मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

बेचैन मन और सवाल!


दिल्ली के सीमान्त इलाके में रहता हूं।रोज़गारी ज़िन्दगी होने के कारण दिल्ली में किसी दिन सूर्योदय तो किसी दिन चन्द्रोदय का दर्शन हो पाता है।रोज़ दफ़्तर आने-जाने के क्रम में जिस रास्ते से गुजरता हूं,कई तस्वीरें ऐसी होती है,जो मन को विचलित कर देती है।मन में कई सवालों को पैदा कर देती है।कुछ ऐसी ही बात,इस बात को ध्यान में रखते हुए कि जो बात आपके साथ साझा कर रहा हूं,वो कोई नई बात नही है।या फ़िर ऐसा भी नही है कि इससे पहले उस बात के बारे में बात ही नही हुई है।लेकिन फ़िर भी आपके साथ सिर्फ़ अपने सवालों से भरे मन की बेचैनी को लिखते हुए शान्त करने के लिए साझा कर रहा हूं।हम जानते ही हैं कि बदलते वक्त के साथ ही हम इंसानों की सारी आवश्यकताओं का राजनीतिकरण हो गया है।हमारी सारी आवश्यकताएं जैसे रोटी,कपड़ा और मकान के साथ ही वस्त्र,शिक्षा,स्वास्थय,रोज़गार वगैर-वगैर को हमारे नेता जाति और धर्म के चश्में से देखने लगे हैं।सबसे बेहतरीन उदारहण है यूपी चुनाव में पीएम मोदी का बिज़ली वाले बयान पर मची हाय-तौबा।मैं सबसे बेहतरीन उदारहण इसलिए कहा है कि सत्ता के शिखर पुरुष भी ऐसी राजनीति से अछुते नही है।हमारे राजनीतिज्ञों के इस खेल में मीडिया भी अपनी भूमिका बखूबी निभाता है।पीएम से लेकर सीएम और नेताओं के बयानों को मीडिया अपने राजनीतिक निष्ठा के अनुसार पेश कर,जनता को भी इस खेल में शामिल करवा देती है।जनता भी अपनी आवश्यकताओं को भुलकर इस खेल में खुशी-खुशी शामिल हो जाती है।वो ये बात भुल जाती है कि हमारे लिए क्या ज़रुरी है-हमारी आवश्यकताएं या फ़िर जाति और धर्म।ख़ैर ये बात तो सक्रिय तबके की हुई,लेकिन भारत में एक तबका ऐसा भी जिसको हमारी सरकारों के द्वारा लगातार अनदेखी के किए जाने के कारण,उसको देश-दुनिया से कोई मतलब नही है।उसको इस बात से भी कोई मतलब नही कि हमारी सरकारें हमारी विकास के लिए क्या कर रही है।जैसे-तैसे कटनें वाली अपनी ज़िन्दगी की धुन में मस्त है। जैसे-तैसे कहने का मतलब है कि ना ही उनके पास शुद्ध से भोजन,ना ही तन ढ़कने के लिए पुरा कपड़ा।उम्मीद है कि आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस तबके के बारे में बात कर रहा हूं। नोएडा में सड़क किनारे रह रहे परिवार के एक बुजुर्ग व्यक्ति से मैंने बात की,उनकी निराशाभरी बातों ने मुझे भी निराश कर दिया।उनकी बातों से ऐसा लगा कि कम से कम जो बुनियादी सुविधाएं होती है,वो प्राप्त करने की चाहत रखते हैं।बातचीत के दरमयान उन्होंने बताया कि हमलोगों को सरकारी सुविधाएं मिलना तो दूर,एक बार कोई सरकारी आदमी पुछने तक नही आता है।हमलोग अपनी ज़िन्दगी को लोगों से मांग कर बिता रहें है आज यहां से तो कल वहां से।मैं खुद कई बार देखता हूं कि रेड लाइट पर उनके छोटे-छोटे बच्चे भी लोगों से मांग रहे होते हैं। आगे कहते हैं  कि हम भी चाहते हैं कि हमारा भी एक मकान हो,हम तो नही पढ़ पाये लेकिन हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़े, लेकिन हमारी कोई नही सुनता है।

