बुधवार, 22 अप्रैल 2020

टाइम टू एक्जिट फ़्रॉम 'द थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग'

पिछले एक हफ़्ते से कोरोनावायरस संकट के बीच हमेशा की तरह हिन्दू-मुस्लिम टॉपिक पर चर्चा अपने चरम पर है। ऐसी चर्चाओं से ना तो घबराने की ज़रूरत है और ना ही ज़्यादा रूचि लेने की ज़रूरत है, क्योंकि इसमें कुछ नया नहीं है। ये सब पहले से होता आ रहा है और आगे भी जारी रहेगा क्योंकि यह करने वाले जो भी हैं, वो 'हिन्दू-मुस्लिम' टॉपिक में फंसे लोग हैं, जो ख़ुद को इस दलदल से निकालने की बजाय युवाओं को फंसाते रहते हैं। मेरे कई साथी भी ' थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग' से प्रभावित हैं। कोई जाति तो कोई धर्म के नाम पर किसी के ख़िलाफ़ ज़हर बोते रहते हैं। बहुत सारे उदाहरण दे सकता हूँ, लेकिन पिछले एकाध-दो हफ़्ते के दो उदाहरण आपको दे रहा हूँ, ताकि समझने में आसानी होगी कि लोग कैसे धर्म को लेकर अंटके हुए हैं। 

