गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

बीजेपी शासित राज्य देश के पिछड़ेपन का कारण है!


नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अमिताभ कान्त ने 'चैलेंज अॉफ़ ट्रांसफ़ॉरमिंग इण्डिया' पर बोलते हुए कहा कि सामाजिक संकेतकों के मामले में बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों के कारण भारत पिछड़ा बना हुआ है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया,नई दिल्ली में प्रथम अब्दुल गफ्फार ख़ान स्मारक व्याख्यान के दौरान श्री कान्त ने दक्षिण-पश्चिमी राज्यों की पीठ थपथपाई।कहा कि, दक्षिण-पश्चिम के राज्य बहुत अच्छा कर रहें हैं और तेज़ी से आगे बढ़ रहें हैं।
नीति आयोग को हिंदी में राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान के नाम से जाना जाता है।यह योजना आयोग का परिवर्तित रूप है। इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता हैं।यह सरकार का थिंक टैंक होता है।इसकी ज़िम्मेदारी देश के समग्र विकास के लिए नीतियां बनाकर, क्रियान्वित करना है।इस संस्थान का निर्माण 2015 में हुआ है।
सतत विकास के महत्व पर ज़ोर देते हुए श्री कान्त ने कहा कि देश में शिक्षा और स्वास्थ्य बदहाल स्थिति में है,जिसकी वज़ह से देश पिछड़ रहा है।हमारे सीखने के परिणाम बहुत दुखद है।एक पांचवीं कक्षा का छात्र दूसरी कक्षा के जोड़-घटाव नहीं कर पाता है। पांचवीं कक्षा का छात्र अपनी मातृभाषा तक नहीं पढ़ पाता है। शिशु-मृत्यु दर बहुत ज़्यादा है।ये वो बिन्दु है जिनपर सुधार किए बिना सतत विकास करना बहुत मुश्किल होगा।
वर्तमान में बिहारउत्तर प्रदेशछत्तीसगढ़,मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शासन में है।एमपी और छत्तीसगढ़ में पिछले 15 साल से बीजेपी की सरकार है।इक्कीसवीं सदी के राजस्थान में 2013 से बीजेपी की सरकार है।इससे पहले 2003-2008 में भी बीजेपी की शासन में थी।जंगल राज के बाद से बिहार में काफ़ी लम्बे अरसे से सरकार की सहयोगी है बीजेपी हैं।2005 के बाद से अबतक के बीच में क़रीब 20 महीने के लिए जदयू का साथ छूटा था।यूपी में बीजेपी को शासन करते हुए मात्र एक साल हुए हैं।

सोमवार, 23 अप्रैल 2018

कांग्रेस की मुख्य न्यायाधीश को हटाने की मुहिम फ़्लॉप!


मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ महाभियोग पर संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्पय,लोकसभा के महासचिव,पूर्व विधि सचिव पीके मल्होत्रा,पूर्व विधाई सचिव संजय सिंह और राज्यसभा सचिवालय के अधिकारियों से माथापच्ची के बाद आज उपराष्ट्रपति ने तकनीकी आधार पर ख़ारिज कर दिया। अब कांग्रेस के पास विकल्प है कि वह सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। गौरतलब है कि शुक्रवार को कांग्रेस समेत सात विपक्षी दलों ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को हटाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 217 के साथ 124(4) के तहत राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति एम वैंकेया नायडू को नोटिस दिया था। कांग्रेस का आरोप था कि चीफ़ जस्टिस मिश्रा, पद का दुरूपयोग कर रहें है और चीफ़ जस्टिस पद की गरिमा को नुक़सान पहुंचा रहें हैं। महाभियोग पर कपिल सिब्बल ने प्रेस कांफ्रेंस कर कहा था  कि 'भारत के मुख्य न्यायाधीश' पद की गरिमा बनी रही, इसलिए हमने महाभियोग प्रस्ताव लाया है। कांग्रेस की पीसी के बाद सोशल मीडिया पर मोदी सरकार और मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के आलोचना की बाढ़ सी आ गई थी। आलोचकों में ज़्यादातर वो लोग थें, जो कांग्रेस की तरह ही सियासी विरोध में संविधान की मर्यादा का ख़याल रखना भुल गये थे। कांग्रेस का तो इतिहास है कि एक व्यक्ति और सत्ता के लिए लोगों के संवैधानिक अधिकार तक को छिन लिया था। न्यायपालिका को किसी हद तक अपने कब्ज़े में कर लिया था। वर्तमान में दु:ख की बात तो ये है कि कांग्रेस पार्टी तो जज लोया की मौत और चार जजों के सहारे राजनीति कर रही है, लेकिन क्या आम लोगों को भी यही करना चाहिए? क़ानून के तमाम जानकारों ने कांग्रेस के इस कदम को पूर्ण रूप से सियासी बताया था और कहा था कि यदि संसद में इस महाभियोग पर कार्यवाही हुई तो न्यायालय से लोगों का भरोसा समाप्त होने लगेगा।यहां तक की कांग्रेस के ही पेेेशे से वकील कई बड़े नेताओं ने इस कदम को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। इसलिए मैंने सोचा कि सोशल मीडिया से इत्तर संविधान या क़ानून के जानकार, कांग्रेस के इस महाभियोग प्रस्ताव पर क्या सोचते हैं, उसको आप तक पहुंचाऊं, ताकि आप सही ग़लत में फ़र्क समझ सके। क्योंकि सोशल मीडिया के युग में सही-ग़लत में फ़र्क करना बेहद मुश्किल हो गया है। इस युग में एक हीं विषय पर घंटों और सालों तक अध्यन करने वाले ख़ुद को एकान्त में पड़ी किसी वस्तु जैसा महसूस कर रहे होंगे।क्योंकि सोशल मीडिया पर हर कोई हर विषय पर एेसे ज्ञानोत्सर्जन कर रहा है,जैसे उस विषय का वह ज्ञाता है।पहले इस कैटेगरी में राजनीतिक दलों के प्रवक्ता आते थें, लेकिन अब तो ख़ुद को पत्रकार कहने वाले युवा भी इस रेस में शामिल हो गयें। मोदी विरोध में वो कब पत्रकार से पक्षकार बन गए, उन्हें ही पता नहीं चला। इसलिए ज़रुरी है किसी अंतिम सत्य तक पहुंचने से पहले ख़ुद भी मेहनत करें और हक़ीक़त जानने की कोशिश करें।
दरअसल इस मामले की शुरुआत 12 जनवरी को 4 जजों के प्रेस कांन्फ्रेंस के बाद हुई।जजों ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर कई आरोप लगायें, जिसमें से एक है जज लोया की संदिग्ध मौत की सुनवाई का और केस के बंटवारे का। जजों की पीसी के बाद विपक्ष को ये एक मुद्दा मिल गया। बजट सत्र के दौरान भी महाभियोग विपक्ष के एजेंडे में था, लेकिन कुछ क्षेत्रिये पार्टियों ने साथ देने से इंकार कर दिया था। इसलिए अब जब सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की मौत को स्वाभाविक बताया, तो कांग्रेस की अगुवाई में सात विपक्षी दलों ने महाभियोग प्रस्ताव लाया। लेकिन इस बार पार्टी टीएमसी और डीएमके का साथ नहीं मिला। मतलब साफ़ है कि फै़सला पसंद नहीं आया तो महाभियोग ले आये। संविधान के जानकार इसे ख़तरनाक बता रहें। इनका कहना है कि यदि इस प्रक्रिया को बढ़ावा दिया गया तो संसद के दोनों सदनों में बहुमत वाली पार्टी जब चाहे किसी भी न्यायधीश को, उसके मन मुताबिक फ़ैसला ना देने पर हटा सकती है। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद या चाहे कोई भी कहे कि इस महाभियोग का जज लोया कि मौत से लेना-देना नहीं है‌। लेकिन आप महाभियोग की कवायद के समय पर गौर कीजिए, मक़सद पता चल जाएगा।
