सोमवार, 27 नवंबर 2017

प्यू रिसर्च सेंटर का सर्वे बीजेपी के लिए संजीवनी,लेकिन कई सवाल भी।

                      
उम्मीद है 15 नवम्बर 2017 को आई प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के उस बिन्दु को आपने ज़रूर सुना होगा, जिसमें ये बताया गया है कि भारतीय राजनीति में पीएम मोदी लोकप्रियता के शीर्ष पर बरक़रार है।पिछले साल के मुकाबले नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में 7% फ़ीसदी का इज़ाफा हुआ है।इस साल 88% लोगों ने माना है कि नरेंद्र मोदी अच्छे नेता है, जबकि साल 2016 में 81% फ़ीसदी लोगों का मानना था।सर्वे में ये बात भी सामने आई है कि कांग्रेस उपाअध्यझ राहुल गांधी की लोकप्रियता में 5% की गिरावट दर्ज़ की गई है।पिछले साल 62% लोगों में राहुल गांधी की लोकप्रियता थी,जबकि इस साल घटकर 58% हो गया है।वहीं इस सर्वे में कांग्रेस अध्यझ सोनिया गांधी और दिल्ली के सीएम अरविन्द केजरीवाल की लोकप्रियता का भी ज़िक्र है।लेकिन मीडिया में इन दोनों की ज़िक्र ना मात्र की है।सोनिया गांधी की लोकप्रियता का प्रतिशत 57 और केजरीवाल की लोकप्रियता का प्रतिशत 39 है। जिस वक़्त सर्वे आई थी उस वक़्त की ख़बरों और डिबेट शो को आप उठाकर देखेगें तो पाएंगे कि लोकप्रियता के मसले पर ज़्यादातर मीडिया ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी तक हीं सीमित रह गई,जबकि सर्वे में सरकार की तमाम कमियां भी सामने आई है।आख़िर क्यों?सिर्फ़ इसलिए की गुजरात में चुनाव होने हैं?हमारे देश की सियासत में सर्वे को लेकर एक अजीब सी अवधारणा है।सर्वे अन्तर्राष्ट्रीय भी हो तो,विपक्षी दलों और उनके समर्थकों को लगता है कि सरकार ने मैनेज कर लिया है।प्यू सर्वे पर सब के अपने-अपने तर्क हैं।विपक्षी दलों ने सर्वे के प्रकाशित होने के समय पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।ये बात भी सही है कि विपक्ष सर्वे में लोकप्रियता के मसले पर ही उलझी रह गई,जबकि विपक्षियों के पास मौका था,सर्वे में आई तमाम कमियों से सरकार को घेरने का।बीजेपी सूत्रों का कहना है कि गुजरात विधानसभा चुनाव से ऐन पहले आई इस रिपोर्ट से ज़रूर पार्टी को फ़ायदा होगा,क्योंकि यह रिपोर्ट बीजेपी की किसी समर्थित एजेंसी या किसी भारतीय सरकारी एजेंसी ने तैयार नहीं की बल्कि यह अमेरिका की प्रतिष्ठित एजेंसी ने तैयार की है। इस एजेंसी पर सवाल नहीं उठाए जा सकते,क्योंकि इससे पहले विश्व के कई देशों में वह रिसर्च करके रिपोर्ट तैयार कर चुकी है।।विपक्ष चाहे कुछ भी कहे,लेकिन बीजेपी इस सर्वे  का पूरा फ़ायदा उठाना चाहती है।बीजेपी कैबिनेट की बैठक में इस रिपोर्ट के महत्वपूर्ण अंश मंत्रियों को बांटे गए थें, वहीं खुद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी ट्विटर पर इस रिपोर्ट को साझा करते हुए कहा था कि 'मोदी जी की लोकप्रियता धर्म,जाति,क्षेत्र और सीमा से ऊपर है।वे हिन्दुस्तान के जन-मन में हैं।प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट इसी तथ्य को प्रमाणित करती है।'अमेरिकी थिंक टैंक 'प्यू रिसर्च सेंटर' ने सर्वे में भारत के करीब 130 करोड़ लोगों में से मात्र 2,464 लोगों को शामिल किया था।गणितज्ञ होता तो यह बता देता कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रित देश भारत की कुल आबादी के कितने प्रतिशत लोगों को सर्वे में शामिल किया था।यह सर्वे 21 फ़रवरी  से 10 मार्च 2017 तक चला था।