बुधवार, 24 मई 2017

हमले की निन्दा महज औपचारिकता सी लगती है!

कल सुबह जैसे ही दफ़्तर पहुंचा, चैनल में लगे बड़े-बड़े टीवी स्क्रीनों पर,मैनचेस्टर एरीना में हुए आत्मघाती हमले में बेतहाशा इधर-उधर भागते छोटे-2 बच्चे,बड़े-बुजुर्गों की तस्वीरें और आपातकालीन वाहनों की शायरन ने मुझे सकते में डाल दिया।मन ही मन हमले में ज़्यादा क्षति ना हुई हो,को सोचते हुए आगे बढ़ा।बीतते समय के साथ हमले से जुड़ी जानकारियां सामने आने लगी।
टीवी रिपोर्ट के मुताबिक मैनचेस्टर एरीना में एक कनसर्ट में अमेरिकी पॉप सिंगर और धारावाहिक की कलाकार एरीयाना ग्रांडे के कार्यक्रम में हुए 2 आत्मघाती हमले में करीब 22 लोग मारे गये और 59 लोग ज़ख्मी हुए।
हमले को ब्रिटिश पीएम थेरेसा मे ने कायरना हरकत बताते हुए कहा कि गम्भीर ख़तरा बना हुआ है और आतंकवादी हमले की सम्भावना बनी हुई है।
हमले को लेकर हमारे देश के भी पीएम नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट कर 'निन्दा और सम्वेदना' वाली रश्म अदा की।वैसे पीएम के इस ट्वीट के बाद,कई लोगों ने पीएम से झारखंड में कथित बच्चा चोरों को पुलिस के सामने पीट-पीटकर मार देने पर सवाल पूछा।
जब से होश सम्भाला हूं,एक ही बात सुनता आ रहा हूं कि आतंकवाद की समस्या से कई देश जूझ रहें हैं।इस समस्या से निपटने के लिए विश्व के शक्तिशाली देशों को एक साथ आने में क्या समस्या है?जिस तरीक़े से अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर एकजुटता की बात करते हैं,वैसे ही आतंकवादीयों को संरक्षण देने वाले देशों को सबक सिखाने में क्यों नही जुट जाते हैं?अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर 'आतंकवाद से निपटने के लिए एक साथ आना होगा' वाली बात औपचारिकता भर रह जाती है और जब भी कही हमला होता है सब ट्वीट के माध्यम से ज़िम्मेदारी निभा देते है।
बीते 21 मई को रियाद में दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पहले विदेश यात्रा में,पाकिस्तान समेत 40 मुस्लिम देशों के प्रमुख के सामने कहा कि अपनी ज़मीन पर आतंकवाद को बढ़ावा ना दें।हम चाहते हैं कि मुस्लमान भी आपस मिलकर रहें।ट्रम्प का ये बयान उनकी छवि के उलट शान्ति का पैगाम माना चाहिए।

शुक्रवार, 5 मई 2017

भारतीय पत्रकारिता की रैंकिंग अच्छी नही है!

