बुधवार, 27 मई 2020

पंडित जवाहरलाल नेहरू का समाजवाद पर नज़रिया-

आज पूरा देश आधुनिक भारत के प्रणेता कहे जाने वाले पहले प्रधानमंत्री को याद कर रहा है। इसी क्रम में समाजवाद पर नेहरू जी के नज़रिए को आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मैं भारत के पहले वज़ीर-ए-आज़म को अलग-अलग माध्यमों से जानने की कोशिश करता हूँ। इसी क्रम में कुछ दिनों पहले मैंने लेखक हंसराज रहबर की लिखी किताब ' नेहरू बे-नक़ाब' पढ़ी। आइए जानते हैं कि पंडित जी का समाजवाद पर क्या नज़रिया था। पंडित जी समाजवाद के बारे में क्या सोचते थें। किताब में लिखा है- 

जवाहरलाल ने करंजिया के साथ अपनी भेंट में कहा था, " मैं समाजवाद में पिछले पचास वर्षों से विश्वास करता आ रहा हूँ और उसमें विश्वास करता तथा उसके लिए काम करता रहूँगा।" ( द माइंड ऑफ़ मिस्टर नेहरू)

लेकिन उनके इस विश्वास का दार्शनिक आधार क्या था? और उनके दिमाग़ में समाजवाद की धारणा क्या थी? 15 अगस्त 1958 को नेहरू जी ने अपने 'मूलभूत दृष्टिकोण' निबंध में लिखा था," लेकिन, समाजवाद क्या है? इसका कोई ठीक उत्तर देना कठिन है और समाजवाद की अनेक परिभाषाएं हैं। कुछ लोग शायद अस्पष्ट ढंग से सिर्फ़ यह सोचते हैं कि वह कोई अच्छी चीज़ है और उसका मक़सद समानता स्थापित करना है। पर यह सोच हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाती है।" जब पंडित नेहरू के पास जब कोई ठोस उत्तर नहीं और उनके दिमाग़ में समाजवाद की कोई निश्चित परिभाषा ही नहीं तो उनका विश्वास कैसे बना? और उन्होंने किस समाजवाद के लिए क्या काम किया? इस सिलसिले में स्पष्ट बात उन्होंने सिर्फ़ इतनी ही कही है कि, " समाजवाद बुनियादी तौर पर पूंजीवाद से भिन्न मार्ग है तथापि ख़याल है कि दोनों का बड़ा अन्तर ख़त्म होता जा रहा है क्योंकि समाजवाद के बहुत से विचार धीरे-धीरे पूंजीवादी व्यवस्था का अंग बनते जा रहे हैं।" मतलब समाजवाद के विचार अपना लेने से ख़ुद पूंजीवाद के समाजवाद में बदल जाने की सम्भावना है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू समाजवाद पर मार्क्स के वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार नहीं करते थें,क्योंकि उनके अनुसार कम्युनिज्म मनुष्य की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। कम्युनिज्म में व्यक्ति को समाज पर क़ुर्बान किया जाता है। इससे भी ज़्यादा नेहरू को कम्युनिज्म से इस बात से ऐतराज़ था कि कम्युनिज्म का ताल्लुक़ हिंसा से है जो गांधी के शान्तिपूर्ण और अहिंसात्मक मार्ग से बिल्कुल विपरीत है।

(नोट- मैं नेहरूवियन नहीं हूँ। मैं नेहरू जी को जानने की कोशिश कर रहा हूँ। इसलिए मैं दावे के साथ नहीं कह रहा हूँ कि मैंने जो आपके साथ साझा किया है, वही अन्तिम सत्य है। इसलिए किसी पाठक के पास नेहरू जी का समाजवाद के प्रति इससे इतर भी नज़रिया था,तो कृपया साझा करें ताकि मैं भी जान सकूँ)

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

टाइम टू एक्जिट फ़्रॉम 'द थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग'