प्यू रिसर्च सेंटर का ये सर्वे पीएम मोदी के नोटबंदी के ऐलान के साढ़े तीन महीने बाद और जीएसटी लागू होने के करीब चार महीने पहले हुआ था।लोगों को नोटबंदी से होने वाले फ़ायदे या नुकसान का सही-सही अनुमान लगा पाना मुश्किल था।उस वक़्त ज़्यादातर लोग नोटबंदी को मोदी सरकार का क्रान्तिकारी क़दम मानकर उनका समर्थन कर रहे थे।बाद में लोगों को नोटबन्दी से काफ़ी दिक्कतें भी उठानी पड़ी थी।इसके अलावा सर्वे में लागू हुए जीएसटी पर छोटे कारोबारियों की राय को भी शामिल नही किया गया है। ऐसे में सवाल ये तो बनता ही है कि सर्वे को हाल में प्रकाशित करने का क्या मतलब है?आजकल सरकार के बारे में सुनने और सुनाने वाले दोनों को सकारात्मक बातें ही पसंद आ रही है।इसलिए मीडिया द्वारा जनता को सर्वे की ज़्यादातर सकारात्मक बातें ही बताई गई,ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा।सर्वे में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर काफी सकारात्मक संदेश दिया गया है।प्यू के मुताबिक,जनता की तरफ़ से मोदी का सकारात्मक आकलन करना भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर बढ़ती संतुष्टि से प्रेरित है।30 सितम्बर 2017 को इकोनॉमिक एंड पोलिटिकल विकली मैगजीन में 'बदहाल अर्थव्यवस्था' नाम से एक लेख छपी है।इस लेख के कुछ बिन्दुओं को जानना इसलिए ज़रुरी है कि सर्वे में हर दस में से आठ लोगों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पहले से बेहतर बताया है।लेख में लिखा है:--सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी 2014-15 की पहली तिमाही में 7.5 फीसदी थी।2017-18 की पहली तिमाही में यह 5.7 फीसदी पर पहुंच गई।आईआईपी 2014-15 में फ़ीसदी थी।2015-16 में 3.3 फ़ीसदी पर पहुंचने के बाद 2016-17 में यह थोड़ा सुधरकर 4.6 फीसदी पर पहुंचा।निवेश घट रहा है,घरेलू बचत की दर घट रही है।कुल बचत में घरेलू बचत की हिस्सेदारी 70 फ़ीसदी से घटकर 60 फीसदी हो गई है।-निर्यात घट रहा है।हालिया तिमाही में निर्यात 14 साल के न्यूनतम स्तर पर है।मांग घट रही है।रोज़गार के आंकड़े भी ठीक नहीं हैं।2004-05 से 2011-12 के बीच सालाना एक फ़ीसदी की दर से नए रोज़गार पैदा हो रहे थे।2012-13 के बाद इसमें कमी आ रही है।ख़ास तौर पर असंगठित क्षेत्र में निर्माण,सूचना प्रौद्योगिकी और बीपीओ लोगों को रोजगार दे रहे थे,लेकिन पिछले तीन साल से इनकी हालत ख़राब है।विनिर्माण में भी रोज़गार नहीं पैदा हो रहे।सर्वे का एक नतीज़ा कांग्रेस के लिए दिक्कत तलब हो सकता है।सर्वे में 81% लोगों का मानना है कि मोदी वास्तव में गरीबों की मदद कर रहें हैं।अगर यह बात वास्तव में सही है तो इसका मतलब है कि कांग्रेस उपाध्यझ के मोदी के ख़िलाफ़ आरोपों पर कोई गौर नही कर रहा है।राहुल गांधी मोदी सरकार पर लगातार 4-5 कारोबारीयों पर फ़ायदा पहुचाने का आरोप लगाते रहते हैं।सर्वे में कुछ बातें ऐसी भी है जो वाकई चिन्ता का विषय है,वाकई गंभीरता से सोचना चाहिए।-देश के 73%युवाओं को मानना है कि बेरोज़गारी देश के लिए एक गंभीर समस्या है।संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 और 2018 के बीच भारत में बेरोज़गारी में मामूली इजाफ़ा हो सकता है और रोज़गार सृजन में बाधा आने के संकेत हैं।-सर्वे की ऐसी बात जो सबसे ज़्यादा हैरान कर रही है वो ये है कि भारत में 53% प्रतिशत लोग मिलिट्री रुल का समर्थन करते हैं।