया।
अब आगे उनकी बातों को शब्दसह लिख रहा हूं।जब कलाम साहब बोलने लगे तो सब लोग चुपचाप उन्हें सुनने लगे।उन्होंने ने एन राम से कहा-
"No,mister Ram.I don't want to take any of ur agenda.you got an agenda,ur meeting ok.but the agenda what I have suggest that,you can calibrate what is the National development?That is the 2 hundred and 20 million people on below poverty line.so how do u bring them up?So that is the agenda.there may be many development going on to agriculture to any subject.but agenda is very clear.2 hundred and 20 million people of below poverty line.how do you live them up?What contribution you make?If u want to economic development of the nation is not a end of it.i have define it.National prosperity is that equal to A+B+C।
A-Gdp that the economic development.
B is 2 hundred 20 million people,how year lifting up. every year reduce the below poverty line and third
C is that,no body talked about,that is value system.value system comes from 200 million house are there.how many houses are joint family?How many of u like joint family ?Lift ur hand.so u promote such type of thing."
ये कलाम साहब का कथन था।अन्त के 5 पंक्ति को दुबारा पढ़िये।उन्होंने वहां उपस्थित लोगों से पूछा कि आप लोगों में से कितने लोग सम्मिलित परिवार में रहना चाहते हैं,हाथ उठाये।हाथ उठाने की औसत को देखकर मैं हैरान हो गया।
                                   तो ऐसे थे हमारे कलाम साहब।