पिछले एक हफ़्ते से कोरोनावायरस संकट के बीच हमेशा की तरह हिन्दू-मुस्लिम टॉपिक पर चर्चा अपने चरम पर है। ऐसी चर्चाओं से ना तो घबराने की ज़रूरत है और ना ही ज़्यादा रूचि लेने की ज़रूरत है, क्योंकि इसमें कुछ नया नहीं है। ये सब पहले से होता आ रहा है और आगे भी जारी रहेगा क्योंकि यह करने वाले जो भी हैं, वो 'हिन्दू-मुस्लिम' टॉपिक में फंसे लोग हैं, जो ख़ुद को इस दलदल से निकालने की बजाय युवाओं को फंसाते रहते हैं। मेरे कई साथी भी ' थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग' से प्रभावित हैं। कोई जाति तो कोई धर्म के नाम पर किसी के ख़िलाफ़ ज़हर बोते रहते हैं। बहुत सारे उदाहरण दे सकता हूँ, लेकिन पिछले एकाध-दो हफ़्ते के दो उदाहरण आपको दे रहा हूँ, ताकि समझने में आसानी होगी कि लोग कैसे धर्म को लेकर अंटके हुए हैं। 

हिन्दुस्तान में Pandemic कोरोनावायरस के साथ-साथ Infodemic और समाज के उपद्रवियों से भी लड़ाई चल रही है। इसी से संबंधित दो ताज़ा उदाहरण देता हूँ।
एक दिन मैंने फ़ेसबुक पर इस बात की जानकारी दी कि राजस्थान के दो मुस्लिम युवकों को पुलिस ने टिकटॉक के माध्यम से अफ़वाह फैलाने के मामले में गिरफ़्तार किया है। तो मेरे एक मुस्लिम मित्र ने आपत्ति दर्ज कराई और कॉमेंट किया कि क्या हिन्दू- मुसलमान किए हो? तो मैंने पूछा कि क्या आप नहीं चाहते हैं कि फ़ेक न्यूज़ पर लगाम लगे? आज तक उन्होंने जवाब नहीं दिया है। 
दूसरा उदाहरण, 19 अप्रैल को मैंने लिखा कि "एक तरफ़ देश के अलग-अलग हिस्सों से ख़बरें आ रही हैं कि एक वर्ग पुलिसकर्मियों और चिकित्साकर्मियों पर लाठी-डंडों और पत्थर से हमले कर रहे हैं, जान लेने पर आमदा हैं। वहीं दूसरी तरफ़, एक दूसरा वर्ग है जो कोरोनावायरस से हमें-आपको बचाने में जुटे हुए हैं,उनका सम्मान भी किया जा रहा है।" मेरे इस बात पर एक मित्र ने 'वर्ग' शब्द का इस्तेमाल किए जाने को लेकर आपत्ति जताई। उनको लगा कि वर्ग लिखने से मेरा संबंध मुस्लिमों से है, जबकि मैंने वर्ग शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया था क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों में कहीं कोरोना वॉरियर्स पर हमले हुए तो कही स्वागत हुए। लेकिन मैंने अपने मित्र को कोई जवाब देना उचित नहीं समझा, क्योंकि मैं जानता हूँ कि इस बहस में फंसने का मतलब है समय की बर्बादी। हक़ीक़त क्या है किसी से छिपा है? आज सरकार ने स्वास्थ्यकर्मियों पर बढ़ते हमलों को देखते हुए एक अध्यादेश लाई है। इस अध्यादेश की जानकारी देते हुए केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले को बर्दास्त नहीं किया जाएगा। हमला करने वालों को जमानत नहीं मिलेगी और एक साल के भीतर सुनवाई पूरी की जाएगी। इसमें 50 हज़ार से 2 लाख रूपये तक जुर्माने और 3 महीने से 5 साल तक की सज़ा का भी प्रावधान है। गम्भीर चोट के मामले में अधिकतम सात साल की सज़ा हो सकती है।