क्या तब भी इतने ही लोग मिलिट्री रुल का समर्थन करेंगे,जब उनसे पूछा जाएगा कि आप ऐसा शासन पसन्द करेंगे कि रात को दो लोग आयें और कॉलर पकड़ कर बिना कारण बताये थाने में बन्द कर दें,जेल में डाल दे? पूरी दुनिया में सिर्फ़ 4 देश ऐसे हैं जिसके 50% से ज़्यादा लोग मिलिट्री रुल का समर्थन करते हैं।-मात्र 50% लोगों ने माना है कि मोदी सरकार साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने में कामयाब है।-हिन्दुस्तान एक लोकतांत्रिक देश है।लेकिन सर्वे में ये बात सामने आई है कि मात्र 8% लोग लोकतंत्र विश्वास रखते हैं।38 देशों के सर्वे में भारत का स्थान 37वां है।वहीं 9% लोग लोकतंत्र के ख़िलाफ़ हैं।-66 फ़ीसदी लोगों ने आईएसआईएस आतंकी संगठन को 'बड़ा ख़तरा' माना है। जबकि 76 फीसदी लोगों ने आतंकवाद को सबसे बड़ी समस्या माना है।जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर 63 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि सरकार को वहां पर सैन्य बलों का आर अधिक इस्तेमाल करना चाहिये। जबकि 62 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि वहां की वर्तमान स्थिति 'काफ़ी ख़राब' है।प्यू रिसर्च सेंटर के इकोनॉमिक एटीट्यूड्स के वैश्विक निदेशक ब्रूस स्टोक्स ने यहां अमेरिकन सेंटर में संवाददाताओं से बातचीत में कहा, ‘यह पिछले साल की तुलना में नौ फ़ीसदी ज़्यादा है।-सर्वे में बहुत सारे लोगों ने अन्तर्राष्ट्रीय मामलों परअपनी राय जाहिर नही किया है।सर्वे के एक तिहाई से भी ज़्यादा लोगों,ख़ासकर भारत के पुर्वोतर राज्यों के आधे से ज़्यादा लोगों ने विदेशों के बारे में और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नरेन्द्र मोदी भारत के मुख्य खिलाड़ी के रुप में कैसी भूमिका निभा रहें हैं,पर राय जाहिर नही किया है।-बड़ी समस्या के रुप में 74% लोगों ने भ्रष्ट नौकरशाही,72% लोगों ने अमीर-गरीब के बीच की खाई को,71% लोगों ने सामानों के बढ़ते दामों,48% लोगों ने शिक्षा की बदहाली,54-54% लोगों ने वायु प्रदुषण और ख़राब स्वास्थय व्यवस्था को माना है।


बुधवार, 15 नवंबर 2017

"#iwantcleanair" से कुछ ना हो पाएगा!

‘दिल्ली की हवा ज़हरीली हो गई है।दिल्ली गैस चेम्बर बन गया है।सांस लेने का मतलब 50 सिगरेट रोज़ पीना।’जैसी बातें आज़ से हफ़्ता दिन पहले चर्चा का विषय बना हुआ था।अख़बार,टीवी से लेकर लोगों की बीच ये बात आम हो गई थी।लोग चिन्तित नज़र आ रहे थें।कुछ लोग तो दिल्ली छोड़ दूसरे शहर में कुछ दिनों के लिए अप्रवासी बन गए,तो कुछ लोग सुरक्षा के लिए हवा शुद्दिकरण यंत्र और मास्क का इस्तेमाल करने लगे,पर कुछ लोग ऐसे भी थे जो कुछ ना कर पाए।मतलब दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्र की स्थिती,पिछले कुछ सालों की तरह फिर एक बार देश ही नही विदेशों में भी चर्चा का विषय बन गया था।इस दौर में वो सब कुछ हुआ,जो पिछले कई सालों से होता आ रहा है।हवा के ज़हरीली हो जाने पर अचानक से सारी संस्थाए बोलने लगी,कोई आदेश देने लगा,तो कोई आलोचना करने लगा।नया ये हुआ कि दिल्ली सरकार ने पड़ोसी राज्य के किसानों को सबसे ज़्यादा गुनहगार बता दिया,उसमें भी ज़्यादा  गुनहगार पंजाब के किसानों को। दिल्ली के सीएम पंजाब के सीएम से मिलने का वक़्त मांगते रहें,लेकिन अब तक अरविन्द केजरीवाल को सफ़लता नहीं मिली है।इस मौके पर मीडिया ने भी पर्यावरण के प्रति अपनी संवेदनहीनता नही दिखाई,सूचना के नाम पर दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों से ‘राष्ट्रीय समस्या’ के रुप में देशवासियों के बीच पहुंचाता रहा।अफ़सोस की बात की मीडिया के 'हिन्दू-मुसलमान' जैसे राष्ट्रीय समस्या के सामने ‘स्मॉग’ नामक इस पर्यावरणीय समस्या ने डिबेट शो में जगह नही बना पाया।