जहां भी स्वेच्छाधारी ताकतवर मॉडल की जीत हुई है,वहां मीडिया की आज़ादी घटी है।ऐसी जगहों पर पब्लिक रेडियो और टीवी स्टेशन प्रोपेगेण्डा के औज़ार बने।
यह कथन रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर संस्थान के महासचिव क्रिसटोफ़र डिलॉयर की है।इस संस्थान के एक रिपोर्ट ने हर साल की भांति इस साल भी विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर भारत समेत दुनिया के कई देशों में पत्रकारिता की गिरती साख के बारे में बताया है।रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर180 देशों की अन्तर्राष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन है,जो सूचना और पत्रकारिता के आज़ादी की वकालत करता है और प्रोत्साहित भी करता है।इसकी स्थापना रॉबर्ड मेनार्ड ने 1985 में की।इसका मुख्यालय पेरिस में है।
1993 से हर साल 3 मई को UNESCO द्वारा विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर अलग देशों में कार्यक्रम आयोजित किया जाता है,जिसमें मीडिया की अच्छाई और बुराइयों पर मंथन होता है।इस बार 1-4 मई को इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित किया गया था।इस बार का थीम- “critical minds for critical times:media’s role in advancing peaceful,just and inclusive societies.”था।भारत में अभी तक एक बार भी आयोजित नही किया गया है।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर ने शीर्षक मोदी के राष्ट्रवाद से ख़तरा नाम से एक रिपोर्ट ज़ारी कर कहा हैभारत में प्रेस की स्वतंत्रता को मोदी के राष्ट्रवाद से ख़तरा है और मीडिया डर की वज़ह से ख़बरे नही छाप रही है।भारतीय मीडिया में सेल्फ़ सेंसरशिप बढ़ रही है और पत्रकार कट्टर राष्ट्रवादियों द्वारा चलाये जा रहे अभियानों का शिकार बन रहें हैं।यहां ना उन्हे केवल गालियों का सामना करना पड़ता है,बल्कि शारीरिक हिंसा की धमकियां भी मिलती रहती है।कई बार सरकार के प्रति ज़्यादा आलोचनात्मक रवैया रखने वाले पत्रकारों को चुप कराने के लिए आईपीसी की धारा 124ए का भी इस्तेमाल किया जाता है,जिसके तहत राजद्रोह के लिए उम्रकैद की सज़ा तक दी जाती है।हालांकि अब तक किसी भी पत्रकार को राजद्रोह का दोषी नही ठहराया नही गया है,पर इससे सेल्फ़ सेंसरशिप को तो बढ़ावा मिल रहा है।वहीं सरकार ने विदेश से मिलने वाली फ़ंडिग के नियम कड़े किए हैं,ताकि वैश्विक स्तर पर भारतीय मीडिया को कम से कम प्रभावित किया जा सके।कश्मीर जैसे क्षेत्र जिन्हे प्रशासन संवेदनशील समझता है,वहां की कवरेज करना आज भी मुश्किल है।यहां पत्रकारों की सुरक्षा का कोई इन्तज़ाम नही है।जुलाई 2016 में कश्मीर में शुरु हुए विरोध प्रदर्शन के पहले दिन ही सेना द्वारा यहां इंटरनेट सेवा बन्द कर दी गई।यहां अक्सर इंटरनेट पर लगाम लगाया जाता है ताकि प्रर्दशनकारी आपस में बातचीत ना कर सके।ऐसा इसलिए भी किया जाता है ताकि मीडिया,स्थानीय पत्रकारों और सिटीजन जर्नलिस्ट आदि को रिपोर्ट से रोका जा सके।,स्थानीय मीडिया संस्थानों के लिए काम कर रहे पत्रकार अक्सर सैनिकों के शिकार बनते हैं,जिसके लिए उन्हें केन्द्र सरकार की मौन सहमति मिली रहती है। रिपोर्ट के इन सब बातों से आप कितने सहमत-असहमत हैं आप पर छोड़ते हुए आगे बढ़ता हूं। इस बार प्रेस की स्वतंत्रता और निर्भिक पत्रकारिता के हिसाब से 180 देशों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का स्थान 136वां है तो वहीं सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका का स्थान 43 वां।प्रथम.द्वतिय और तृतीय स्थान पर क्रमश: नॉर्वे,स्वीडन और फिनलैण्ड है।जहां ना तो मोदी है और ना ही ट्रम्प। पिछले साल के मुकाबले भारत की रैंकिग में 3 पायदान की गिरावट आई है।नरेन्द्र मोदी जब मई 2014 में प्रधानमंत्री बने तो भारत 140वें नम्बर था।उसके बाद 2015 में 136 और 2016 में 133वें नम्बर पर था।2010 में भारत इस सूची में 122वें नम्बर था और तब यूपीए सरकार सत्ता में थी।इसके बाद भारत 2014 तक 140वें नम्बर पर रहा।