हिन्दुस्तान में Pandemic कोरोनावायरस के साथ-साथ Infodemic और समाज के उपद्रवियों से भी लड़ाई चल रही है। इसी से संबंधित दो ताज़ा उदाहरण देता हूँ।
एक दिन मैंने फ़ेसबुक पर इस बात की जानकारी दी कि राजस्थान के दो मुस्लिम युवकों को पुलिस ने टिकटॉक के माध्यम से अफ़वाह फैलाने के मामले में गिरफ़्तार किया है। तो मेरे एक मुस्लिम मित्र ने आपत्ति दर्ज कराई और कॉमेंट किया कि क्या हिन्दू- मुसलमान किए हो? तो मैंने पूछा कि क्या आप नहीं चाहते हैं कि फ़ेक न्यूज़ पर लगाम लगे? आज तक उन्होंने जवाब नहीं दिया है। 
दूसरा उदाहरण, 19 अप्रैल को मैंने लिखा कि "एक तरफ़ देश के अलग-अलग हिस्सों से ख़बरें आ रही हैं कि एक वर्ग पुलिसकर्मियों और चिकित्साकर्मियों पर लाठी-डंडों और पत्थर से हमले कर रहे हैं, जान लेने पर आमदा हैं। वहीं दूसरी तरफ़, एक दूसरा वर्ग है जो कोरोनावायरस से हमें-आपको बचाने में जुटे हुए हैं,उनका सम्मान भी किया जा रहा है।" मेरे इस बात पर एक मित्र ने 'वर्ग' शब्द का इस्तेमाल किए जाने को लेकर आपत्ति जताई। उनको लगा कि वर्ग लिखने से मेरा संबंध मुस्लिमों से है, जबकि मैंने वर्ग शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया था क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों में कहीं कोरोना वॉरियर्स पर हमले हुए तो कही स्वागत हुए। लेकिन मैंने अपने मित्र को कोई जवाब देना उचित नहीं समझा, क्योंकि मैं जानता हूँ कि इस बहस में फंसने का मतलब है समय की बर्बादी। हक़ीक़त क्या है किसी से छिपा है? आज सरकार ने स्वास्थ्यकर्मियों पर बढ़ते हमलों को देखते हुए एक अध्यादेश लाई है। इस अध्यादेश की जानकारी देते हुए केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले को बर्दास्त नहीं किया जाएगा। हमला करने वालों को जमानत नहीं मिलेगी और एक साल के भीतर सुनवाई पूरी की जाएगी। इसमें 50 हज़ार से 2 लाख रूपये तक जुर्माने और 3 महीने से 5 साल तक की सज़ा का भी प्रावधान है। गम्भीर चोट के मामले में अधिकतम सात साल की सज़ा हो सकती है।
                                      ये दोनों उदाहरण मैंने अपने मुस्लिम मित्रों के दिए हैं। सिर्फ़ यह बताने के लिए कैसे लोग 'हिन्दू-मुस्लिम' में फंसे हुए हैं कि सच को सुनने और हर बात को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखने के सिवा कोई उपाय ही नहीं रह गया है। मुझे लगता है कि देश के युवाओं को 'द थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग' से बाहर निकलना चाहिए और बिना लेकिन-किन्तु- परन्तु के सच को सच कहने और सुनने की आदत डालनी चाहिए। किसी की भी ग़लती से किसी की ग़लती को जस्टिफ़ाई नहीं किया जाना चाहिए। 
अब बात करते हैं तब्लीग़ी जमात की। हिन्दुस्तान में कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों में से अकेले 30 फ़ीसद लोगों के संबंध जमात से हैं। बिल्कुल शुरुआत में जब जमात का मामला सामने आया था तो स्वघोषित सेकुलरों ने 'छिपे' शब्द को लेकर आपत्ति जताई थी। आज आलम यह है कि राज्य सरकारें बार-बार अपील कर रही हैं कि जमात के लोग ख़ुद से सामने आएं और अपनी जांच कराएं, नहीं तो जानकारी मिलने पर क़ानूनी कार्रवाई होगी, तब भी लोग सामने नहीं आ रहे हैं। जमात से जुड़े लोगों की कई ऐसी शर्मनाक़ हरक़तें सामने आईं, जिसकी मज़म्मत बहुत सारे मुसलमानों ने भी किए है। सोमवार को ख़बर आई थी कि हरिद्वार के एक क्वॉरेंटाइन सेंटर से तब्लीग़ी जमात से जुड़ा शख़्स भाग गया था, जिसको बाद में गिरफ़्तार कर लिया है। गूगल करेंगे तो तब्लीग़ी जमात से जुड़े लोगों की बहुत सारी घटिया हरकतें आपको देखने को मिल जाएंगी। नर्सों से बदतमीज़ी के भी कई मामले सामने आए हैं। आज ही दिल्ली में कोरोनावायरस के शिकार एक मुस्लिम शख़्स ने नर्स से हाथापाई तक की, लेकिन किसी तरह से जान बचाकर वो नर्स उन लोगों से जान बचाकर भाग आई। नीचे लिंक दे रहा हूँ, वीडियो में आप सुनेंगे कि निज़ामुद्दीन मरकज़ के प्रवक्ता कह रहे हैं नर्स को छेड़खानी की वीडियो दिखानी चाहिए।https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3260874297302174&id=138762029513432
कोरोना महामारी को देखते हुए कई मुस्लिम देशों ने सामूहिक नमाज़ पढ़ने पर रोक लगा दी है। लेकिन भारत में क्या हो रहा है? जुमे की नमाज़ के लिए देश के किसी ना किसी हिस्से में लोग इकट्ठे मिल जाते हैं और जब पुलिस कार्रवाई करती है तो रोना रोने लगते हैं। मुझे ठीक-ठीक याद है कि पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के पोते की शादी हो, बीजेपी विधायकों के जुलूस और जन्मदिन मनाने की घटना हो या सीएम योगी और शिवराज सिंह चौहान की बात हो, सब की काफ़ी आलोचना हुई है और डिबेट हुई है। फिर ऐसे में तब्लीग़ी जमात या वो मुस्लिम, जिनकी वज्ह से पूरा मुस्लिम समाज शर्मसार होता है, उसपर मीडिया में चर्चा क्यूँ नहीं होनी चाहिए? कब तक कथित रूप से अल्प-संख्यक होने के नाम पर इनके ग़लत कामों पर पर्दा डालने की कोशिश होती रहेगी? तब्लीग़ी जमात की आलोचना और उनकी करतूतों पर सवाल करने का मतलब सभी मुसलमानों से नहीं होता है। तब्लीग़ी जमात की हरकतों से देश के नामवर मौलानाओं और मुस्लिमों ने ख़ुद को अलग कर लिया है। हिन्दुस्तान में क़ानून सबसे के लिए बराबर है, इसलिए सवाल सभी होगा।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

कोरोना'काल में और बाद में हम!