                                      ये दोनों उदाहरण मैंने अपने मुस्लिम मित्रों के दिए हैं। सिर्फ़ यह बताने के लिए कैसे लोग 'हिन्दू-मुस्लिम' में फंसे हुए हैं कि सच को सुनने और हर बात को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखने के सिवा कोई उपाय ही नहीं रह गया है। मुझे लगता है कि देश के युवाओं को 'द थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग' से बाहर निकलना चाहिए और बिना लेकिन-किन्तु- परन्तु के सच को सच कहने और सुनने की आदत डालनी चाहिए। किसी की भी ग़लती से किसी की ग़लती को जस्टिफ़ाई नहीं किया जाना चाहिए। 
अब बात करते हैं तब्लीग़ी जमात की। हिन्दुस्तान में कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों में से अकेले 30 फ़ीसद लोगों के संबंध जमात से हैं। बिल्कुल शुरुआत में जब जमात का मामला सामने आया था तो स्वघोषित सेकुलरों ने 'छिपे' शब्द को लेकर आपत्ति जताई थी। आज आलम यह है कि राज्य सरकारें बार-बार अपील कर रही हैं कि जमात के लोग ख़ुद से सामने आएं और अपनी जांच कराएं, नहीं तो जानकारी मिलने पर क़ानूनी कार्रवाई होगी, तब भी लोग सामने नहीं आ रहे हैं। जमात से जुड़े लोगों की कई ऐसी शर्मनाक़ हरक़तें सामने आईं, जिसकी मज़म्मत बहुत सारे मुसलमानों ने भी किए है। सोमवार को ख़बर आई थी कि हरिद्वार के एक क्वॉरेंटाइन सेंटर से तब्लीग़ी जमात से जुड़ा शख़्स भाग गया था, जिसको बाद में गिरफ़्तार कर लिया है। गूगल करेंगे तो तब्लीग़ी जमात से जुड़े लोगों की बहुत सारी घटिया हरकतें आपको देखने को मिल जाएंगी। नर्सों से बदतमीज़ी के भी कई मामले सामने आए हैं। आज ही दिल्ली में कोरोनावायरस के शिकार एक मुस्लिम शख़्स ने नर्स से हाथापाई तक की, लेकिन किसी तरह से जान बचाकर वो नर्स उन लोगों से जान बचाकर भाग आई। नीचे लिंक दे रहा हूँ, वीडियो में आप सुनेंगे कि निज़ामुद्दीन मरकज़ के प्रवक्ता कह रहे हैं नर्स को छेड़खानी की वीडियो दिखानी चाहिए।https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3260874297302174&id=138762029513432
कोरोना महामारी को देखते हुए कई मुस्लिम देशों ने सामूहिक नमाज़ पढ़ने पर रोक लगा दी है। लेकिन भारत में क्या हो रहा है? जुमे की नमाज़ के लिए देश के किसी ना किसी हिस्से में लोग इकट्ठे मिल जाते हैं और जब पुलिस कार्रवाई करती है तो रोना रोने लगते हैं। मुझे ठीक-ठीक याद है कि पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के पोते की शादी हो, बीजेपी विधायकों के जुलूस और जन्मदिन मनाने की घटना हो या सीएम योगी और शिवराज सिंह चौहान की बात हो, सब की काफ़ी आलोचना हुई है और डिबेट हुई है। फिर ऐसे में तब्लीग़ी जमात या वो मुस्लिम, जिनकी वज्ह से पूरा मुस्लिम समाज शर्मसार होता है, उसपर मीडिया में चर्चा क्यूँ नहीं होनी चाहिए? कब तक कथित रूप से अल्प-संख्यक होने के नाम पर इनके ग़लत कामों पर पर्दा डालने की कोशिश होती रहेगी? तब्लीग़ी जमात की आलोचना और उनकी करतूतों पर सवाल करने का मतलब सभी मुसलमानों से नहीं होता है। तब्लीग़ी जमात की हरकतों से देश के नामवर मौलानाओं और मुस्लिमों ने ख़ुद को अलग कर लिया है। हिन्दुस्तान में क़ानून सबसे के लिए बराबर है, इसलिए सवाल सभी होगा।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

कोरोना'काल में और बाद में हम!

