पिछले एक हफ़्ते से कोरोनावायरस संकट के बीच हमेशा की तरह हिन्दू-मुस्लिम टॉपिक पर चर्चा अपने चरम पर है। ऐसी चर्चाओं से ना तो घबराने की ज़रूरत है और ना ही ज़्यादा रूचि लेने की ज़रूरत है, क्योंकि इसमें कुछ नया नहीं है। ये सब पहले से होता आ रहा है और आगे भी जारी रहेगा क्योंकि यह करने वाले जो भी हैं, वो 'हिन्दू-मुस्लिम' टॉपिक में फंसे लोग हैं, जो ख़ुद को इस दलदल से निकालने की बजाय युवाओं को फंसाते रहते हैं। मेरे कई साथी भी ' थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग' से प्रभावित हैं। कोई जाति तो कोई धर्म के नाम पर किसी के ख़िलाफ़ ज़हर बोते रहते हैं। बहुत सारे उदाहरण दे सकता हूँ, लेकिन पिछले एकाध-दो हफ़्ते के दो उदाहरण आपको दे रहा हूँ, ताकि समझने में आसानी होगी कि लोग कैसे धर्म को लेकर अंटके हुए हैं।
हिन्दुस्तान में Pandemic कोरोनावायरस के साथ-साथ Infodemic और समाज के उपद्रवियों से भी लड़ाई चल रही है। इसी से संबंधित दो ताज़ा उदाहरण देता हूँ।
एक दिन मैंने फ़ेसबुक पर इस बात की जानकारी दी कि राजस्थान के दो मुस्लिम युवकों को पुलिस ने टिकटॉक के माध्यम से अफ़वाह फैलाने के मामले में गिरफ़्तार किया है। तो मेरे एक मुस्लिम मित्र ने आपत्ति दर्ज कराई और कॉमेंट किया कि क्या हिन्दू- मुसलमान किए हो? तो मैंने पूछा कि क्या आप नहीं चाहते हैं कि फ़ेक न्यूज़ पर लगाम लगे? आज तक उन्होंने जवाब नहीं दिया है।
दूसरा उदाहरण, 19 अप्रैल को मैंने लिखा कि "एक तरफ़ देश के अलग-अलग हिस्सों से ख़बरें आ रही हैं कि एक वर्ग पुलिसकर्मियों और चिकित्साकर्मियों पर लाठी-डंडों और पत्थर से हमले कर रहे हैं, जान लेने पर आमदा हैं। वहीं दूसरी तरफ़, एक दूसरा वर्ग है जो कोरोनावायरस से हमें-आपको बचाने में जुटे हुए हैं,उनका सम्मान भी किया जा रहा है।" मेरे इस बात पर एक मित्र ने 'वर्ग' शब्द का इस्तेमाल किए जाने को लेकर आपत्ति जताई। उनको लगा कि वर्ग लिखने से मेरा संबंध मुस्लिमों से है, जबकि मैंने वर्ग शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया था क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों में कहीं कोरोना वॉरियर्स पर हमले हुए तो कही स्वागत हुए। लेकिन मैंने अपने मित्र को कोई जवाब देना उचित नहीं समझा, क्योंकि मैं जानता हूँ कि इस बहस में फंसने का मतलब है समय की बर्बादी। हक़ीक़त क्या है किसी से छिपा है? आज सरकार ने स्वास्थ्यकर्मियों पर बढ़ते हमलों को देखते हुए एक अध्यादेश लाई है। इस अध्यादेश की जानकारी देते हुए केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले को बर्दास्त नहीं किया जाएगा। हमला करने वालों को जमानत नहीं मिलेगी और एक साल के भीतर सुनवाई पूरी की जाएगी। इसमें 50 हज़ार से 2 लाख रूपये तक जुर्माने और 3 महीने से 5 साल तक की सज़ा का भी प्रावधान है। गम्भीर चोट के मामले में अधिकतम सात साल की सज़ा हो सकती है।
