मंगलवार, 14 जुलाई 2020

एमपी के बाद राजस्थान की सियासी संकट से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को सबक सीखनी होगी।



राजस्थान में सियासी घमासान जारी है। आज कांग्रेस के आला कमान ने सचिन पायलट को उप-मुख्यमंत्री और राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया है, जिसके बाद टोंक ज़िले के 59 ऑफ़िस बेयर्स ने इस्तीफ़े का ऐलान कर दिया है। आने वाले समय में कांग्रेस की मुश्किलें और नहीं बढ़ सकती, ऐसा नहीं कहा जा सकता है। रणदीप सुरजेवाला ने जब सचिन को पद से बर्ख़ास्त किए जाने का ऐलान किया है, उसके बाद कांग्रेस के बहुत सारे नेता ट्वीटर पर अफ़सोस जता रहे हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद एक और तेज़ तर्रार नेता का नाता कांग्रेस पार्टी से टूट गया है। हाल कांग्रेस पार्टी के बहुच सारे नेता कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के ख़िलाफ़ बोल तो रहे हैं लेकिन संजय झा जितना खुल कर कोई क्यूँ नहीं बोल रहा है, यह समझ से परे है। आख़िर ऐसे नेताओं को किस बात का डर है, पार्टी से निकाल दिए जाने या पार्टी में किसी पद पर हैं तो उससे हटा दिए जाने का? नेहरू परिवार के ग़लत और वक़्त की मांग के अनुसार राजनीतिक समझ में फ़ेल होने से अगर जीते हुए राज्य से भी सत्ता हाथ से चली जाए तो फिर पार्टी में रहने का क्या मतलब है?पार्टी की बदहाली पर ट्वीट करने वाले सभी नेताओंं को एकजुट होना चाहिए और सोनिया और राहुल गांधी से बात करनी चाहिए। बातचीत करने से समस्या का समाधान होता है इसलिए बातचीत करनी चाहिए। हो सकता है कि सोनिया और राहुल गांधी समझ जाएं कि कांग्रेस एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी नहीं है जिसकी बागडोर हमेशा नेहरू परिवार के हाथों में रहेगी। सोचिए अगर सोशल मीडिया पर लिखने/ बोलने वाले नेता इस बात में कामयाबी हासिल कर लेंगे तो कैसा होगा। कांग्रेस की कायाकल्प ही हो जाएगी। लेकिन इसके लिए बात करनी होगी।

साल 2018 में राजस्थान और मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही फ़र्स्ट और सेकेण्ड जनरेशन के नेताओं के बीच सत्ता की बागडोर सम्भालने के लेकर घमासान जारी है। एमपी में आपने पहले ही देख लिया और अब राजस्थान में  घमासान जारी है। मुझे ठीक-ठीक याद है कि जब  इन दोनों विधानसभा के नतीजे आए थे इस वक़्त भी मुख्यमंत्री पद लेकर घमासान मचा हुआ था। सचिन तो आसानी से मान गये थे,लेकिन ज्योतिरादित्य ने नहीं माना था। ज्योतिरादित्य अब बीजेपी में हैं, सचिन अपनी राजनीति को कैसे आगे बढ़ाते हैं इसके लिए इन्तज़ार करना होगा। क्योकिं ज्योतिरादित्य की तरह सचिन ने कभी कुछ ऐसे संकेत नहीं दिए है कि अगर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व उनकी नहीं सुनता है तो उनके लिए बीजेपी के द्वार खुले हुए हैं।

मुझे लगता है कि सोनिया और राहुल गांधी को अब यह समझ लेना चाहिए कि मां-बेटे के नेतृत्व वाली कांग्रेस को शायद देश की जनता और पार्टी के बहुत सारे नेता स्वीकार नहीं कर रहे है। वक़्त बदल चुका है देश की जनता नए  जनरेशन के युवा नेताओं के साथ नए तरीक़े से आगे बढ़ना चाहती है। युवा नेता कहे जाने वाले राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का क्या हाल हुआ है,किसी से छिपा नहीं है। पत्रकारों की तरह प्रियंका गांधी वाड्रा में इंदिरा गांधी जैसी करिश्माई शैली देखकर वक़्त बर्बाद करने से कोई फ़ाइदा नहीं है। प्रियंका गांधी कांग्रेस को जितना बुलन्द कर सकती थीं कर दी, अब इससे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकती हैं। मतलब नेहरू परिवार से कांग्रेस पार्टी की बागडोर किसी अन्य व्यक्ति के हाथों में जाना चाहिए, जो बदलती राजनीति को समझता हो। एक युवा नेता के भरोसे पार्टी कितने दिनों तक चलेगी। वक़्त बदल गया है दूसरे युवाओं को भी मौक़ा मिलना चाहिए।