आज प्रधानमंत्री मोदी ने लॉकडाउन को 3 मई 2020 तक बढ़ा दिया है। मतलब आजतक हम लोग लॉकडाउन के जिन-जिन नियमों का पालन कर रहे थें उसका 3 मई तक पालन करना होगा। बिना ज़रूरत के पहले की तरह लक्ष्मण रेखा पार नहीं करना होगा। पीएम मोदी ने अपने सम्बोधन में कहा है कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो 20 अप्रैल के बाद से कुछ गतिविधियों में छूट दी जाएगी, लेकिन मामला गड़बड़ होने पर छूट को समाप्त कर दिया जाएगा। मतलब साफ़ है कि आप और हम (जनता) सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन के नियमों का कैसे पालन करते हैं, ताकि कोरोनावायरस के संक्रमण का मामला बढ़े भी ना और उन लोगों कामगारों, व्यापारियों, दुकानदारों का आर्थिक पहिया घूमने लगे, जो देश की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 
इस वक़्त पूरी दुनिया में कोरोनावायरस के संक्रमण को रोकने के लिए एक मात्र विकल्प है सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन, क्योंकि कोविड-19 अबतक लाइलाज बीमारी है।  कोरोनावायरस के आगे वो सारे मुल्क जो मिसाइल और आधुनिक हथियारों के दम पर दूसरे देशों को धमकाते फिरते थे, वो सब लाचार नज़र आ रहे है। विश्व की दो महाशक्ति कहे जाने वाले चीन और अमेरिका की हालात कितनी बदतर है, किसी से छिपा नहीं है। इन दोनों देशों में कोरोनावायरस से हर रोज़ सैंकड़ों लोगों की जानें जा रही है, लेकिन सरकारें कुछ कर नहीं पा रही हैं। अगर लोग संक्रमित हो जा रहें तो उनकी ज़िन्दगी भगवान भरोसे ही है। मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयों का अबतक कोई पुख़्ता प्रमाण नहीं मिला है कि कोरोनावायरस के मरीज़ों का इन दवाइयों से इलाज किया जा सकता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कोरोनावायरस के आगे सब कोई लाचार है। इसलिए दुनियाभर के देश लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग बनाएं रखने और स्वच्छता पर ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं। इन सब के बीच कुछ सवाल जो सबसे महत्वपूर्ण है वो यह है कि कोरोना'काल से दुनिया कबतक निकलेगी और जब निकलेगी तो कैसी होगी दुनिया? देशों की आर्थिक सेहत कितनी बुरी होगी और कितनी जल्दी आर्थिक सेहत ठीक हो जाएगा? क्या मिसाइल और आधुनिक हथियारों के दम पर डराने वाले मुल्कों की आर्थिक हालत वैसी ही रहेगी,जैसी पहली थी? शायद इन सवालों के जवाब आने वाले वक़्त में मिलेंगे। एक जो सवाल है कि कैसी होगी दुनिया, अगर इसके आर्थिक परिप्रेक्ष्य की बात ना करें, तो इंसानों की बदली आदतों के आधार पर दावे के साथ तो नहीं, लेकिन अनुमान लगाया जा सकता है, जो इस काल से बचकर निकल जाएंगे, वो इस बात का ज़रूर ख़याल रखेंगे कि प्राकृतिक से खिलवाड़ नहीं करेंगे और स्वच्छता और खान-पान में आए बदलाव को जारी रखेंगे। 
हम सब जानते हैं कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमारे देश की हालत कैसी है। ना तो ज़रूरत के हिसाब चिकित्साकर्मी हैं और ना ही ज़रूरत के हिसाब से स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर है। ऐसे में इन दिनों बहुत ज़रूरी है कि ख़ुद ही अपना ख़याल रखें और कोरोनावायरस के संक्रमण से बचने के लिए जो उपाय सुझाए गए हैं, उनका पालन करें।