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

दो भीड़-अन्तर बस कृत्य का।

"I don't think it(hate crime) is new in India.it is feudal in nature.Today they shake the conscience.you can't say lynching or hate crime are something new.I think they are over hyped and over reported."
ये कहना है उस मंत्रालय के सचिव का,जिसकी ज़िम्मेदारी देश में सुरक्षा,शान्ति और सौहार्द बनाए रखने की है।राजीव महर्षि का ये बयान मुझे शोध के दरमयान मिली,जो 25 जून 2017 को India today की वेबसाइट पर छपी है।महर्षि के इस बयान से कई लोग सहमत और असहमत हो सकते हैं।मेरी जो असहमती है,जहां तक मैं उनके बयान को समझ पा रहा हूं।लाचारी और बेबसी से भरा ये बयान बता रहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या से इनको कोई फ़र्क नही पड़ता है।ये बात सही है कि भीड़ के द्वारा किसी की हत्या कर देना कोई नई बात नही है।लेकिन क्या ये कह कर अपनी ज़िम्मेदारी से किनारा करना कैसे उचित है?मीडिया को दोषी ठहराना फ़ैशन हो गया,जो उन्होंने भी किया।उन्होंने कहा कि भीड़ के द्वारा की गई हत्या को मीडिया ज़्यादा प्रचारित और रिपोर्ट कर रही है।महर्षि साहब को ये बात कहने से पहले सोचना चाहिए कि मीडिया क्यों रिपोर्ट कर रही है? क्या ऐसी घटनाएं नही हो रही है?या फ़िर मीडिया की रिपोर्ट से सरकार की छवि ख़राब होने की चिन्ता है?महर्षि साहब,हत्या के कारण कुछ भी हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि मीडिया ज़्यादा रिपोर्ट कर रही है,बिल्कुल अनुचित है।आप अपनी ज़िम्मेदारी निभाइए और मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी निभाने दीजिए।हाल ही में इंण्डिया स्पेण्ड ने न्यूज़ रिपोर्ट के आधार पर बताया कि साल 2017 के पहले 6 महीने में गाय को लेकर 20 हमले हुए,जो साल 2016 से 75% ज़्यादा है।यह आंकड़ा अब तक के सबसे ख़राब साल 2010 से भी ज़्यादा है।
भीड़ के अलग-अलग स्वरूप होते हैं।लेकिन जिस भीड़ की अब चर्चा हो रही है वो है हिंसक भीड़।जो कुछ लोग मिलकर शक और अफ़वाह के आधार पर किसी की हत्या करने के लिए तैयार करते हैं।जुनैद और मोहम्मद अयुब पंडित इसका उदाहरण हैं।राजनीति से प्रेरित इन कुछ लोगों की वज़ह से कोई धर्म या जाति बदनाम हो जाता है।मीडिया को भी ऐसी घटनाओं को रिपोर्ट करते वक्त ख़ास सावधानी बरतनी चाहिए, जिससे की किसी को किसी के प्रति नफ़रत पैदा ना हो।मीडिया के गलत रिपोर्टिंग का ताज़ा मामला जुनैद की हत्या है।मुझे जहां तक याद है कि उसके भाई ने घटना के कुछ ही घंटों बाद कह दिया था कि झगड़ा सीट के लिए हुआ था।लेकिन मीडिया संस्थानों नें ज़बरदस्ती बीफ़ का मामला बताकर अपनी टीआरपी बढ़ाई।दर्शकों को ख़ास कर ऐसी ख़बरों की टीआरपी के खेल से बचना चाहिए और मीडिया के शुरुआती रिपोर्ट से कोई धारणा तैयार नही करना चाहिए।सरकारी रिपोर्ट का इन्तजार करना चाहिए।जब भी कोई घटना घटती है,ख़ासकर गाय को लेकर तो विपक्षी दलों के नेता समेत सरकार विरोधी लोग ये कहते हैं कि ये सब केन्द्र सरकार की सह पर हो रहा है।लेकिन मुझे जहां तक याद है,जब से नरेंद्र मोदी पीएम बने हैं,कई बार राज्य सरकारों से कह चुके हैं कि ऐसी घटनाओं पर सख़्त कर्रवाई करें।कानून-व्यवस्था राज्य का मामला होता है।ऐसे में ये राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी होती है कि ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगायें और दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करें,ताकि दुबारा किसी की हिम्मत ना हो।अब सवाल ये है कि पीएम के बार-बार कहने पर भी राज्य सरकारें कार्रवाई क्यों नही करती है?सबसे हैरानी की बात ये है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी हत्या को लेकर कोई अलग से कानून नही है।
अब मैं शोध के आधार पर कुछ उदाहरण दे रहा हूँ,उन लोगों के लिए जिनके दिमाग़ में ये बात साजिश के तहत भरी जा रही है कि सिर्फ़ हिन्दुओं द्वारा मुसलमानों पर अत्याचार किया जा रहा है-
▶देश की राजधानी दिल्ली के विकासपुरी इलाके में 15 लोगों की भीड़ जिसको नासिर लीड कर रहा था,ने डॉक्टर पंकज नारंग को रॉड और हॉकी स्टिक से,उसके पत्नी-बच्चे के सामने तब तक मारा जब तक नारंग ने दम नही तोड़ दिया।
▶कोयम्बटूर के फ़ारूक जिसकी ईश्वर में कोई आस्था नही था,उसी के बचपन के साथी ने उसकी एक फ़ेसबुक पोस्ट की वज़ह से हत्या कर दी।
▶एक हिन्दू रेल पैसेंजर को मुस्लिम युवकों ने सीट विवाद में पीटकर मार डाला।
▶एक दलित युवक को मुस्लिमों की भीड़ ने इसलिए पीटकर मार डाला,क्योंकि वो एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था।
▶झारखंड में भीड़ ने कुछ हिन्दुओं और मुसलमानों को बच्चा चोरी के शक में पीट-पीटकर मार डाला।
▶हाल ही में दिल्ली में 15-20 युवाओं की भीड़ ने एक रिक्शा चालक को पीट -पीटकर मार डाला क्योंकि उसमें किसी एक को चालक ने एक दिन पहले खुले में पेशाब करने से मना किया था।
                                 उपरोक्त उदाहरण से क्या ये साबित हो रहा है कि सिर्फ़ हिन्दु ही मुसलमानों पर हमला कर रहें हैं?ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं,जो इंटरनेट पर मौजूद है।जिसको किसी धर्म के ख़िलाफ़ धारणा तैयार करने से पहले ज़रूर देखिए।किसी भी तरह के हिंसा का कोई समर्थन नही करता है,चाहे वो गाय को लेकर हो या किसी अन्य कारण से।
                                   एक भीड़ जो हत्या करती है,दूसरी भीड़ जो हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती।हत्यारे भीड़ के ख़िलाफ़ 28 जून को #Notinmyname अभियान के तहत देशभर के लोग सड़क पर निकले थे।जिनका कहना था कि सरकार भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा के ख़िलाफ़ स़ख्त कार्रवाई करे।इस प्रदर्शन में ऐसा नही था कि किसी एक ख़ास धर्म या जाति के थे।
                                   एक बात जो मुझे बहुत दुखी करती है वो ये है कि जब भी कोई घटना घटती है तो फेंक यूनिवर्सिटी के कुछ लोग सक्रिय हो जाते हैं और हिन्दू-मुसलमान करने लगते हैं।एक दूसरे के प्रति नफ़रत फ़ैलाने वाले मैसेजेस भेजने लगते हैं।ऐसे लोगों से मेरी गुज़ारिश है कि आप ऐसा ना करें।आपने जो पढ़ाई के दरमयान'सर्व धर्म सम्भाव, जियो और जिने दो,हमें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए,मनुष्य एक सामाजिक प्राणि है'जैसे वाक्यों को राजनीति से प्रेरित होकर क्यों महत्वहीन बना रहे हो?

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सलीम शेख को मेरा भी सलाम!