बुधवार, 17 जून 2020

भारत-चीन सीमा-विवाद: संयम बरतने का वक़्त है जनाब!

भारत-चीन सीमा विवाद में 20 जवानों की शहादत के बाद चीन के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर आक्रोश और अपशब्दों के बाढ़ आ गए हैं। क्या आम क्या ख़ास, सब ग़ुस्से में हैं। और हो भी क्यूँ ना, माँ भारती की रक्षा में हमारे 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए हैं। लेकिन ग़ुस्से का इज़हार करते वक़्त याद रखना चाहिए कि आवेश में आकर हम कुछ ऐसा तो नहीं कर रहे हैं, जिससे दुश्मन को फ़ाइदा हो जाए... हमारे किए को सबूत बनाकर वैश्विक स्तर पर भारत के ख़िलाफ़ चाइना उसका इस्तेमाल ना कर लें।

बहुत सारे पत्रकारों का भी पोस्ट पढ़ा, वे लोग भी भड़काने जैसे वाक्य लिखे हैं। कई तो कह रहे हैं कि तोप,बम-बारूद किस लिए रखे हो..चीन को सबक़ सिखाने के लिए उसका इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसे बन्धुओं से अनुरोध है कि जब ग़ुस्सा आए तो एक गिलास ठंडा पानी पिएं और फिर सोचे कि वो जो हिंसक ख़याल उनके मन में आया है,उससे कोई फ़ाइदा होगा? युद्ध से ना तो विवाद समाप्त होता और ना ही शान्ति स्थापित होती है, फिर युद्ध क्यों करना? गांधी की धरती से पूरी दुनिया में अहिंसा का सन्देश फैला और उन्ही की धरती से मरने-मारने की बात होना,थोड़ा अजीब है। 

जैसा कि हम सब जानते हैं कि चाइना एक धोखेबाज़ देश है। छल उसके डीएनए में है। यह कई मौक़ों पर साबित हो चुका है और इस बार फ़िर उसने साबित कर दिया है। 6 जून को कमांडर लेवल की बातचीत में तय हो गया था कि दोनों देश के सैनिक अपनी-अपनी सीमा में लौट जाएंगे, लेकिन चीन ने ऐसा नहीं किया है। अभी कुछ देर पहले दोनों देश के विदेश मंत्रियों की बातचीत में भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने चेताया है कि LAC पर चीन अगर अपनी आदत से बाज नहीं आता है तो द्विपक्षीय रिश्ते पर असर पड़ेगा। बातचीत में दोनों से कशीदगी कम करने पर सहमति बनी है। देखना होगा चाइना क्या करता है।

भारत सरकार सीमा-विवाद को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी देती नहीं है, यह आदत बदलनी चाहिए। भारत..चाइना जैसा नहीं है कि कितने जवान मारे गए, उसकी जानकारी अपने देशवासियों को भी नहीं देता है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और सरकार की ज़िम्मेवारी होती है विपक्षी दलों और देशवासियों को जानकारी दे कि सीमा पर क्या हालात हैं। लोगों को भी सरकार से सवाल पूछना चाहिए, ज़िम्मेवारी तय करनी चाहिए कि सीमा पर क्या हालात है, वरना चाइनीज़ ऐप अन-इंस्टॉल और चाइनीज़ सामानों का बहिष्कार करते रह जाएंगे और चीन हम पर ज़ुल्म करता रहेगा।

बुधवार, 3 जून 2020

कोरोना काल में ‘क्या करें...क्या ना करें’