दुनियाभर में इन दिनों हाथ मिलाकर अभिवादन करने की बजाय नमस्ते किया जा रहा है,जो हमारी भारतीय सभ्यता में पहले से ही थी, लेकिन आधुनिकता के दौर में हम में से ज़्यादातर लोग भूल गए थें। लेकिन इस बदले हुए जमाने में भी मैं और मेरे सहकर्मी अमित पालित एक दूसरे का अभिवादन नमस्ते करके ही करते हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाथों को समय-समय पर ठीक से धोने के लिए सलाह दिया,जिसको हमसब को कोरोना'काल के बाद भी जारी रखना होगा। ताकि हम स्वच्छ और स्वस्थ रहेंगे तो देश भी स्वच्छ और स्वस्थ रहेगा।

आयुष मंत्रालय,भारत सरकार ने इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं, जिसका पालन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। 

इन दिनों भारत की तमाम नदियां पहले से ज़्यादा निर्मल दिखाई दे रहीं हैं। यह सही वक़्त है उन सभी फ़ैक्ट्री मालिकों के पास जिनकी वज्ह से नदियों का पानी दूषित होता है, विचार करें और नदियों में जाने वाले अवशेषों को रोकने की व्यवस्था करें।

इन दिनों भारत के वे सभी शहर जिसकी गिनती वायु प्रदुषण की वज्ह से दुनिया के दूषित शहरों में होती थी, वहां के जीव-जन्तु लॉकडाउन की वज्ह से शुद्ध हवा ले रहे हैं।ऐसे शहरों में रहने वाले सभी लोगों को चाहिए कि लॉकडाउन के समाप्त होने के बाद भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करें ताकि वायु प्रदुषित होने से बचा रहे।

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

पीएम मोदी ने कहीं ये नहीं, इन वज्हों से देश को सम्बोधित तो नहीं किया है!

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस को लेकर प्रधानमंत्री मोदी का देश को सम्बोधन, आप किस रूप में देखते हैं? कई लोगों ने पीएम की बातों पर अम्ल करते हुए उनकी बातों को प्रसारित करने में लगे हुए हैं तो बहुत सारे लोग तनक़ीद भी कर रहे हैं। आलोचना करने वाले लोग पीएम के सम्बोधन को इस रूप में देख रहे हैं कि सरकार ने ख़ुद को सरेंडर कर दिया है। मेरे मित्र @Chaman Mishra ने लिखा कि “ऐसे वक़्त में मोदी जी में नेहरू जी समा जाते हैं” तो जवाब में @अंकित द्विवेदी ने लिखा कि ये महाशय (नरेन्द्र मोदी) कभी भी नेहरू नहीं बन सकते हैं। कई लोग कह रहे हैं कि पीएम मोदी हर चीज़ को इवेंट बना देते हैं। कोरोना वायरस से संकट के समय पीएम को इवेंट से बचना चाहिए और ज़रूरी कामों पर ध्यान देना चाहिए। आपका क्या कहना है?

पीएम मोदी ने अपने सम्बोधन में बहुत सारी बातें बताई, लेकिन चर्चा 'जनता कर्फ़्यू' की ही हो रही है। पीएम की बातों के आलोचकों और समर्थकों में वाक्य युद्ध हो रहे हैं। इस वाक्य युद्ध का नतीजा 22 मार्च को पता चल जाएगा। लेकिन मेरे ख़याल से पीएम मोदी की बातों को जनता कर्फ़्यू और इवेंट के इतर भी देखना चाहिए कि पीएम मोदी आख़िर देश को सम्बोधित करने क्यूँ आएं थें? एक तरफ़ कोरोना वायरस के ख़तरे से गाँव-क़स्बों के लोग अब भी जागरूक नहीं है। वहाँ के लोग इस वायरस को अब भी काफ़ी हलके में ले रहे हैं। दूसरी तरफ़ जान-बूझकर भी लोग लापरवाही बरत रहे हैं। सरकार रोज़-रोज़ बता रही है कि कोरोना वायरस से बचने के लिए क्या-क्या करना चाहिए, लेकिन लोग मान नहीं रहे हैं। मुल्कभर के दीगर शहरों में धारा 144 क्यूँ लागू करनी पड़ रही है? शायद इसी वज्ह से कि लोग मान नहीं रहे हैं। ना जाने ट्रैवल हिस्ट्री क्यूँ छिपा रहे हैं।

