रविवार
की आधी रात दफ़्तर से कई सवालों के साथ घर लौटा।सारे सवाल रविवार की तड़के करीब
3.50 बजे कानपुर से 100 किलोमीटर दूर पुखरायां गांव में हुए ट्रेन हादसे से
संबंधित है।इंदौर-पटना एक्सप्रेस के दुर्घटनागस्त होने से जुड़ी हर ख़बरें,समय-समय
पर अलग-अलग माध्यमों से आ रही थी।जैसे-जैसे दिन बीत रहा था,तस्वीरें भयावह होती जा
रही थी। बिखरे सामान,छोटे-छोटे बच्चों के रोने की आवाज़,किसी के अपने माता-पिता
को,किसी के अपने भाई-बहन,तो किसी के अपने बच्चों से बिछड़ने की बो बातें और रोने
की आवाज मुझे लगातार परेशान कर रही थी। सुबह में 70 मौतों के साथ शुरु हुई ख़बर, देर
रात तक करीब 130 तक पहुंच गई।इस हादसे में करीब 200 लोग भी ज़ख्मी हुए।यह अनुमानित
आंकड़ा है,वास्तविक नही।
यह ख़बर
सामने आते ही लगभग नेताओं और जनता के सोशल मीडिया सक्रिय हो गये।‘मारे गये व्यक्ति के परिवार
वालों के प्रति संवेदना,मृतक के आत्मा को भगवान शान्ति दें,दोषियों पर कड़ी से
कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।‘ जैसे तमाम सन्देशों के साथ-साथ रेलवे
और भारत सरकार को विपक्षियों और आम जनता के आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा।सबसे
हैरानी कि बात है कि आलोचक नेताओं की जमात में से एक भी नेता घटनास्थल पर नही
पहुंचे।आखिर क्यों? क्या उनलोगों की जिम्मेदारी ट्वीटर और
लम्बे चौड़े भाषणों तक ही है?हमेशा की तरह ही इस दुर्घटना के
बहाने कई लोगों ने केन्द्र सरकार के बुलेट ट्रेन वाली परियोजना पर भी हमला बोल
दिया। वैसे मुझे आजतक समझ नही आया कि बुलेट ट्रेन विरोधी लोग भारतीय रेलवे के साथ
जोड़कर क्यों देखते हैं?
माकपा के
पोलित ब्युरो ने कहा कि ‘बुलेट ट्रेन’ की अधिक चिंता करने वाले प्रधानमंत्री और रेल मंत्री इस घटना की
जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं।वहीं गरीबों की स्व-घोषित हितैषी मायावती
ने यहां तक कह दिया कि जब देशभर की गरीब जनता दुखी है,वहीं नरेन्द्र मोदी सबसे खुश
है।आगे उन्होंने कहा कि बुलेट ट्रेन परियोजना में पैसा निवेश करने के बजाय रेलवे
ट्रैकों के दुरुस्त बनाए रखने में पैसा खर्च किए होते तो शायद ये हादसा ना
होता।आमतौर पर जब भी कोई रेल दुर्घटनाग्रस्त होती है,तो रेलमंत्री को ही दोषी
ठहराया जाता है।लेकिन मेरे जानने में ममता बैनर्जी ही अकेले ऐसी नेता
हैं,जिन्होंने रेलमंत्री सुरेश प्रभु को दोषी नही ठहराया है और दुर्घटना के लिए
नरेन्द्र मोदी की विचारधाराओं और नीतियों को जिम्मेदार ठहराया।
इस
दुर्घटना में वही सब कुछ हुआ जो पहले से होता चला आ रहा है। घटनास्थल पर रेलवे बचाव
दल के सदस्य और राष्ट्रीय आपदा मोचन
बल के सदस्य दिन-रात एक करके बचाव कार्य को पूरा किया। जल्द ही रेल राज्यमंत्री और
संबंधित अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गये थें। केन्द्रीय रेलमंत्री शाम तक
दुर्घटनास्थल और अस्पताल में जाकर पीड़ितों के हाल का जायजा लिया।रेलवे,मध्य
प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकार ने मुआवजा देने की घोषणा की।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
ने आगरा की रैली में स्वागत के वक्त ‘फूलों के माला’ से स्वागत वाले रश्म के लिए मना कर दिया।पीड़ितों के प्रति संवेदना
व्यक्त की और उच्च स्तरीय जांच जांच करवानें की बात कही।इस पुरी प्रक्रिया में कुछ
भी नया नही था।सवाल यह है कि आखिर इस चली आ रही परम्परा से कब तक और कैसे निजात
मिलेगा?
