मंगलवार, 13 मार्च 2018

कदाचार और भ्रष्टाचार मुक्त परीक्षा की मांग पर अड़े हैं छात्र।

हाथ में तिरंगा झण्डा,'आखें खोलिए मोदी जी,आपका युवा दर-दर की ठोकर खा रहा है' और 'ना मंदिर चाहिए,ना मस्जिद चाहिए,हमें सिर्फ़ नौकरी चाहिए' जैसे लिखित और मौखिक नारों के साथ देश के भविष्य कहे जाने वाले अपने ही भविष्य की लड़ाई लड़ रहें है।कर्मचारी चयन आयोग से लड़ने वाले इन योद्धाओं को लड़ाई में विजय हासिल हो,उसके लिए मेरी शुभकामनाएं।27 फ़रवरी से लगातार प्रदर्शन कर रहे इन अभ्यर्थियों को सरकार की तरफ़ से भी सार्वजनिक रुप से 'स्पेशल थैंक्स' बोला जाना चाहिए,क्योंकि ये 'एक पंथ दो काज' कर रहें हैं।प्रदर्शन कर ये अभ्यर्थी अपने भविष्य की चिन्ता तो जता हीं रहे हैं,साथ हीं सरकार को निन्द से जगा रहे हैं कि उठिये...देखिए,आज़ादी के 70 साल बाद भी हमारे पास ना तो कदाचार मुक्त परीक्षा व्यवस्था है और ना ही भ्रष्टाचार मुक्त संस्थान।
प्रदर्शन कर रहे इन छात्रों के कथित आरोपों के बाद कर्मचारी चयन आयोग में  पुर्ण रुप से आत्मविश्वास की कमी दिखी।जब छात्रों ने आरोप लगाया कि पेपर लीक में एसएससी के अधिकारी और ऑनलाइन परीक्षा संचालन करने वाली एजेंसी भी शामिल है।तब एसएससी ने आरोपों को ख़ारिज कर,छात्रों पर हीं आरोप लगा दिया।आयोग ने बयान जारी कर कहा कि सभी आरोप बेबुनियाद है।हमने अपने आंतरिक सूत्र से आरोपों की जांच की है और पाया है कि आरोप पूरी तरह से शरारतपूर्ण है।छात्रों द्वारा ये कदम बदनियती से और परीक्षा से ध्यान हटाने के लिए उठाया गया।अब आप ही सोचिए कि,क्या कोई भी छात्र ऐसा चाहेगा कि जिसके लिए वो ना जाने कितने मुश्किलों का सामना कर,सालों से परीक्षा की तैयारी कर रहा है और जब परीक्षा का समय आए तो वो शरारत करने लगे,अपवाद की बात नहीं कर रहा हूं।छात्र जब सीबीआई जांच की मांग पर अड़े रहें तो,क्यों आयोग ने छात्रों से मिलकर गहन जांच की बात कही?आयोग क्यों इस बात पर नहीं अड़ा रहा कि हमने कदाचार मुक्त परीक्षा कराई?शायद इसलिए कि एक छात्र के नाम पर क़रीब 750 प्रवेश-पत्र इसी संस्थान द्वारा किया जा सकता है।बयान में आयोग ख़ुद को जितना गंभीर बता रहा है,तो क्यों हर तरह की जांच को पास करने के बाद भी सालों से अभ्यर्थी अपने नियुक्ति पत्र का इन्तज़ार कर रहें हैं?
अब बात करते है कि हमारी सरकारों ने अबतक छात्रों के आन्दोलन को कितनी गम्भीरता से लिया,क्योंकि चुनाव के वक़्त इन लोगों को युवाओं के बेरोज़गारी की चिन्ता बहुत सता रही थी।मुझे सबसे ज़्यादा प्रधानमंत्री की ख़ामोशी हैरान कर रही है कि ऐसा क्या कर दिया है इन छात्रों ने कि पीएम कुछ बोल नहीं रहें है?वो तो देश की युवा शक्ति पर गर्व करते हैं।पीएम की चुप्पी पर कई लोग ये दलील दे रहें है कि हर चीज़ पर बोले तब तो हो गया।मैं ऐसे लोगों से पूछना चाहता हूं कि क्या ऐसी कोई सूची है जिसमें लिखा हो कि पीएम इस मसले पर बोलेंगे,इसपे नही?चुप्पी के मामले में मुख्यमंत्री भी पीछे नहीं है।देश के अलग-अलग राज्यों से युवाओंं की जमात 'दिल्ली चलों' का पालन कर रहा है,लेकिन अरविन्द केजरीवाल को छोड़कर किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने इस मसले पर बोलना उचित नहीं समझा है,शायद इसलिए की ये धार्मिक नही बल्कि रोज़गार का मसला है।जिस देश में एक फ़िल्म को लेकर मीडिया और सियासत में क़रीब तीन महीने तक चर्चा हो जाए।क़रीब-क़रीब आठ से दस राज्यों के मुख्यमंत्री में से कुछ सर्वोच्च न्यायालय पहुंच जाए और उसी देश मेें कदाचार और भ्रष्टाचार को लेकर प्रदर्शन कर रहे युवाओं को नेताओं का सहयोग ना मिले तो क्या ये समझा जाए कि सरकार की नज़र में धार्मिक मसला महत्वपूर्ण है,रोज़गार नहीं?
दिल्ली स्थित एसएससी मुख्यालय के बाहर 27 फ़रवरी से प्रदर्शन शुरु होती है,उसके 5 दिन बाद यानी 4 मार्च को दिल्ली बीजेपी के अध्यझ मनोज तिवारी और सांसद मीनाक्षी लेखी अभ्यर्थियों से मिलने पहुंचते हैं।इन दोनों को किसी और राज्य के सांसदों का साथ नही मिला,जबकि राज्यों के ज़्यादातर सांसद अपने संसदीय क्षेत्र छोड़कर दिल्ली में ही डेरा जमाए रहते हैं।मनोज तिवारी का कार्य सराहनीय रहा,लेकिन अब तक उनका कोई फ़ायदा नही दिख रहा है।तिवारी ने गृहमंत्री राजनाथ सिह,भाजपा अध्यझ अमित शाह और पीएमओ में मंत्री जितेन्द्र सिंह को मिलकर छात्रों की मांग से अवगत कराया।मीनाक्षी लेखी ने वही कहा,जो आज कल चलन में है।जब कोई अपनी मांग को लेकर प्रदर्शन करता है,तो ये बता दिया जाता है कि इसमें बाहरी लोगों का हाथ है।गृहमंत्री द्वारा सीबीआई जांच के आश्वासन के बाद भी आज तक छात्र प्रदर्शन कर रहें हैं,क्योंकि उनको जिस बात का शक था वही हुआ।सीबीआई जांच शुरू हुआ कि नही?यदि जांच शुरू हो गया है,तो जांच कहां तक पहुंची?ऐसे सवालों का सरकार के तरफ़ से कोई जवाब नही दिया जा रहा है।जिससे छात्र आश्वस्त हो सके।