दफ़्तर से घर को लौट रहा हूं,मेरे ऊपर उदासी का पहरा है।कुछ लिख़ने का तो मन नही कर रहा है,फ़िर भी लिख़ रहा हूं,वो इस ख़्याल में की आपके साथ अपनी वेदना को साझा कर रहा हूं।
बीती रात तकरीबन 08:30 बजे अमरनाथ यात्रियों पर अन्नतनाग में हुए आतंकी हमले के बारे में तकरीबन हर पहलूओं की ज़ानकारी मिल ही गई होगी।क्योंकि टीवी पर सुबह से ही इस ख़बर के हर एक पहलू पर बात हुई है।बस चालक सलीम शेख की वीरतापूर्ण कर्तव्य निवाह को देखते हुए कई लोग दो समुदायों की सौहार्दता का मिशाल दे रहें हैं,तो कई लोग उनकी वीरता को सलाम कर रहें,लेकिन कुछ लोग इन सब बातों से इनकार कर रहें हैं।इनकार करने वाले तर्क दे रहें हैं कि सलीम ने अपनी जान बचाने के लिए गाड़ी को तेज़ी से भगाई।इन सब बातों से इतर हिन्दुस्तान के लोग सलीम समेत उनके परिवार में और  खुशियां आए,इसकी बात कर रहें हैं। इसी ख़बर से जुड़ी कुछ बातें मैं आपसे साझा कर रहा हूँ,जो इस प्रकार है-
👉अमरनाथ यात्रा को लेकर हमेशा सरकारें कई तरह के सुरक्षा इन्तजामात करती है।जैसे कि सेना के अलावा इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज की भी मदद लेती है।इस बार तो ड्रोन कैमरे से भी निगरानी हो रही थी।फ़िर ये इतना बड़ा हादसा कैसे हो गया?
👉मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक़ आईबी ने कम से कम 50 बार ,जिस गाड़ी पर उसकी सूचना दी गई।और आगे भी आतंकी हमले की आशंका जताई जा रही है।
👉जिस गाड़ी पर हमला हुआ उसके चालक सलीम शेख को वीरता पुरस्कार से नवाज़ने के लिए,गुजरात के सीएम विजय रूपानी केन्द्र सरकार से सिफ़ारिश करने की बात कही।
👉बकौल सलीम,बाबा बर्फ़ानी के दर्शन करने जाते वक़्त कोई तकलीफ़ नही हुई।दर्शन बहुत अच्छे से हुए।लौटते वक्त ऐसा हादसा हो गया।लेकिन बाबा और मालिक ने हिम्मत दी तो निकल गए। हमले से लेकर अस्पताल तक तो मिलट्री वालों ने बहुत सहयोग किया।लेटकर गाड़ी चलाना आसान नही था,लेकिन बाबा की कृपा और  मालिक ने बहुत हिम्मत दिया।पुरस्कार वगैरह की बात तो फ़िलहाल नही कर सकता,क्योंकि मेरे सामने सिर्फ़ अभी वही नज़ारा है।मेरे यात्रियों को मारने वालों को जब सेना मारेगी ना,तब खाना अन्दर जाएगा और दिल को तसल्ली होगी।
👉बकौल सलीम की पत्नी, उनके बेटे के कान की कॉपरेशन हुई है,जिसकी वज़ह से वो सलीम को बार-बार जाने से रोकता रहा।हमलोगों ने भी कई बार रोका ।लेकिन वो(सलीम) ये बात बोले कि 'सवारी लोग ना जाने को बोल रहा है, वो लोग(यात्री) मेरे बिना नही जाएगा।इसलिए मुझे जाना पड़ेगा।' सलीम पिछले 8 साल से उनलोगों को बाबा बर्फ़ानी के दर्शन के लिए ले जाता है।
👉बकौल सलीम की मां,ख़ुदा ने हमें एक साथ बनाया है और एक साथ रहने के लिए बनाया, फ़िर ऐसा क्यों करतें हैं।एक साथ रहो ना मिलजुल कर।
                                 बहरहाल इस हमले को लेकर कई सवाल हैं,जिसका ज़वाब बीतते वक़्त के साथ मिलता रहेगा,तो कुछ सवालों का नही भी मिलेगा।
मेरी पीड़ा ये है कि एक पत्रकार जो अमरनाथ यात्रा की तैयारियों को लेकर कई ख़बरों को लिखता होगा,तमाम तैयारियों के बारे में जैसे श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए फ़लां ज़गह इतने,फ़लां ज़गह इतने जवान तैनात किए गये हैं।फ़लां ज़गह ड्रोन और फ़लां इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज़ से सुरक्षा के कड़े इन्तजामात किए जा रहें हैं।सुरक्षा के इतने इन्तजामात के बारे में सुन-सुनकर एक तरीके वो किसी भी ख़तरे की आशंका से बाहर निकल जाता होगा,और जब वो अचानक इस तरीके की दिल दहलाने वाली घटना के बारे में सुनता होगा,तो उसपे क्या बीतती होगी?

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...