फ़िल्म रंगीला का एक गाना है ‘क्या करें क्या ना करें कैसी मुश्किल है, कोई तो बता दे इसका हल ओ मेरे भाई’ मुझे लगता है कि कोरोना संकट में पुरे दुनिया की यही स्थिति है। हर देश की निगाहें उस संस्था पर जाके टिक जाती है जो कोरोना वायरस की वैक्सीन तैयार करने या उसके लक्षणों पर रिसर्च कर रहा है, लेकिन पुख़्ता तौर पर अभी भी कोई कोरोना संकट का हल नही बता पाया है। ऐसे में दुनियाभर में असंमजस की स्थिति बनी हुई है कि संकट से निजात पाने के लिए क्या किया जाए, कौन सा क़दम उठाया जाए जिससे कोरोना संक्रमण की श्रृखंला टूटे।

हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने लॉकडाउन 1.0 का ऐलान करते वक़्त भी इसी बात पर ज़ोर दिया था कि किसी भी तरह से हमें कोरोना के संक्रमण को तोड़ना है और इसके लिए सबसे ज़रूरी है सोशल डिस्टेंसिंग। तब देश में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 564 थी। इसके बाद लॉकडाउन 2.0, 3.0, 4.0 और अब हमारा देश अनलॉक 1.0 हो गया है। मतलब कुछ गतिविधियों को केन्द्र सरकार ने सशर्त खोल दिया है, कुछ गतिविधियों को आने वाले दिनों में धीरे-धीरे खोल दिया जाएगा और साथ ही राज्यों को अधिकार दे दिया है कि यदि राज्य सरकार चाहे तो कुछ गतिविधियों पर पाबन्दी आयत कर सकती है। चार लॉकडाउन के बाद वर्तमान में देश में कोरोना वायरस से मरीज़ों की संख्या एक लाख के पार है, एक लाख़ से ज़्यादा लोग स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं और पांच हज़ार से ज़्यादा लोगों की ज़्यादा लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण मौत हो चुकी है। मतलब कुल मिलाकर क़रीब 135 करोड़ की आबादी वाले हमारे देश में कोरोना वायरस के कुल मरीज़ों की संख्या 2,07,615 है। अच्छी बात यह है कि यदि आज के आधार पर बात करें तो आज कोरोना से पूरे देश में 8,909 लोग वायरस से संक्रमित हुए हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ 4,776 लोग ठीक भी हुए हैं, मतलब जितने लोग संक्रमित हुए उससे आधे से ज़्यादा लोग ठीक हुए। लेकिन कोरोना वायरस से एक व्यक्ति का भी संक्रमित होना हमारे लिए चिन्ता की बात है। भारत में जब पहली बार लॉकडाउन का ऐलान किया था तब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत की तारीफ़ की थी और कहा था कि केन्द्र सरकार ने बहुत सही समय पर तालाबन्दी का फ़ैसला किया है। और उसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन  ने दुनिया को समय-समय पर चेताया कि यदि तालाबन्दी खोलने में किसी ने भी जल्दबाज़ी की तो नताइज बुरे होंगे। मतलब साफ़ है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन तब तक तालाबन्दी के पक्ष में है जबतक कोरोना वायरस के संक्रमण का ख़तरा समाप्त नहीं हो जाता है। अब सवाल है कि आख़िर कितने दिनों तक देश को लॉकडाउन रखा जा सकता है? शायद यह जवाबहीन सवाल है। वज्ह ये है कि कोरोना वायरस के संक्रमण के बारे में अबतक कोई पुख़्ता जानकारी नहीं मिल सकी है। रोज़ नये-नये लक्षण और नई-नई जानकारी सामने आ रही है। ऐसे में बहुत मुश्किल काम है यह ठीक-ठीक बता पाना कि कितने दिनों की तालाबन्दी के बाद कोरोना का संक्रमण ख़त्म हो जाएगा। शायद इसी वज्ह से दुनियाभर के देशों में तालाबन्दी को धीरे-धीरे हटाकर आर्थिक गतिविधियों को शुरू किया जा रहा है, ताकि भूखमरी की स्थिति ना उत्पन्न हो जाए। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए अब ‘जान भी और जहान भी’  ज़रुरी है, इसलिए सरकार ने तालाबन्दी खोल दिया है। ऐसी स्थिति में एक नागरिक के रूप में हम सब की ज़िम्मेवारी बनती है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुझाए उन तमाम उपायों का पालन करें जब तक कोरोना से ठीक होने का इलाज नहीं मिल जाता है। घर से बाहर निकलते समय ग्लब्स और फ़ेस मास्क का इस्तेमाल करें, दो मीटर की दूरी बनाए रखें, कोशिश करें कि किसी भी भीड़ में शामिल ना हों चाहे कुछ ख़रीदना ही क्यूँ ना हो। ऑफ़िस/ काम से लौटने के बाद कोशिश करें कि बच्चों और परिवार के बुढ़े लोगों के सम्पर्क में बिना ख़ुद साफ़-सुथरा किए हुए ना आये। 