हमारे देश में कोरोना वायरस के शिकार मरीज़ों में मुसलसल इज़ाफ़ा हो रहा है, सिर्फ़ इसलिए कि लोग लापरवाही बरत रहे हैं। एक नागरिक के रुप में इस संकट की घड़ी में आपको एक आदर्श नागरिक का परिचय देते हुए सरकार ने जो भी उपाय बताएं हैं उसका पालन करना चाहिए। बताए गए उपायों का पालन करना हमारा संवैधानिक कर्तव्य भी है। अफ़वाहों पर लोग ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं। गुरूवार को देश के कई हिस्सों से ख़बरें आईं कि लोग अपने-अपने घरों में राशन इकट्ठा करने लगे हैं। लोगों में राशन इकट्ठा करने को लेकर बे-वज्ह अफ़रा-तफ़री मची है। शायद इन्ही सब वज्हों से पीएम मोदी को देश को सम्बोधित करना पड़ा। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर तमाम कई सारी अंन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने कोरोना वायरस के ख़तरे से निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की तारीफ़ की है। आप थाली या ताली बजाएंगें या नहीं, यह आपकी मर्ज़ी है। लेकिन आप अपनी नैतिक और संवैधानिक ज़िम्मावारियों को समझते हुए बहुत ज़रूरत हो तब ही किसी से मिलिए और अफ़वाहों को फैलाने से बचिए। आप इस रूप में सोचिए कि आपकों ख़ुद को इस वायरस से बचाना है और अगर ऐसे ही सभी लोग सोचने लगेंगे तो कोरोना वायरस को आसानी से मात दिया जा सकता है।

मंगलवार, 17 मार्च 2020

ज़िन्दगी में छांव।


आज दोपहर के वक़्त हस्पताल से मैं लौट रहा था, अचानक से मेरी नज़र इस शख़्स पर पड़ी। कुछ दूरी पर रेड लाइट होने की वज्ह से हमारी गाड़ी की रफ़्तार धीमी हो गई तो मैंने ये तस्वीर क़ैद कर ली। 24*7 वर्किंग कल्चर के कर्मचारियों के लिए यह तस्वीर कुछ पल से लिए सुकून तो पहुंचा ही सकती है। हाँ, उनलोगों को शायद नहीं जिन लोगों ने कैरियर के नाम पर रोबोट बनना स्वीकार कर लिया है। 24*7 वर्किंग कल्चर में स्वीकार्यता उनकी है जिनकी इंसानियत क़रीब-क़रीब शून्य पर पहुंच चुकी है। एक बार एक सीनियर ने मुझसे कहा था कि तुम इतने संवेदनशील क्यूँ हो, तुम्हे काम करना है। इतने संवेदनशील रहोगे तो हो गया काम। इस बात ने तब भी मुझे आश्चर्यचकित कर दिया था और अब भी जब कभी याद आ जाती है,तो मैं इस उलझन में पड़ जाता हूँ कि ऐसे लोगों की मानसिकता का स्तर क्या होता होगा,निम्न या उच्च?

ख़ैर,जब भी यह तस्वीर आखों के सामने हो रही है, तो ख़याल आ रहा है कि ‘थकना मना है’ हो चुकी ज़िन्दगी में छांव की कितनी ज़रूरत है। छांव में लेटा हुआ यह व्यक्ति अपने काम को करके जब थक जाता होगा तो थोड़ी देर ऐसे ही आराम कर लेता होगा, फिर नई ऊर्जा के साथ अपने काम की शुरूआत करता होगा। कॉरपोरेट कल्चर में काम कर-करके थका हुआ व्यक्ति चाय की चुस्की या सिगरेट की कश या फिर दोनों से अपनी थकान मिटाता है। वर्षों तक काम करके, चाय की चुस्की और सिगरेट की कश से थकान मिटाने वाला व्यक्ति एक वक़्त के बाद जब पीछे मुड़कर देखता है तो शायद की किसी को वो समाज नसीब होता होगा, जहां थोड़ी देर बैठकर वक़्त बीता सके। दिन-दुनिया की बातें कर सके। डिओ न मारने वाले पाँच-दस लोग जानते हो, जो खेत-खलिहान गांव-जवार की बातें कर सके। 