हर बार की तरह इस बार भी इस समस्या से निपटने के लिए दिल्ली सरकार ने कुछ दिनों के लिए स्कूल बंद कर देना और ऑड-इवन जैसे क़दम उठाये।दिल्ली की हवा अब थोड़ी बेहतर हो गई है,लेकिन एनजीटी और सरकार के बीच कई मुद्दों पर सहमति ना होने के कारण अब तक ऑड-इवन लागू नहीं हो पाया है।अब शायद लागू भी ना हो पाए,क्योंकि मौसम ने अपना मिज़ाज बदल लिया है।मौसम विभाग के अनुसार तापमान और हवा की गति में गिरावट एवं नमी में इजाफ़े की वज़ह से ऐसी समस्या उत्पन्न हो जाती है।पिछले कुछ सालों से इसी समय में जब ऐसी समस्या उत्पन्न होती है तो, समस्या के सभी कारणों पर बात होने लगती है।उसके बाद जब मौसम का मिज़ाज बदल बदल जाता है तो सरकार के साथ जनता भी ऐसे सामुहिक चुप्पी साध लेती है,जैसे स्मॉग नामक कोई समस्या थी ही नहीं। दिल्ली की धुंध का कारण सरकार से लेकर जनता तक को पता है।लेकिन बात यहीं अटक जाती है कि निवारक क़दम किसको उठाना चाहिए?सिर्फ़ सरकार को, सिर्फ़ जनता को या फ़िर दोनों को।आईआईटी कानपुर के अनुसार मलबा-धूल पीएम 2.5 और पीएम -10 प्रदुषण के बड़े वाहक है। दिल्ली में हर दिन 4000 टन धूल-मलबा पैदा होता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में कुल 89 लाख से अधिक पंजीकृत वाहन है। जबकि रात दस बजे के बाद एक लाख से अधिक ट्रक राजधानी में प्रवेश करते हैं।गति कम होने से ज़्यादा धुंआ निकलने से प्रदुषण फ़ैल जाता है।ताज़ा जानकारी के मुताबिक केजरीवाल सरकार ने 'सूचना का अधिकार' के तहत संजीव जैन के सवालों का जवाब देते हुए बताया कि सरकार को ग्रीन टैक्स के नाम पर साल 2015 में 50 करोड़, साल 2016 में 387 करोड़ और जनवरी 2017 से 30 सितंबर 2017 तक 787 करोड़ रूपये प्राप्त हुए हैं।आरटीआई के मुताबिक इन तीन सालों में  प्राप्त धनराशि में से सिर्फ़ 2016 में प्रदूषण को रोकने के लिए मात्र 93 लाख ही ख़र्च किये।मतलब साफ़ है कि केजरीवाल सरकार ने साल 2015 और 2017 में प्रदुषण को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाये।अब दिल्ली की इस बदहाली के लिए केजरीवाल सरकार को दोषी क्यों ना माना जाए? आखिर वो किस आधार पर किसानों को इस समस्या के लिए खलनायक बता रहें हैं?
दिल्ली की हवा जब ज़हरीली हो गई थी,तो दिल्ली के नेटिजन ट्वीटर पर स्वच्छ हवा की बात कर रहें थें।उस वक़्त ट्विटर पर #iwantcleanair ट्रेन्ड कर रहा था। मैंने भी लिखा था "#iwantcleanair लेकिन कैसे? सिर्फ़ सरकार को कोसने से?या फ़िर शुद्ध हवा पाने के लिए ख़ुद भी कुछ करेंगे।"इस ट्रेन्ड के बहुत सारे ट्वीट को मैंने पढ़ा।पढ़ के बड़ा ही अफ़सोस हुआ कि आख़िर आधुनिकता के दौर में दिल्ली वाले ख़ुद को भी इस समस्या के लिए ज़िम्मेदार क्यों नहीं मान रहें हैैं? दिल्ली में 89 लाख़ से अधिक पंजीकृत वाहन किसके हैं?हर दिन 4000 धूल-मलबा कैसे पैदा होता है? खैर,इस समस्या का समाधान कितना हो पाएगा ये आने वाला वक़्त बताएगा। लेकिन लैंसेट के मुताबिक भारत में हर साल प्रदुषण के कारण 25 लाख लोगों की मौत होती है।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...