बुधवार, 27 मई 2020

पंडित जवाहरलाल नेहरू का समाजवाद पर नज़रिया-

आज पूरा देश आधुनिक भारत के प्रणेता कहे जाने वाले पहले प्रधानमंत्री को याद कर रहा है। इसी क्रम में समाजवाद पर नेहरू जी के नज़रिए को आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मैं भारत के पहले वज़ीर-ए-आज़म को अलग-अलग माध्यमों से जानने की कोशिश करता हूँ। इसी क्रम में कुछ दिनों पहले मैंने लेखक हंसराज रहबर की लिखी किताब ' नेहरू बे-नक़ाब' पढ़ी। आइए जानते हैं कि पंडित जी का समाजवाद पर क्या नज़रिया था। पंडित जी समाजवाद के बारे में क्या सोचते थें। किताब में लिखा है- 

जवाहरलाल ने करंजिया के साथ अपनी भेंट में कहा था, " मैं समाजवाद में पिछले पचास वर्षों से विश्वास करता आ रहा हूँ और उसमें विश्वास करता तथा उसके लिए काम करता रहूँगा।" ( द माइंड ऑफ़ मिस्टर नेहरू)

लेकिन उनके इस विश्वास का दार्शनिक आधार क्या था? और उनके दिमाग़ में समाजवाद की धारणा क्या थी? 15 अगस्त 1958 को नेहरू जी ने अपने 'मूलभूत दृष्टिकोण' निबंध में लिखा था," लेकिन, समाजवाद क्या है? इसका कोई ठीक उत्तर देना कठिन है और समाजवाद की अनेक परिभाषाएं हैं। कुछ लोग शायद अस्पष्ट ढंग से सिर्फ़ यह सोचते हैं कि वह कोई अच्छी चीज़ है और उसका मक़सद समानता स्थापित करना है। पर यह सोच हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाती है।" जब पंडित नेहरू के पास जब कोई ठोस उत्तर नहीं और उनके दिमाग़ में समाजवाद की कोई निश्चित परिभाषा ही नहीं तो उनका विश्वास कैसे बना? और उन्होंने किस समाजवाद के लिए क्या काम किया? इस सिलसिले में स्पष्ट बात उन्होंने सिर्फ़ इतनी ही कही है कि, " समाजवाद बुनियादी तौर पर पूंजीवाद से भिन्न मार्ग है तथापि ख़याल है कि दोनों का बड़ा अन्तर ख़त्म होता जा रहा है क्योंकि समाजवाद के बहुत से विचार धीरे-धीरे पूंजीवादी व्यवस्था का अंग बनते जा रहे हैं।" मतलब समाजवाद के विचार अपना लेने से ख़ुद पूंजीवाद के समाजवाद में बदल जाने की सम्भावना है।

पंडित जवाहरलाल नेहरू समाजवाद पर मार्क्स के वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार नहीं करते थें,क्योंकि उनके अनुसार कम्युनिज्म मनुष्य की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। कम्युनिज्म में व्यक्ति को समाज पर क़ुर्बान किया जाता है। इससे भी ज़्यादा नेहरू को कम्युनिज्म से इस बात से ऐतराज़ था कि कम्युनिज्म का ताल्लुक़ हिंसा से है जो गांधी के शान्तिपूर्ण और अहिंसात्मक मार्ग से बिल्कुल विपरीत है।

(नोट- मैं नेहरूवियन नहीं हूँ। मैं नेहरू जी को जानने की कोशिश कर रहा हूँ। इसलिए मैं दावे के साथ नहीं कह रहा हूँ कि मैंने जो आपके साथ साझा किया है, वही अन्तिम सत्य है। इसलिए किसी पाठक के पास नेहरू जी का समाजवाद के प्रति इससे इतर भी नज़रिया था,तो कृपया साझा करें ताकि मैं भी जान सकूँ)