कांग्रेस का इतिहास पहले बता दिया हूं। कपिल सिब्बल का भी महाभियोग से जुड़ा एक इतिहास जान लीजिए। महाभियोग के इतिहास में पहली बार किसी मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ महाभियोग लाया गया,तो आरोपी न्यायाधीश वी राधास्वामी के समर्थन में संसद में घंटों बहस किया था। वी राधास्वामी ने बाद में इस्तिफ़ा दे दिया था। राधास्वामी पर 1991 में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। नियुक्ति में गड़बड़ी की बात संसद भवन तक पहुंच गया था।
महाभियोग पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  ने हस्ताक्षर नहीं किया है‌। कांग्रेस के तरफ़ ये दलील दी गई है कि वो पूर्व पीएम है इसलिए उनको शामिल नहीं किया गया है। अब संविधान के जानकार,कुछ वरिष्ठ वकीलों और यूपीए के कार्यकाल में क़ानून मंत्री रह चुके लोगों की राय बताता हूं कि वो कांग्रेस के इस महाभियोग प्रस्ताव के बारे में उनका क्या कहना था। थोड़ा वक़्त लगा है पढ़ने में थोड़ा और वक़्त लगा दीजिए,क्योंकि मामला न्यायपालिका का है।यदि आप ग़लत सही में फ़र्क नहीं करेंगे और चुपचाप बैठे रहेंगे तो न्यायपालिका की हालत आपातकाल जैसी हो जाएगी,तो न्याय के लिए कहां जाएंगे?
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने कहा था कि महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस राजनीतिक कदम है और  न्यायपालिका और सरकार को शर्मिन्दा करने वाला है।आगे कहा था कि संविधान में अक्षमता और दुर्व्यवहार जैसे अपराधों पर किसी जज को हटाने का प्रावधान तो हैं,लेकिन महाभियोग का नहीं,इसलिए राज्यसभा के सभापति विपक्ष की अर्जी को ख़ारिज भी कर सकते हैं।
वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने कहा था कि कांग्रेस का प्रस्ताव रद्दी का टुकड़ा है।संविधान के ख़िलाफ़ है।ऐसा लगता है कि कांग्रेस के नेताओं को न तो संविधान की जानकारी है।और ना ही वो संविधान को पढ़ने की कोशिश करते हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज एस एन ढींगरा ने कहा कि ये सियासी चाल है।न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश है।कांग्रेस के पास ना तो नम्बर है।और कांग्रेस के तरफ़ से जो प्रस्ताव दिए गए है, वो महाभियोग के दायरे में नहीं आते हैं। इससे चीफ़ जस्टिस पर आंच नहीं आएंगे। कांग्रेस का प्रस्ताव गिर जाएगा लेकिन न्यायपालिका पर जो दाग लगेगा वो दु:ख की बात है। जिस मक़सद के लिए आलोचना की जा रही है, वो ग़लत है। आलोचना न्यायपालिका को बेहतर करने के लिए हो, तो समझ आती है। यहां तो न्यायिक तंत्र की ही आलोचना की जा रही है।
यूपीए सरकार के दो क़ानून मंत्री की राय-
सलमान खुर्शीद ने कहा कि जो भी निर्णय आता है वो अंतिम निर्णय होता है एससी का। आगे उसको चैलेंज करने के लिए और भी कई प्रावधान है।ईमानदारी और विश्वसनीयता पर सवाल करना सही नहीं है। मुझे लगता है कि जो भी वकील होगा ऐसा नहीं करेगा। महाभियोग एक गंभीर मुद्दा है।इसे कोर्ट के किसी फ़ैसले,राय या फ़िर असहमति की वजह से नही लाना चाहिए।
आश्विनी कुमार ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश के ख़िलाफ़ महाभियोग लाना ठीक नहीं है।ये ना होता तो अच्छा होता। न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव नहीं होना चाहिए।
                                                                        अभिषेक मनु सिंघवी का बयान बड़ा दिलचस्प था।सिंघवी ने कहा कि ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।हम मैं या मेरी पार्टी खुशी या हर्ष से ये नहीं कर रहें  हैं।मैं ख़ुद इसका विरोध कर रहा था,लेकिन पार्टी के वफ़ादार सैनिक होने की वजह से हस्ताक्षर किए हैं।














मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

अब कर्नाटक के सियासत में महंथों की दस्तक!

अगले महीने होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सियासत कर वो रंग अब खुलकर सामने लगा है,जो इससे पहले यहां की सियासत में कभी दिखाई नहीं दिया।विकास के भरोसे राजनीति करने का दम्भ भरने वाली दो बड़ी पार्टियां भगवा के भरोसे अपनी सियासी नैया पार कराने में जुट गई है।भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की सियासी दौड़ जारी है। मठ,मन्दिर और दरगाह सियासत का केन्द्र बन गए हैं।क़ानून की दुहाई देने वाले दोनों बड़ी पार्टी के अध्यक्षों की लगातार धार्मिक स्थानों पर दौरे की ख़बरें आ रही हैं,जो संवैधानिक रूप से ग़लत है।आनेवाले समय में लोकतंत्र के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को चुनाव आयोग कितना अक्षुण्ण रख पाएगी ये तो आनेवाला वक़्त ही बताएगा।जनप्रतिनिधित्व क़ानून 1951 की धारा 13(3) साफ़ कहती है कि कोई भी उम्मीदवार या उसका एजेंट धर्म,जाति,समुदाय या भाषा के आधार पर वोट नहीं मांग सकता।
इन नेताओं के दौरे के बीच,भाषाई भिन्नता होने के कारण बोलते वक़्त में होने वाली गड़बड़िया एक-दूसरे पर हमलावर होेने का मौका दे रही हैं,तो वहीं जनता के लिए हास्य का विषय।लेकिन इन सब के बीच अचानक से एक साथ चार महतों की यहां के सियासत में एंट्री,बीजेपी के लिए कम लेकिन कांग्रेस के लिए ज़्यादा परेशानी का सबब बनता दिखाई दे रहा है।उडुपी से लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी,धारवाड़ से बासवानन्दा स्वामी, मेंगलुरू से राजशेखरनन्दा स्वामी और चित्रदुर्ग से मद्रचेन्नया स्वामी बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। दिलचस्प बात ये है कि इन चारों के निशाने पर कांग्रेस हैं।हालांकि मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी ने इन सबको टिकट देने को लेकर कोई वादा नहीं किया।ये लोग हमेशा से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काम और नीतियों की भी तारीफ़ करते रहे हैं।इन चारों के अलावा कई और साधु-संतों के भी चुनाव लड़ने के संकेत मिल रहे हैं।साधु-संत भी अब इस बात को समझने लगें हैं जब राजनीति 'धर्म' के इर्द-गिर्द घुमने लगी है तो सियासी इस्तेमाल होने से अच्छा है,ख़ुद क्यों ना नेता बन जाए।इसलिए इतनी बड़ी संख्या में साधु-संतों ने दिलचस्पी दिखाई है।
उडुपी के आठ प्राचीन श्रीकृष्ण मठों में एक शिरूर मठ के मठाधीश लक्ष्मीवारा तीर्था स्वामी ने यहां तक कह दिया है कि उन्हें टिकट नहीं मिलता है तो निर्दलीय भी लड़ सकते हैं।स्वामी के ऐलान ने राजनेताओं की नीन्द उड़ा दी  है।भाजपा के पूर्व विधायक रघुपति भट के अलावा कई नेता उनका विरोध भी कर रहें है।स्वामी की राजनीति में आने से भक्त खुश हैं।स्वामीजी का कहना है कि वह हिन्दू के पक्षधर हैं।इसका मतलब ये नहीं है कि वहां के ईसाई और मुसलमान मेरी इज्ज़त नहीं करते।सब मुझे बहुत सम्मान देते हैं.जिसकी वजह से मैं लोगों का सेवा करना चाहता हूं।ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जिनके पास विकास की रौशनी तक अभी भी पहुंचना बाकी है।
व्रजदेही मठ के राजशेखरनन्दा स्वामी तो छह बार के विधायक और कर्नाटक सरकार में वन मंत्री रमानाथ के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना चाहते हैं।राजशेखरनन्दा स्वामी बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हैं।इनको भड़काऊ और विवादस्पद भाषण के लिए जाना जाता है।
बात दक्षिण भारत की राजनीति में महंतों की भूमिका की हो रही है तो दक्षिण भारत के ही एक प्रसिद्ध संत की बड़ी दिलचस्प जानकारीआपके साथ साझा कर रहा हूं,जो मुझे शोध के दौरान मिली।ये जानकारी संत माणिक्कवाचकर और आज के साधु-संतो की सियासी सोच में कितना फ़र्क है ये बतायेगा।नौवीं सदी में द.भारत के प्रसिद्ध संत माणिक्कवाचकर पांड्य राजवंश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे।उनमें जब आध्यात्मिकता जगी,तो उन्होंने सबसे पहले प्रधानमंत्री पद का त्याग किया और लिखा-'कटारैयान वेंडेन करपडम इनियुम।'यानि इससे आगे वो चतुर या राजनीतिज्ञों का साथ नहीं चाहते हैं।उनका मानना था कि राजसत्ता और राजनीति के लिए जिस चतुराई की ज़रुरत होती है,वह अध्यामिकता की दुश्मन होती है।आध्यात्मिक साधक की सेवा-भावना को नष्ट करने के लिए सत्ता से जुड़ा ऐश्वर्य और अहंकार पर्याप्त होता है।इसलिए सच्चे संतों और समाज सेवियों ने स्वयं को सत्ता से दूर रखा है। 

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...