🗣️मुझे तो संशय है!

नासिक से क़रीब 180 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर तक़रीबन 35000 युवाओं,महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों की झुंड मुम्बई के आज़ाद मैदान पहुंची तो,शायद राज्य सरकार को पता चला कि कोई हमारे दर पर आया है।मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने पीसी कर जो कहा वो बेहद हैरान करने वाला है।मुख्यमंत्री की पीसी में ऐसा लगा कि उनको 'किसान' शब्द से परहेज़ है।किसानी तो एक पेशा है।वो किसी भी जाति या धर्म से हो सकता है।आदिवासी भी तो खेती करते ही हैं।उन्होंने कहा कि लॉन्ग मार्च कर आए लोगों की क़रीब-क़रीब सारी मांगें मान ली गई है।मार्च में 90% लोग आदिवासी हैं।मुख्यमंत्री के पास ऐसी कौन सी तकनीक है,जिससे कुछ हीं घंटों के भीतर उन्हें पता चल गया कि इतने प्रतिशत लोग आदिवासी हैं?इससे पहले जब 'पैदल लॉन्ग मार्च' शुरू हुआ था तब से लेकर आज़ाद मैदान, मुम्बई पहुंचने तक यही पता था कि इसमें ज़्यादातर किसान हैं,जो महाराष्ट्र सरकार पर वादाख़िलाफ़ी का आरोप लगा रहें हैं।इनकी मांग है कि सरकार स्वामीनाथन आयोग कि सिफ़ारिशों को लागू करे।मांग नहीं माने जाने तक वो विधानसभा का घेराव करेंगे।
मुख्यमंत्री की पीसी के बाद से एक सवाल ये है कि उन्होंने 180 किमी की पैदल यात्रा क्यों करवाई,जब उनको आदिवासियों की समस्या पहले से हीं पता था?सीएम ने कहा कि लिखित रूप में आश्वासन दिया गया है कि आदिवासियों की मांग को छह महीने के भीतर पूरा कर दिया जाएगा।लेकिन ये नहीं बताया कि कैसे?जो क़ानून क़रीब बारह साल में लागू नहीं कर पाए,वो छह महीने में कैसे लागू कर देंगे?15 दिसम्बर 2006 को संसद में पास 'अनूसुचित जाति और अन्य परम्परागत वन्य निवासी क़ानून' की महाराष्ट्र की हक़ीक़त ये है कि मात्र दो ज़िले गढ़चिरौली और नन्दूरबार में पुर्ण रूप से तो नहीं लेकिन लागू हो गया है।
किसानों की बात करें तो 20 जून 2017 को किसानों की कर्ज़माफी का एलान किया था लेकिन अभी तक लागू नहीं हो पाया है जिसकी वज़ह से लॉन्ग मार्च करना पड़ा।

भारत की राज-व्यवस्था

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