शुक्रवार, 20 मार्च 2020

पीएम मोदी ने कहीं ये नहीं, इन वज्हों से देश को सम्बोधित तो नहीं किया है!

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस को लेकर प्रधानमंत्री मोदी का देश को सम्बोधन, आप किस रूप में देखते हैं? कई लोगों ने पीएम की बातों पर अम्ल करते हुए उनकी बातों को प्रसारित करने में लगे हुए हैं तो बहुत सारे लोग तनक़ीद भी कर रहे हैं। आलोचना करने वाले लोग पीएम के सम्बोधन को इस रूप में देख रहे हैं कि सरकार ने ख़ुद को सरेंडर कर दिया है। मेरे मित्र @Chaman Mishra ने लिखा कि “ऐसे वक़्त में मोदी जी में नेहरू जी समा जाते हैं” तो जवाब में @अंकित द्विवेदी ने लिखा कि ये महाशय (नरेन्द्र मोदी) कभी भी नेहरू नहीं बन सकते हैं। कई लोग कह रहे हैं कि पीएम मोदी हर चीज़ को इवेंट बना देते हैं। कोरोना वायरस से संकट के समय पीएम को इवेंट से बचना चाहिए और ज़रूरी कामों पर ध्यान देना चाहिए। आपका क्या कहना है?

पीएम मोदी ने अपने सम्बोधन में बहुत सारी बातें बताई, लेकिन चर्चा 'जनता कर्फ़्यू' की ही हो रही है। पीएम की बातों के आलोचकों और समर्थकों में वाक्य युद्ध हो रहे हैं। इस वाक्य युद्ध का नतीजा 22 मार्च को पता चल जाएगा। लेकिन मेरे ख़याल से पीएम मोदी की बातों को जनता कर्फ़्यू और इवेंट के इतर भी देखना चाहिए कि पीएम मोदी आख़िर देश को सम्बोधित करने क्यूँ आएं थें? एक तरफ़ कोरोना वायरस के ख़तरे से गाँव-क़स्बों के लोग अब भी जागरूक नहीं है। वहाँ के लोग इस वायरस को अब भी काफ़ी हलके में ले रहे हैं। दूसरी तरफ़ जान-बूझकर भी लोग लापरवाही बरत रहे हैं। सरकार रोज़-रोज़ बता रही है कि कोरोना वायरस से बचने के लिए क्या-क्या करना चाहिए, लेकिन लोग मान नहीं रहे हैं। मुल्कभर के दीगर शहरों में धारा 144 क्यूँ लागू करनी पड़ रही है? शायद इसी वज्ह से कि लोग मान नहीं रहे हैं। ना जाने ट्रैवल हिस्ट्री क्यूँ छिपा रहे हैं।

हमारे देश में कोरोना वायरस के शिकार मरीज़ों में मुसलसल इज़ाफ़ा हो रहा है, सिर्फ़ इसलिए कि लोग लापरवाही बरत रहे हैं। एक नागरिक के रुप में इस संकट की घड़ी में आपको एक आदर्श नागरिक का परिचय देते हुए सरकार ने जो भी उपाय बताएं हैं उसका पालन करना चाहिए। बताए गए उपायों का पालन करना हमारा संवैधानिक कर्तव्य भी है। अफ़वाहों पर लोग ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं। गुरूवार को देश के कई हिस्सों से ख़बरें आईं कि लोग अपने-अपने घरों में राशन इकट्ठा करने लगे हैं। लोगों में राशन इकट्ठा करने को लेकर बे-वज्ह अफ़रा-तफ़री मची है। शायद इन्ही सब वज्हों से पीएम मोदी को देश को सम्बोधित करना पड़ा। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर तमाम कई सारी अंन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने कोरोना वायरस के ख़तरे से निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की तारीफ़ की है। आप थाली या ताली बजाएंगें या नहीं, यह आपकी मर्ज़ी है। लेकिन आप अपनी नैतिक और संवैधानिक ज़िम्मावारियों को समझते हुए बहुत ज़रूरत हो तब ही किसी से मिलिए और अफ़वाहों को फैलाने से बचिए। आप इस रूप में सोचिए कि आपकों ख़ुद को इस वायरस से बचाना है और अगर ऐसे ही सभी लोग सोचने लगेंगे तो कोरोना वायरस को आसानी से मात दिया जा सकता है।

मंगलवार, 17 मार्च 2020

ज़िन्दगी में छांव।


आज दोपहर के वक़्त हस्पताल से मैं लौट रहा था, अचानक से मेरी नज़र इस शख़्स पर पड़ी। कुछ दूरी पर रेड लाइट होने की वज्ह से हमारी गाड़ी की रफ़्तार धीमी हो गई तो मैंने ये तस्वीर क़ैद कर ली। 24*7 वर्किंग कल्चर के कर्मचारियों के लिए यह तस्वीर कुछ पल से लिए सुकून तो पहुंचा ही सकती है। हाँ, उनलोगों को शायद नहीं जिन लोगों ने कैरियर के नाम पर रोबोट बनना स्वीकार कर लिया है। 24*7 वर्किंग कल्चर में स्वीकार्यता उनकी है जिनकी इंसानियत क़रीब-क़रीब शून्य पर पहुंच चुकी है। एक बार एक सीनियर ने मुझसे कहा था कि तुम इतने संवेदनशील क्यूँ हो, तुम्हे काम करना है। इतने संवेदनशील रहोगे तो हो गया काम। इस बात ने तब भी मुझे आश्चर्यचकित कर दिया था और अब भी जब कभी याद आ जाती है,तो मैं इस उलझन में पड़ जाता हूँ कि ऐसे लोगों की मानसिकता का स्तर क्या होता होगा,निम्न या उच्च?

ख़ैर,जब भी यह तस्वीर आखों के सामने हो रही है, तो ख़याल आ रहा है कि थकना मना है हो चुकी ज़िन्दगी में छांव की कितनी ज़रूरत है। छांव में लेटा हुआ यह व्यक्ति अपने काम को करके जब थक जाता होगा तो थोड़ी देर ऐसे ही आराम कर लेता होगा, फिर नई ऊर्जा के साथ अपने काम की शुरूआत करता होगा। कॉरपोरेट कल्चर में काम कर-करके थका हुआ व्यक्ति चाय की चुस्की या सिगरेट की कश या फिर दोनों से अपनी थकान मिटाता है। वर्षों तक काम करके, चाय की चुस्की और सिगरेट की कश से थकान मिटाने वाला व्यक्ति एक वक़्त के बाद जब पीछे मुड़कर देखता है तो शायद की किसी को वो समाज नसीब होता होगा, जहां थोड़ी देर बैठकर वक़्त बीता सके। दिन-दुनिया की बातें कर सके। डिओ न मारने वाले पाँच-दस लोग जानते हो, जो खेत-खलिहान गांव-जवार की बातें कर सके। 

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...