मैं बातचीत कर पैदल ही अपने घर के तरफ़ बढ़ चला।रास्ते में मेरे दिमाग में उनकी बिखरी बरतनों पर भिनकती मक्खियां,खुले आसमान में ज़मीन पर लेटे और खेलते हुए उनके छोटे-छोटे निर्वस्त्र बच्चें,बारिश के कारण भिंगे उनके फ़टे विछावन और पोशाक की तस्वीरें घुम रही थी।सोच रहा था कि आख़िर ये लोग अपनी ज़िन्दगी का गुज़ारा कैसे करते होंगे?अशुद्ध भोजन के कारण इनकी पुर्ण शारीरिक और मानसिक विकास होती होगी?यदि बदकिस्मती से इनका सामना बिमारीयों से होता होगा तो क्या करते होगें?यदि इनके बच्चे पढ़ेंगे नही तो इनकी ज़िन्दगी में बदलाव कैसे आएगा?इन बच्चों और अभिभावकों को शिक्षा और स्वच्छता की महत्ता कैसे समझ आएगा? सरकारों द्वारा शिक्षा,स्वास्थय,रोज़गार और स्वच्छता को लेकर चलाई जा रही तमाम जागरुकता अभियानें और योजनाओं से इनकी ज़िन्दगीयों में बदलाव क्यों नही हो पा रहा है?आज़ादी के बाद से देश और राज्यों में तमाम सरकारें आईं और गई,देश ने साल 2014 में भी राष्ट्रीय सत्ता में भी विकास के नाम पर परिवर्तन किए,मगर इनलोगों की ज़िन्दगी में कोई बदलाव क्यों नही हो रहा है?किसी भी सरकार की योजनाएं तभी सफ़ल मानी जाती है,जब देश के अन्तिम व्यक्ति तक उसका लाभ पहुंचे। आख़िर कब और कैसे होगा इनका विकास?चुनाव के वक्त हेलीकॉप्टर से आये,भाषण दिए और उड़ गये,से विकास होगा? सिर्फ़ योजनाएं लाने से लागू करने से विकास होगा?मेरा ऐसा मानना है कि सरकारों को इन समस्याओं से सम्बंधित अपने नौकरशाहों से लेकर कर्मचारीयों तक को भौतिक सुविधाओं से निकालकर ऐसे लोगों के बीच भेजना होगा,नौकरशाहों को समझाना होगा कि आपका कर्तव्य सिर्फ़ दफ़्तर में बैठकर भौतिक सुविधाओं का लाभ उठाते हुए काग़जी काम करना नही है,बल्कि ज़मीन पर जाकर वास्तविकता का भी सामना करना है। जब वो वास्तविकता का सामना करेंगे तो सरकारों को बताएंगें फलां-फलां जगह पर कमी है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो सरकार गठन के बाद अपने सांसदों से अपील की थी कि वो दिल्ली में ज़्यादा वक्त बिताने के बजाय अपने संसदीय क्षेत्र में बितायें।उस अपील का क्या हुआ?आखिर सांसद अपने संसदीय क्षेत्र में जाने से क्यों कतराते हैं?सभी जन प्रतिनिधियों को सोचना चाहिए कि जनता ने उनको सिर्फ़ अपनी सेवा के लिए चुना है।

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

राजनीति के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल ही आज के राजनीति की तस्वीर है!