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

टाइम टू एक्जिट फ़्रॉम 'द थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग'

पिछले एक हफ़्ते से कोरोनावायरस संकट के बीच हमेशा की तरह हिन्दू-मुस्लिम टॉपिक पर चर्चा अपने चरम पर है। ऐसी चर्चाओं से ना तो घबराने की ज़रूरत है और ना ही ज़्यादा रूचि लेने की ज़रूरत है, क्योंकि इसमें कुछ नया नहीं है। ये सब पहले से होता आ रहा है और आगे भी जारी रहेगा क्योंकि यह करने वाले जो भी हैं, वो 'हिन्दू-मुस्लिम' टॉपिक में फंसे लोग हैं, जो ख़ुद को इस दलदल से निकालने की बजाय युवाओं को फंसाते रहते हैं। मेरे कई साथी भी ' थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग' से प्रभावित हैं। कोई जाति तो कोई धर्म के नाम पर किसी के ख़िलाफ़ ज़हर बोते रहते हैं। बहुत सारे उदाहरण दे सकता हूँ, लेकिन पिछले एकाध-दो हफ़्ते के दो उदाहरण आपको दे रहा हूँ, ताकि समझने में आसानी होगी कि लोग कैसे धर्म को लेकर अंटके हुए हैं। 