रविवार, 23 फ़रवरी 2020

सरकारी सुविधाओं से महरूम ज़िन्दगानी।

तस्वीरें नोएडा के सेक्टर 16 मेट्रो स्टेशन के पास की है। आज सुब्ह 10 बजे मैं एक झुग्गी की तरफ़ जा रहा था, वहाँ रहने वाले लोगों से बातचीत कर यह जानने कि क्या उनकी ज़िन्दगी में 'सब चंगा सी' है या नहीं। लेकिन अचानक से मेरी नज़र इन लोगों पर पड़ी। देर रात को काम से लौटने के बाद सुब्ह में महिलाएं और पुरुष आपस में बात कर रहे थें।
 ऐसा कम ही होता है कि इतनी देर तक सब इकट्ठे होकर बातचीत करते हैं। काम को लेकर देर रात को अपनों के बीच लौटना और सुब्ह जल्दी उठकर काम की तलाश में निकल जाना पुरुषों की दिनचर्या होती है। यह बात इन्हीं लोगों में एक व्यक्ति ने तस्वीर ना खींचने और अपना नाम ना बताने की शर्त पर बताई। जिस व्यक्ति ने मुझसे बात की, पूरी बातचीच के दौरान लगा कि वह कैमरे की नज़र से बचना चाहता था। इस बात का एहसास तब हुआ, जब उसने कहा कि मीडिया वाले रिकॉर्डिंग करके ले जाते हैं और टीवी पर दिखा देते हैं। बाद में पुलिस आकर हमारे झोपड़ियों को तोड़ देती है। हमारे बातचीत का सिलसिला जैसे ही शुरु हुआ था, दो तीन महिलाएं क़रीब आकर मुझसे अपना दर्द बयां करने लगीं। ये सभी बिहार की राजधानी पटना के अनीसाबाद इलाक़े के रहने वाले थीं। कुछ महिलाएं और पुरुष अपनी बात साझा करने में हिचक रहे थें, जिसकी वज्ह से वो दूर से हमारे बातचीत को ग़ौर से देख रहे थें कि हम क्या कर रहे हैं या क्या करने वाले हैं। हमारी बातचीत आगे बढ़ी। मैं इन छोटे-छोटे बच्चों के बारे में पूछा कि क्या यह सभी पढ़ने जाते हैं?
 एक महिला ने बड़ी ही उदासी से कहा कि नहीं...नहीं जाता है सब पढ़ने...कहां जाएगा पढ़ने...6 महीनें तक मैं अपने बच्चों को सेक्टर 18 में एक स्कूल है...उसमें भेजी लेकिन ‘क’ भी लिखने नहीं आया। एक मास्टर जी यहीं उस पेड़ के नीचे (पास के एक पेड़ की तरफ़ इशारा करते हुए) पढ़ाने आते थें वो भी अब नहीं आते हैं। ऐसे में बच्चे कहां पढ़ पा रहे हैं। दिनभर ऐसे ही इधर-उधर खेलते रहते हैं। 

एक महिला जो सालों से यहीं रहती हैं, कहने लगी की कोई सरकारी आदमी पूछने तक नहीं आता है। और टीवीवाला पर जब दिखा देता है तो पुलिस आकर बहुत परेशान करती है। झोपड़िया तोड़ देती है। इतने में पुरुष ने कहा कि जैसे-जैसे साल बीतता जा रहा है...नोएडा में स्वच्छता बढ़ता जा रहा है...नोएडा साफ़-सुथरा होता जा रहा है...साफ़ सुथरा देखने में कितना अच्छा लगता है ना..हो सकता है कि इस वज्ह से पुलिस हमारी झोपड़ियों को तोड़ देती है। 