ये दोनों उदाहरण मैंने अपने मुस्लिम मित्रों के दिए हैं। सिर्फ़ यह बताने के लिए कैसे लोग 'हिन्दू-मुस्लिम' में फंसे हुए हैं कि सच को सुनने और हर बात को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखने के सिवा कोई उपाय ही नहीं रह गया है। मुझे लगता है कि देश के युवाओं को 'द थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग' से बाहर निकलना चाहिए और बिना लेकिन-किन्तु- परन्तु के सच को सच कहने और सुनने की आदत डालनी चाहिए। किसी की भी ग़लती से किसी की ग़लती को जस्टिफ़ाई नहीं किया जाना चाहिए।
अब बात करते हैं तब्लीग़ी जमात की। हिन्दुस्तान में कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों में से अकेले 30 फ़ीसद लोगों के संबंध जमात से हैं। बिल्कुल शुरुआत में जब जमात का मामला सामने आया था तो स्वघोषित सेकुलरों ने 'छिपे' शब्द को लेकर आपत्ति जताई थी। आज आलम यह है कि राज्य सरकारें बार-बार अपील कर रही हैं कि जमात के लोग ख़ुद से सामने आएं और अपनी जांच कराएं, नहीं तो जानकारी मिलने पर क़ानूनी कार्रवाई होगी, तब भी लोग सामने नहीं आ रहे हैं। जमात से जुड़े लोगों की कई ऐसी शर्मनाक़ हरक़तें सामने आईं, जिसकी मज़म्मत बहुत सारे मुसलमानों ने भी किए है। सोमवार को ख़बर आई थी कि हरिद्वार के एक क्वॉरेंटाइन सेंटर से तब्लीग़ी जमात से जुड़ा शख़्स भाग गया था, जिसको बाद में गिरफ़्तार कर लिया है। गूगल करेंगे तो तब्लीग़ी जमात से जुड़े लोगों की बहुत सारी घटिया हरकतें आपको देखने को मिल जाएंगी। नर्सों से बदतमीज़ी के भी कई मामले सामने आए हैं। आज ही दिल्ली में कोरोनावायरस के शिकार एक मुस्लिम शख़्स ने नर्स से हाथापाई तक की, लेकिन किसी तरह से जान बचाकर वो नर्स उन लोगों से जान बचाकर भाग आई। नीचे लिंक दे रहा हूँ, वीडियो में आप सुनेंगे कि निज़ामुद्दीन मरकज़ के प्रवक्ता कह रहे हैं नर्स को छेड़खानी की वीडियो दिखानी चाहिए।https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3260874297302174&id=138762029513432
कोरोना महामारी को देखते हुए कई मुस्लिम देशों ने सामूहिक नमाज़ पढ़ने पर रोक लगा दी है। लेकिन भारत में क्या हो रहा है? जुमे की नमाज़ के लिए देश के किसी ना किसी हिस्से में लोग इकट्ठे मिल जाते हैं और जब पुलिस कार्रवाई करती है तो रोना रोने लगते हैं। मुझे ठीक-ठीक याद है कि पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के पोते की शादी हो, बीजेपी विधायकों के जुलूस और जन्मदिन मनाने की घटना हो या सीएम योगी और शिवराज सिंह चौहान की बात हो, सब की काफ़ी आलोचना हुई है और डिबेट हुई है। फिर ऐसे में तब्लीग़ी जमात या वो मुस्लिम, जिनकी वज्ह से पूरा मुस्लिम समाज शर्मसार होता है, उसपर मीडिया में चर्चा क्यूँ नहीं होनी चाहिए? कब तक कथित रूप से अल्प-संख्यक होने के नाम पर इनके ग़लत कामों पर पर्दा डालने की कोशिश होती रहेगी? तब्लीग़ी जमात की आलोचना और उनकी करतूतों पर सवाल करने का मतलब सभी मुसलमानों से नहीं होता है। तब्लीग़ी जमात की हरकतों से देश के नामवर मौलानाओं और मुस्लिमों ने ख़ुद को अलग कर लिया है। हिन्दुस्तान में क़ानून सबसे के लिए बराबर है, इसलिए सवाल सभी होगा।