नेताओं को अपनी आवाज़ धीमी रखनी चाहिए और एक-दूसरे को अपमानित करने से बचना चाहिए।
ये वाक्य रोमन कैथोलिक चर्च के वर्तमान और 266वें पोप फ़्रांसिस का है।उन्होंने ये बात भारतीय चुनावी मौसम में चल रही जुबानी जंग के बीच भारत से सुदूर,इटली की राजधानी रोम में कही है।बीते शुक्रवार को रोम स्थित University Roma Tre में आयोजित कार्यक्रम में अपने 45 मिनट के भाषण में दुनियाभर में राजनीति में गिरती भाषाई स्तरता पर बात की।उन्होंने उदाहरण सहित राजनीतिज्ञों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे अमर्यादित शब्दों और भाषाओं पर दुख जताते हुए कारण भी बताया।उन्होंने नेताओं से भाषणों में शालीनता और सहनशीलता बरतने की अपील भी की।मैं उनके 45 मिनट के भाषण को ना ही पूरा सुन सका और ना ही पढ़ सका।लेकिन जितना पढ़ और सुन पाया,उसमें से कहीं शाब्दिक तो कही भावनात्मक हिन्दी अनुवाद पेश कर रहा हूं।अनुवाद पेश करने से पहले आप पाठकों से गुजारिश करुंगा कि आप पोप की बातों को किसी एक दल और नेता के सन्दर्भ में देखने की ग़लती ना करें,क्योंकि पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक के ज़्यादातर नेताओं में अब ये दुर्गुण पाया जा रहा है।जिसको आप भी अनुभव करते ही होंगे।अब अनुवाद पेश कर रहा हूं-
नेताओं को अपने विरोधियों को ध्यान में रखते हुए अपनी बात शुरु करनी चाहिए और बेवज़ह की जुबानी जंग की बीज बोआई से बचना चाहिए।नेताओं को अपनी आवाज़ धीमी रखनी चाहिए,साथ ही कम बोलना और ज़्यादा सुनना चाहिए।
हम रोज अख़बारों में पढ़ते ही हैं कि किस तरह से एक दल के नेता दूसरे दल के नेता को अपमानित करते रहते हैं।टीवी डिबेट में एक को अपनी बात पूरी करने से पहले ही दूसरा उसको बाधित करते रहता है।
यदि हम एक-दूसरे के सामने खुलकर अपनी बात रखेंगे,किसी मुद्दे पर आपस में बातचीत करेंगे और एक-दूसरे का सम्मान करेंगे तो ये जुबानी जंग कैसे होगा?
उन्होंने अपने भाषण के केन्द्र में राजनीति को रखते हुए,दुनियाभर के समाज में गिरती राजनीतिक स्तरता पर दुख जताया।आगे उन्होंने कहा कि अमर्यादित भाषणों से हम सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने वाली भावनाओं को भी खोते जा रहें हैं।
मैंने पोप फ़्रांसिस की बात इसलिए आपलोगों के सामने रखी है,क्योंकि ये बात भारत,भारत के राजनीतिज्ञों और उनके बदजुबानी से समाज में पड़ रहे बुरे असर के बारे में भी कही गई है।अब आप पोप की बातों को अपनी-अपनी भाषाओं में रुपान्तरित करके,सोशल मीडिया पर लिखने के साथ-साथ सम्भव हो सके तो अपने गली-मोहल्लों की दीवारों और चौपालों पर चिपका दीजिए ताकि पंचायत स्तरीय नेताओं के साथ-साथ राजनीति में पदार्पण कर रहे युवा नेता भी सीख लें।साथ ही कहीं आपके विधायक और सांसद की नज़र पर गई तो,उनमें भी कही बदलाव आ सकता है।

अच्छा होता कि हाल ही में जिस तरह से भारतीय मीडिया में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और हिलेरी क्लींटन की चुनावी जुबानी जंग को तरजीह दी जा रही थी,वैसे ही पोप की बातों को एक दिन ही सही मगर तरजीह दी जाती तो सम्भवत: नेताओं में बदलाव आने के साथ-साथ आप दर्शकों और पाठकों में भी बदलाव आने की उम्मीद की जा सकती थी।क्योंकि इन दिनों भारत में भी नेताओं से ज़्यादा आम जनता को इस बात को जानने में दिलचस्पी रहती है कि आज किस दल के नेता ने किस दल के नेता को जुबानी जंग में मात दी है।कई बार तो पार्टी के समर्थक ही आपस में भीड़ जाते हैं,जो कि लोकतंत्र के लिए ठीक नही है।एक नागरिक होने के नाते आपको किसी दल या नेता का फैन होने की बजाय,आपको अपने जन प्रतिनिधियों से शिक्षा से लेकर रोज़गार,भोजन से लेकर आवास और तमाम बुनियादी सुविधाओं की मांग करनी चाहिए,क्योंकि उनका निर्माण आपकी सेवा करने के लिए ही हुआ है,ना कि बदजुबानी की बदौलत समाज में मतभेद पैदा करने के लिए।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...