हिन्दुस्तान में Pandemic कोरोनावायरस के साथ-साथ Infodemic और समाज के उपद्रवियों से भी लड़ाई चल रही है। इसी से संबंधित दो ताज़ा उदाहरण देता हूँ।
एक दिन मैंने फ़ेसबुक पर इस बात की जानकारी दी कि राजस्थान के दो मुस्लिम युवकों को पुलिस ने टिकटॉक के माध्यम से अफ़वाह फैलाने के मामले में गिरफ़्तार किया है। तो मेरे एक मुस्लिम मित्र ने आपत्ति दर्ज कराई और कॉमेंट किया कि क्या हिन्दू- मुसलमान किए हो? तो मैंने पूछा कि क्या आप नहीं चाहते हैं कि फ़ेक न्यूज़ पर लगाम लगे? आज तक उन्होंने जवाब नहीं दिया है। 
दूसरा उदाहरण, 19 अप्रैल को मैंने लिखा कि "एक तरफ़ देश के अलग-अलग हिस्सों से ख़बरें आ रही हैं कि एक वर्ग पुलिसकर्मियों और चिकित्साकर्मियों पर लाठी-डंडों और पत्थर से हमले कर रहे हैं, जान लेने पर आमदा हैं। वहीं दूसरी तरफ़, एक दूसरा वर्ग है जो कोरोनावायरस से हमें-आपको बचाने में जुटे हुए हैं,उनका सम्मान भी किया जा रहा है।" मेरे इस बात पर एक मित्र ने 'वर्ग' शब्द का इस्तेमाल किए जाने को लेकर आपत्ति जताई। उनको लगा कि वर्ग लिखने से मेरा संबंध मुस्लिमों से है, जबकि मैंने वर्ग शब्द का इस्तेमाल इसलिए किया था क्योंकि देश के अलग-अलग हिस्सों में कहीं कोरोना वॉरियर्स पर हमले हुए तो कही स्वागत हुए। लेकिन मैंने अपने मित्र को कोई जवाब देना उचित नहीं समझा, क्योंकि मैं जानता हूँ कि इस बहस में फंसने का मतलब है समय की बर्बादी। हक़ीक़त क्या है किसी से छिपा है? आज सरकार ने स्वास्थ्यकर्मियों पर बढ़ते हमलों को देखते हुए एक अध्यादेश लाई है। इस अध्यादेश की जानकारी देते हुए केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले को बर्दास्त नहीं किया जाएगा। हमला करने वालों को जमानत नहीं मिलेगी और एक साल के भीतर सुनवाई पूरी की जाएगी। इसमें 50 हज़ार से 2 लाख रूपये तक जुर्माने और 3 महीने से 5 साल तक की सज़ा का भी प्रावधान है। गम्भीर चोट के मामले में अधिकतम सात साल की सज़ा हो सकती है।
                                      ये दोनों उदाहरण मैंने अपने मुस्लिम मित्रों के दिए हैं। सिर्फ़ यह बताने के लिए कैसे लोग 'हिन्दू-मुस्लिम' में फंसे हुए हैं कि सच को सुनने और हर बात को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे से देखने के सिवा कोई उपाय ही नहीं रह गया है। मुझे लगता है कि देश के युवाओं को 'द थॉट्स ऑफ़ हिप्पोक्रेटिक गैंग' से बाहर निकलना चाहिए और बिना लेकिन-किन्तु- परन्तु के सच को सच कहने और सुनने की आदत डालनी चाहिए। किसी की भी ग़लती से किसी की ग़लती को जस्टिफ़ाई नहीं किया जाना चाहिए। 
अब बात करते हैं तब्लीग़ी जमात की। हिन्दुस्तान में कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों में से अकेले 30 फ़ीसद लोगों के संबंध जमात से हैं। बिल्कुल शुरुआत में जब जमात का मामला सामने आया था तो स्वघोषित सेकुलरों ने 'छिपे' शब्द को लेकर आपत्ति जताई थी। आज आलम यह है कि राज्य सरकारें बार-बार अपील कर रही हैं कि जमात के लोग ख़ुद से सामने आएं और अपनी जांच कराएं, नहीं तो जानकारी मिलने पर क़ानूनी कार्रवाई होगी, तब भी लोग सामने नहीं आ रहे हैं। जमात से जुड़े लोगों की कई ऐसी शर्मनाक़ हरक़तें सामने आईं, जिसकी मज़म्मत बहुत सारे मुसलमानों ने भी किए है। सोमवार को ख़बर आई थी कि हरिद्वार के एक क्वॉरेंटाइन सेंटर से तब्लीग़ी जमात से जुड़ा शख़्स भाग गया था, जिसको बाद में गिरफ़्तार कर लिया है। गूगल करेंगे तो तब्लीग़ी जमात से जुड़े लोगों की बहुत सारी घटिया हरकतें आपको देखने को मिल जाएंगी। नर्सों से बदतमीज़ी के भी कई मामले सामने आए हैं। आज ही दिल्ली में कोरोनावायरस के शिकार एक मुस्लिम शख़्स ने नर्स से हाथापाई तक की, लेकिन किसी तरह से जान बचाकर वो नर्स उन लोगों से जान बचाकर भाग आई। नीचे लिंक दे रहा हूँ, वीडियो में आप सुनेंगे कि निज़ामुद्दीन मरकज़ के प्रवक्ता कह रहे हैं नर्स को छेड़खानी की वीडियो दिखानी चाहिए।https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3260874297302174&id=138762029513432
कोरोना महामारी को देखते हुए कई मुस्लिम देशों ने सामूहिक नमाज़ पढ़ने पर रोक लगा दी है। लेकिन भारत में क्या हो रहा है? जुमे की नमाज़ के लिए देश के किसी ना किसी हिस्से में लोग इकट्ठे मिल जाते हैं और जब पुलिस कार्रवाई करती है तो रोना रोने लगते हैं। मुझे ठीक-ठीक याद है कि पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के पोते की शादी हो, बीजेपी विधायकों के जुलूस और जन्मदिन मनाने की घटना हो या सीएम योगी और शिवराज सिंह चौहान की बात हो, सब की काफ़ी आलोचना हुई है और डिबेट हुई है। फिर ऐसे में तब्लीग़ी जमात या वो मुस्लिम, जिनकी वज्ह से पूरा मुस्लिम समाज शर्मसार होता है, उसपर मीडिया में चर्चा क्यूँ नहीं होनी चाहिए? कब तक कथित रूप से अल्प-संख्यक होने के नाम पर इनके ग़लत कामों पर पर्दा डालने की कोशिश होती रहेगी? तब्लीग़ी जमात की आलोचना और उनकी करतूतों पर सवाल करने का मतलब सभी मुसलमानों से नहीं होता है। तब्लीग़ी जमात की हरकतों से देश के नामवर मौलानाओं और मुस्लिमों ने ख़ुद को अलग कर लिया है। हिन्दुस्तान में क़ानून सबसे के लिए बराबर है, इसलिए सवाल सभी होगा।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

कोरोना'काल में और बाद में हम!