16 नवम्बर 2016 को राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस के 50वें सालगिरह पर दिल्ली के विज्ञान भवन में पीएम मोदी ने पत्रकारिता की गिरती साख और चुनौतियों पर अपनी विचार को रखते हुए,पत्रकारिता जगत को एक समाज बताया और कहा कि पत्रकारिता की खामियों को दूर करने के लिए इस परिवार के मुखियाओं को एक साथ बैठ कर विचार करना चाहिए।प्रधानमंत्री की ये बात 100% दुरुस्त लगी।लेकिन आजकल के सनसनी पत्रकारिता और TRP के खेल में ऐसा सम्भव हो पाएगा?ये भी एक बड़ा सवाल है। आगे उन्होंने महात्मा गांधी के कथन अनियंत्रित लेखनी बहुत संकट पैदा कर सकती है,लेकिन लेखनी पर बाहर का नियंत्रण तो तबाह कर देगा का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकारों को तो पत्रकारिता में ज़रा भी हस्तक्षेप नही करना चाहिए।ग़लतियों के आधार मीडिया का मूल्यांकन करना उचित नही होगा।पीएम मोदी की ये बात भी सही है।लेकिन सवाल ये है कि पत्रकारिता को लेकर इतना नेक इरादा रखने के बाद भी भारतीय पत्रकारिता की स्थिती इतनी ख़राब क्यों हैं?बहरहाल 3 मई को यानि विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के दिन पीएम मोदी ने ट्वीट किया हम स्वतंत्र और बहुमुखी पत्रकारिता का दृढ़ समर्थन करते हैं।यह लोकतंत्र के लिए ज़रुरी है। सोशल मीडिया के दौर में त्योहारों,जन्मदिन और गाहे-बगाहे ट्वीट करने वाले,केन्द्र से लेकर राज्य के मंत्रियों की ख़ामोशी बता रही है कि ये प्रेस की स्वतंत्रता का कितना समर्थन करते है।ख़ैर पीएम का ही एकमात्र ट्वीट उन पत्रकारों को हमेशा ऊर्जा देती रहेगी,जो सोशल मीडिया पर सत्ताधारी पक्ष के गुण्डों का सामना करते हुए लोगों के हित में सरकार से सवाल करते हैं।ये बात किसी से छिपी नही है कि ये गाली-दस्ता राष्ट्रवाद के नाम पर प्रश्नवाद को बेकार बताते हैं।सरकार से सवाल पुछने वाले पत्रकारों को सोशल मीडिया पर तरह-तरह की गालियां देते हैं।इन गाली-दस्तों को ख़ुद से सवाल पूछना चाहिए कि वो पत्रकारों के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करके क्या हासिल कर पाते हैं?ये बात सही है कि पेशेवेर दौर में पत्रकारिता में बहुत सारी खामिया हैं,लेकिन क्या उसका इलाज़ गाली है?पत्रकार को लोकतंत्र का प्रहरी माना जाता है।सरकार और उनके समर्थकों को ये समझना पड़ेगा कि जो पत्रकार सरकार की ख़ामियों को उज़ागर करता है,इसका मतलब ये नही होता है कि वह सरकार विरोधी होता है बल्किवो तो सरकार कमियों को उज़ागर करके उसे और मज़बूत बनने का मौका देता है।मीडिया और सरकार दोनो की ज़िम्मेदारी होती है कि मिलकर काम करते हुए,देश को विकास के पथ पर अग्रसर करे। ऐसे में क्या आपने कभी ख़ुद से सवाल पूछा है कि अगर आप ऐसे ही पत्रकारों को गाली देंगे तो पत्रकारिता की आनेवाली पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

अन्त में, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस इसलिए भी ज़्यादा महत्वपुर्ण है कि इस दिन सरकारों को मीडिया की स्वतंत्रता को याद दिलाता है और साथ उन पत्रकारों की शहादत को याद किया जाता है जो अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए जान गंवा दिए हैं।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...