मेरी सांसों में बसा
इस हवा का नशा...।
मेरा दिल.......मेरा
पता.......मेरी शान...।
दिल्ली है मेरी
जान..।
यह गाना दिल्ली का
थीम सॉन्ग है।वाकई दिल्ली हमारी शान है और दिल्ली पर अपनी जान लुटा रहें हैं। दिल्ली
की ऊंची-ऊंची इमारतें,मेट्रो,सड़कों पर तेज़ रफ्तार से दौड़ती गाड़ियां और तमाम
तकनीकों से लैस इस महानगर के विकसित होने का परिचायक है।लेकिन मैं इसी महानगर के
उस तस्वीर की बात कर रहा हूं, जो आज़ादी के बाद से लेकर आज तक उदासीन ही है।मेरा
सामना रोज़ इन तस्वीरों से आते-जाते होता है।
इन तस्वीरों को देखने के बाद मन में
कई सवाल हैं,कई राय भी हैं और नतीज़े भी हैं,लेकिन मैं जानता चाहता हूं कि इस
महानगर के भीतर ये लोग कैसे विकास से वंचित रह जा रहें है? उन तमाम सरकारी नियम और वादों का क्या
हुआ,जिसमें ऐसे लोगों के विकास की बात कही गई है?वो तमाम
गैर-सरकारी संस्थान क्या कर रही है,जो दिन-रात गरीबों की विकास की बात करती है।मैं
बात कर रहा हूं उन लोगों की जो खुले आसमान में बारहों मास इस महानगर के रोड किनारे
अपने जीवन का गुज़ारा करते हैं। आप कल्पना कीजिए वो जीवन कैसा होगा,जिसको ना तो
ठीक से पेट भरने के लिए भोजन है,ना पीने के लिए पानी और ना तन ढ़कने के लिए
कपड़ा,आवास की तो बात ही मत कीजिए। रोज आने-जाने के क्रम में इन लोगों के खाने की
चीज़ों पर नज़र पड़ जाती है।कई बार इनके बच्चों को देखता हूं कि बिना सब्ज़ी के
रोटी,वो भी मिट्टी लगी हुई खाये जा रहें हैं।एक बार देखा कि उबले हुए मुर्गे की
खाल,वो पंख सहित थी,जिसका पंख हटा कर खाने की तैयारी कर रहे थें।सोचिए ये नज़ारा
कितना हृदय विदारक है ना।बच्चे इस बात से अंजान तो हैं ही,उनके परिजन भी इस बात से
अंजान हैं कि स्वच्छता कितनी ज़रुरी है।क्या ऐसे लोगों को स्वच्छता का महत्व बताये
बिना स्वच्छ भारत की निर्माण संभव है?कौन बतायेगा इनको
स्वच्छता के बारे में? जब भी मैं इनके करीब से गुज़रता हूं,तो सोंचता
हूं कि आज़ादी से लेकर आज तक ये बात सिर्फ कहने जैसी ही क्यों लगती है कि ‘सरकार सबके भले के लिए काम करेगी’। यदि सभी सरकारें सबके भले के लिए काम कर रही
होती तो भारत की कुल आबादी का 22% हिस्सा कैसे वैश्विक
गरीबी रेखा से नीचे है? आज़ादी से लेकर आज तक भारत के हुक्मरानों की वो
चुनौतियां क्यों और कैसे बरकरार है जिसमें देश के नागरिकों का आर्थिक विकास और
गरीबी के ख़ात्मे के लिए कारगर नीतियों को तैयार करने की थी?सुरेश तेन्दुलकर और रंगराजन समिति की रिपोर्ट का
क्या हुआ?सी रंगराजन समिति ने तो जुलाई 2014 के प्रथम
सप्ताह में योजना आयोग (नीति आयोग) को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी।इस रिपोर्ट पर
क्यों बात नही हो रही है?ज़ाहिर है सरकार गरीबी और गरीबों को लेकर चिंतित
नही है। जब साल 2014 में देश में सत्ता परिवर्तन हुआ,तब से लेकर आज तक ‘सबका साथ-सबका विकास’ की बात कही जा रही है।कैसा विकास हो रहा है कि
देश की राजधानी में ही बदतर स्थिति में लोग रह रहें हैं।अब सवाल है कि जो कि सबसे
महत्वपुर्ण है कि ‘सबका विकास’ कैसे होगा?सिर्फ दफ़्तर में कर्मचारियों के लेखा-जोखा से,मंत्रियों
के भाषण देने से या नेता और संबंधित विभाग की कर्मचारियों के ग्राउंड ज़ीरो पर
जाकर लोगों से बात करके?क्या आपने कभी देखा है कि उपरोक्त दोनों में से
किसी को जाकर मिलते हुए? खैर देश का यह तबका भी अपने विकास की राह तो देख
ही सकता है।साथ में,हम और आप भी वर्तमान और आगे चुने जाने वाली सरकारों से यही
उम्मीद करेंगे की,वो ‘
poverty in india is a historical reality and important issue’ को कहीं भी अंकित ना होने दे।