आज प्रधानमंत्री मोदी ने लॉकडाउन को 3 मई 2020 तक बढ़ा दिया है। मतलब आजतक हम लोग लॉकडाउन के जिन-जिन नियमों का पालन कर रहे थें उसका 3 मई तक पालन करना होगा। बिना ज़रूरत के पहले की तरह लक्ष्मण रेखा पार नहीं करना होगा। पीएम मोदी ने अपने सम्बोधन में कहा है कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो 20 अप्रैल के बाद से कुछ गतिविधियों में छूट दी जाएगी, लेकिन मामला गड़बड़ होने पर छूट को समाप्त कर दिया जाएगा। मतलब साफ़ है कि आप और हम (जनता) सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन के नियमों का कैसे पालन करते हैं, ताकि कोरोनावायरस के संक्रमण का मामला बढ़े भी ना और उन लोगों कामगारों, व्यापारियों, दुकानदारों का आर्थिक पहिया घूमने लगे, जो देश की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 
इस वक़्त पूरी दुनिया में कोरोनावायरस के संक्रमण को रोकने के लिए एक मात्र विकल्प है सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन, क्योंकि कोविड-19 अबतक लाइलाज बीमारी है।  कोरोनावायरस के आगे वो सारे मुल्क जो मिसाइल और आधुनिक हथियारों के दम पर दूसरे देशों को धमकाते फिरते थे, वो सब लाचार नज़र आ रहे है। विश्व की दो महाशक्ति कहे जाने वाले चीन और अमेरिका की हालात कितनी बदतर है, किसी से छिपा नहीं है। इन दोनों देशों में कोरोनावायरस से हर रोज़ सैंकड़ों लोगों की जानें जा रही है, लेकिन सरकारें कुछ कर नहीं पा रही हैं। अगर लोग संक्रमित हो जा रहें तो उनकी ज़िन्दगी भगवान भरोसे ही है। मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयों का अबतक कोई पुख़्ता प्रमाण नहीं मिला है कि कोरोनावायरस के मरीज़ों का इन दवाइयों से इलाज किया जा सकता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कोरोनावायरस के आगे सब कोई लाचार है। इसलिए दुनियाभर के देश लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग बनाएं रखने और स्वच्छता पर ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं। इन सब के बीच कुछ सवाल जो सबसे महत्वपूर्ण है वो यह है कि कोरोना'काल से दुनिया कबतक निकलेगी और जब निकलेगी तो कैसी होगी दुनिया? देशों की आर्थिक सेहत कितनी बुरी होगी और कितनी जल्दी आर्थिक सेहत ठीक हो जाएगा? क्या मिसाइल और आधुनिक हथियारों के दम पर डराने वाले मुल्कों की आर्थिक हालत वैसी ही रहेगी,जैसी पहली थी? शायद इन सवालों के जवाब आने वाले वक़्त में मिलेंगे। एक जो सवाल है कि कैसी होगी दुनिया, अगर इसके आर्थिक परिप्रेक्ष्य की बात ना करें, तो इंसानों की बदली आदतों के आधार पर दावे के साथ तो नहीं, लेकिन अनुमान लगाया जा सकता है, जो इस काल से बचकर निकल जाएंगे, वो इस बात का ज़रूर ख़याल रखेंगे कि प्राकृतिक से खिलवाड़ नहीं करेंगे और स्वच्छता और खान-पान में आए बदलाव को जारी रखेंगे। 
हम सब जानते हैं कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमारे देश की हालत कैसी है। ना तो ज़रूरत के हिसाब चिकित्साकर्मी हैं और ना ही ज़रूरत के हिसाब से स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर है। ऐसे में इन दिनों बहुत ज़रूरी है कि ख़ुद ही अपना ख़याल रखें और कोरोनावायरस के संक्रमण से बचने के लिए जो उपाय सुझाए गए हैं, उनका पालन करें।