पुरुष उदास मन से अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहने लगा कि हमलोग क्या करें...बिहार में नौकरी हइए नहीं है..जिसकी वज्ह से हमलोगों को यह काम करना पड़ता है...मैंने कहा कि नीतीश कुमार इतने दिनों से शासन में हैं, तब भी नौकरी नहीं है? जवाब में पुरुष ने कहा कि   आप ही बताइए ना..बिहार में कहां है नौकरी...कम्पनी है ही नहीं तो रोज़गार कहाँ से मिलेगा। इसलिए हमलोगों को यह सब करना पड़ता है।

एक महिला कहने लगीं कि सरकार हमलोगों पर ध्यान देती तो हमलोग भी कुछ काम करते...शहद बेचने, सड़क किनारे बच्चों से ग़ुब्बारा बेचवाने से तो अच्छा रहता कि हमलोग भी कुछ काम करतें।

काफ़ी से देर तक बातचीत के बाद महसूस हुआ कि इनलोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बनाने के लिए सरकार को ध्यान देना चाहिए। ये लोग सरकारी योजनाओं के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। ऐसे में सरकार की ज़िम्मावारी होनी चाहिए कि अपने कर्मचारियों को ऐसे लोगों के बीच भेज कर, इनलोगों से बात करे। ऐसे लोगों को शिक्षा,स्वास्थ्य और आवास उपलब्ध कराये।

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

रिश्ते की बुनियाद में ‘तहज़ीब’ होनी चाहिए।

हर कोई किसी ना किसी रिश्ते की डोर में बंधा होता है और रिश्ते की पहली शर्त होती है कि हर कोई उम्मीद करता है कि चाहे वह ख़ुद कैसे भी बोले/ बात करे लेकिन सामने वाला तहज़ीब से बात करे। लेकिन आज के समय में ऐसी उम्मीद करना शायद ख़ुद से बेईमानी करने जैसा है। ‘जैसे को तैसा’ वाले समय में हर किसी को समझना पड़ेगा कि आप जब किसी का सम्मान नहीं करेंगे तो शायद ही सामने वाला भी आपका सम्मान करेगा। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपके रिश्तों में मतभेद का होना तय है। इसलिए बहुत ज़रूरी है कि बातचीत करते वक़्त तहज़ीब यानि तरीक़े से बात करें। हमारे समाज में सास-बहू का रिश्ता ऐसा है जिसके मतभेद में यह तय करना लगभग नामुमकिन होता है कि सास ग़लत है या बहू। इस रिश्ते में मतभेद के अनन्त किस्से हैं। मैं आपको यहाँ एक उदाहरण दे रहा हूँ कि तहज़ीब कैसे रिश्ते में मतभेद नहीं होने देता है।

अभी कुछ दिनों पहले मैं अपने एक परिचित के घर गया हुआ था। हाल ही में उनके बेटे की शादी हुई है। मैं उनके साथ बैठकर बातें कर रहा था, तो देखा कि उनकी बहू गिलास में दाल लेकर आई। दाल एक ऐसी चीज़ है जो थोड़ी बहुत बच ही जाती है। मुझे याद है कि जब मैं छोटा था तो शाम को जो दाल बच जाती थी, उनको कई बार मुझे पीने के लिए दिया जाता था। हम दोनों एक दूसरे से भोजपुरी में बात कर रहे थे,इसलिए मैं उनकी बातों को भोजपुरी में लिख रहा हूँ ताकि समझने में आसानी हो कि किसी बात को समझाने का लहजा कैसा होना चाहिए।

बताव..तू जोन इ रोज़-रोज़ दाल फेंक देवे लू...केतना महंगा आवेला...या त कम बनावअ चाहे बच जाए तक हमनी के दे द पीए ला...फेंकला पर त बर्बादे नू होई...कहने मतलब यह है कि जो रोज़- रोज़ दाल बच जाती थी उसको उनकी बहू फेंक देती थी। जब उन्होंने बहू को समझा दिया तो शाम को जब भी बर्तन धोने जाती है, बचे हुए दाल या जो कुछ भी बचा रहता है उसको फेंकने की बजाय खाने के लिए दे जाती है।

कहने तात्पर्य यह है किसी से भी बात करने का लहजा बिल्कुल ही शान्त और नर्म होने चाहिए।   

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...