रेलमंत्री के 2016-17 बजट भाषण में ‘ दुर्घटना रहित भारतीय रेल ‘ विजन पर कहां तक अमल हुआ? साल 2014 में नई सरकार के सत्ता में आने
से लेकर अब तक,सबसे ज्यादा रेलवे के समृद्ध होने की बात कही जा रही है।सोशल मीडिया
से लेकर तमाम रिपोर्ट रेलवे के समृद्ध होनी की बात कह रही है।हम समय-समय पर सुनते
रहते हैं कि सफ़र के दौरान किसी भी तरह की परेशानी से जूझ रहे यात्री,अगर ट्वीट कर
देता है तो रेलवे उसको सहायता पहुंचाती है।यह एक नया तरीका है समृद्धों के लिए हो
सकता है,लेकिन उनका क्या जो ट्वीटर पर नही है।
यह हादसा
इतना भयावह था कि इसकी गिनती रेलवे के बड़े हादसों में होनी लगी। रविवार को बीबीसी
ने 6 जून 1981 से लेकर 20 मार्च 2015 तक की बड़े रेल हादसों की एक रिपोर्ट छापी।
जिसको मैने फेसबुक पर किया है,चाहे तो पढ़ सकते हैं।भारत में रेल हादसों का इतिहास
कोई नया नही है।भारतीय रेल अपने उद्भव काल से ही समय-समय पर अलग-अलग कमियों के
कारण हादसे का शिकार होती रही है। 6 जून 1981 को बिहार में तूफान के कारण एक ट्रेन
नदी में जा गिरी,जिसमें 800 लोगों की मौत हुई और 1000 से ज्यादा लोग घायल हो गये।अगर
रविवार को हुए हादसे के कारण के बारे में हम बात करें तो रेलवे ने सोमवार को 16.30
बजे तक वास्तविक कारण का पता नही लगा पाई है।आखिर क्यों? दोषियों को कड़ी सज़ा की
मांग करने वालों से मेरा एक सवाल है कि सजा देकर आखिर आप क्या हासिल करना चाहते है?इतने सारे हादसे हुए,जिसमें दोषियों को सजा मिली।उससे क्या हासिल हो गया?दुर्घटनाएं कम हो गई?
आज ही रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य रह चुके
आदित्य प्रकाश मिश्रा ने बीबीसी को बताया कि भारतीय रेल के बुनियादी ढांचे को ठीक
करने की ज़रूरत है। साथ ट्रेन के पटरी से उतरने की वजहों और इससे जुड़े दूसरे
तकनीकी पक्षों के बारे में बताया।उन्होंने कहा
कि "भारत
में पटरी से उतरने की वजह से होने वाले रेल हादसों का इतिहास कोई नया नहीं है।ट्रेन
के पटरी पर से उतरने के चार मुख्य कारण हो सकते हैं.
पहला- सामने किसी अवरोध के
आने के कारण ट्रेन पटरी पर से उतर सकती है।कई बार ऐसा होता है कि कोई मवेशी या
बड़ा जानवर अचानक से पटरी पर आ जाता है तो ट्रेन पटरी पर से उतर जाती है।
दूसरा- इंजन का कोई हिस्सा या
पार्ट अगर गिर जाए और उस पर ट्रेन चढ़ जाए तो ऐसी स्थिति में भी पटरी पर से ट्रेन
उतर सकती है।
तीसरा- पटरी के टूटे होने की
स्थिति में भी ट्रेन पटरी पर से उतर सकती है।लेकिन ऐसी स्थिति में इंजन के साथ
ट्रेन उतरती है।कानपुर के पास जो हादसा हुआ है उसमें इंजन पटरी पर से नहीं उतरा है।कभी-कभी
यह भी हो सकता है कि इंजन के निकलने के बाद पटरी के बीच का गैप बढ़े और तब पीछे के
डिब्बे पटरी पर से उतर जाएं.
चौथा- कई
बार किसी-किसी इलाके में उपद्रवी और ग़ैर सामाजिक तत्वों के तोड़-फोड़ करने के
कारण भी ट्रेन पटरी पर से उतर जाती है।
साथ ही उन्होंने कहा कि कानपुर के पास जो हादसा
हुआ है उसमें मानवीय चूक होने की संभावना नहीं लगती है।मैंने अभी जो चार तकनीकी
वजहें बताई है इनकी संभावना ही ज्यादा लगती है।"