आज प्रधानमंत्री मोदी ने लॉकडाउन को 3 मई 2020 तक बढ़ा दिया है। मतलब आजतक हम लोग लॉकडाउन के जिन-जिन नियमों का पालन कर रहे थें उसका 3 मई तक पालन करना होगा। बिना ज़रूरत के पहले की तरह लक्ष्मण रेखा पार नहीं करना होगा। पीएम मोदी ने अपने सम्बोधन में कहा है कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो 20 अप्रैल के बाद से कुछ गतिविधियों में छूट दी जाएगी, लेकिन मामला गड़बड़ होने पर छूट को समाप्त कर दिया जाएगा। मतलब साफ़ है कि आप और हम (जनता) सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन के नियमों का कैसे पालन करते हैं, ताकि कोरोनावायरस के संक्रमण का मामला बढ़े भी ना और उन लोगों कामगारों, व्यापारियों, दुकानदारों का आर्थिक पहिया घूमने लगे, जो देश की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 
इस वक़्त पूरी दुनिया में कोरोनावायरस के संक्रमण को रोकने के लिए एक मात्र विकल्प है सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन, क्योंकि कोविड-19 अबतक लाइलाज बीमारी है।  कोरोनावायरस के आगे वो सारे मुल्क जो मिसाइल और आधुनिक हथियारों के दम पर दूसरे देशों को धमकाते फिरते थे, वो सब लाचार नज़र आ रहे है। विश्व की दो महाशक्ति कहे जाने वाले चीन और अमेरिका की हालात कितनी बदतर है, किसी से छिपा नहीं है। इन दोनों देशों में कोरोनावायरस से हर रोज़ सैंकड़ों लोगों की जानें जा रही है, लेकिन सरकारें कुछ कर नहीं पा रही हैं। अगर लोग संक्रमित हो जा रहें तो उनकी ज़िन्दगी भगवान भरोसे ही है। मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयों का अबतक कोई पुख़्ता प्रमाण नहीं मिला है कि कोरोनावायरस के मरीज़ों का इन दवाइयों से इलाज किया जा सकता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कोरोनावायरस के आगे सब कोई लाचार है। इसलिए दुनियाभर के देश लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग बनाएं रखने और स्वच्छता पर ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं। इन सब के बीच कुछ सवाल जो सबसे महत्वपूर्ण है वो यह है कि कोरोना'काल से दुनिया कबतक निकलेगी और जब निकलेगी तो कैसी होगी दुनिया? देशों की आर्थिक सेहत कितनी बुरी होगी और कितनी जल्दी आर्थिक सेहत ठीक हो जाएगा? क्या मिसाइल और आधुनिक हथियारों के दम पर डराने वाले मुल्कों की आर्थिक हालत वैसी ही रहेगी,जैसी पहली थी? शायद इन सवालों के जवाब आने वाले वक़्त में मिलेंगे। एक जो सवाल है कि कैसी होगी दुनिया, अगर इसके आर्थिक परिप्रेक्ष्य की बात ना करें, तो इंसानों की बदली आदतों के आधार पर दावे के साथ तो नहीं, लेकिन अनुमान लगाया जा सकता है, जो इस काल से बचकर निकल जाएंगे, वो इस बात का ज़रूर ख़याल रखेंगे कि प्राकृतिक से खिलवाड़ नहीं करेंगे और स्वच्छता और खान-पान में आए बदलाव को जारी रखेंगे। 
हम सब जानते हैं कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमारे देश की हालत कैसी है। ना तो ज़रूरत के हिसाब चिकित्साकर्मी हैं और ना ही ज़रूरत के हिसाब से स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर है। ऐसे में इन दिनों बहुत ज़रूरी है कि ख़ुद ही अपना ख़याल रखें और कोरोनावायरस के संक्रमण से बचने के लिए जो उपाय सुझाए गए हैं, उनका पालन करें।

दुनियाभर में इन दिनों हाथ मिलाकर अभिवादन करने की बजाय नमस्ते किया जा रहा है,जो हमारी भारतीय सभ्यता में पहले से ही थी, लेकिन आधुनिकता के दौर में हम में से ज़्यादातर लोग भूल गए थें। लेकिन इस बदले हुए जमाने में भी मैं और मेरे सहकर्मी अमित पालित एक दूसरे का अभिवादन नमस्ते करके ही करते हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाथों को समय-समय पर ठीक से धोने के लिए सलाह दिया,जिसको हमसब को कोरोना'काल के बाद भी जारी रखना होगा। ताकि हम स्वच्छ और स्वस्थ रहेंगे तो देश भी स्वच्छ और स्वस्थ रहेगा।

आयुष मंत्रालय,भारत सरकार ने इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं, जिसका पालन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। 

इन दिनों भारत की तमाम नदियां पहले से ज़्यादा निर्मल दिखाई दे रहीं हैं। यह सही वक़्त है उन सभी फ़ैक्ट्री मालिकों के पास जिनकी वज्ह से नदियों का पानी दूषित होता है, विचार करें और नदियों में जाने वाले अवशेषों को रोकने की व्यवस्था करें।

इन दिनों भारत के वे सभी शहर जिसकी गिनती वायु प्रदुषण की वज्ह से दुनिया के दूषित शहरों में होती थी, वहां के जीव-जन्तु लॉकडाउन की वज्ह से शुद्ध हवा ले रहे हैं।ऐसे शहरों में रहने वाले सभी लोगों को चाहिए कि लॉकडाउन के समाप्त होने के बाद भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करें ताकि वायु प्रदुषित होने से बचा रहे।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...