दुनियाभर में इन दिनों हाथ मिलाकर अभिवादन करने की बजाय नमस्ते किया जा रहा है,जो हमारी भारतीय सभ्यता में पहले से ही थी, लेकिन आधुनिकता के दौर में हम में से ज़्यादातर लोग भूल गए थें। लेकिन इस बदले हुए जमाने में भी मैं और मेरे सहकर्मी अमित पालित एक दूसरे का अभिवादन नमस्ते करके ही करते हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाथों को समय-समय पर ठीक से धोने के लिए सलाह दिया,जिसको हमसब को कोरोना'काल के बाद भी जारी रखना होगा। ताकि हम स्वच्छ और स्वस्थ रहेंगे तो देश भी स्वच्छ और स्वस्थ रहेगा।

आयुष मंत्रालय,भारत सरकार ने इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं, जिसका पालन करने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। 

इन दिनों भारत की तमाम नदियां पहले से ज़्यादा निर्मल दिखाई दे रहीं हैं। यह सही वक़्त है उन सभी फ़ैक्ट्री मालिकों के पास जिनकी वज्ह से नदियों का पानी दूषित होता है, विचार करें और नदियों में जाने वाले अवशेषों को रोकने की व्यवस्था करें।

इन दिनों भारत के वे सभी शहर जिसकी गिनती वायु प्रदुषण की वज्ह से दुनिया के दूषित शहरों में होती थी, वहां के जीव-जन्तु लॉकडाउन की वज्ह से शुद्ध हवा ले रहे हैं।ऐसे शहरों में रहने वाले सभी लोगों को चाहिए कि लॉकडाउन के समाप्त होने के बाद भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करें ताकि वायु प्रदुषित होने से बचा रहे।

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

पीएम मोदी ने कहीं ये नहीं, इन वज्हों से देश को सम्बोधित तो नहीं किया है!

वैश्विक महामारी कोरोना वायरस को लेकर प्रधानमंत्री मोदी का देश को सम्बोधन, आप किस रूप में देखते हैं? कई लोगों ने पीएम की बातों पर अम्ल करते हुए उनकी बातों को प्रसारित करने में लगे हुए हैं तो बहुत सारे लोग तनक़ीद भी कर रहे हैं। आलोचना करने वाले लोग पीएम के सम्बोधन को इस रूप में देख रहे हैं कि सरकार ने ख़ुद को सरेंडर कर दिया है। मेरे मित्र @Chaman Mishra ने लिखा कि “ऐसे वक़्त में मोदी जी में नेहरू जी समा जाते हैं” तो जवाब में @अंकित द्विवेदी ने लिखा कि ये महाशय (नरेन्द्र मोदी) कभी भी नेहरू नहीं बन सकते हैं। कई लोग कह रहे हैं कि पीएम मोदी हर चीज़ को इवेंट बना देते हैं। कोरोना वायरस से संकट के समय पीएम को इवेंट से बचना चाहिए और ज़रूरी कामों पर ध्यान देना चाहिए। आपका क्या कहना है?

पीएम मोदी ने अपने सम्बोधन में बहुत सारी बातें बताई, लेकिन चर्चा 'जनता कर्फ़्यू' की ही हो रही है। पीएम की बातों के आलोचकों और समर्थकों में वाक्य युद्ध हो रहे हैं। इस वाक्य युद्ध का नतीजा 22 मार्च को पता चल जाएगा। लेकिन मेरे ख़याल से पीएम मोदी की बातों को जनता कर्फ़्यू और इवेंट के इतर भी देखना चाहिए कि पीएम मोदी आख़िर देश को सम्बोधित करने क्यूँ आएं थें? एक तरफ़ कोरोना वायरस के ख़तरे से गाँव-क़स्बों के लोग अब भी जागरूक नहीं है। वहाँ के लोग इस वायरस को अब भी काफ़ी हलके में ले रहे हैं। दूसरी तरफ़ जान-बूझकर भी लोग लापरवाही बरत रहे हैं। सरकार रोज़-रोज़ बता रही है कि कोरोना वायरस से बचने के लिए क्या-क्या करना चाहिए, लेकिन लोग मान नहीं रहे हैं। मुल्कभर के दीगर शहरों में धारा 144 क्यूँ लागू करनी पड़ रही है? शायद इसी वज्ह से कि लोग मान नहीं रहे हैं। ना जाने ट्रैवल हिस्ट्री क्यूँ छिपा रहे हैं।

हमारे देश में कोरोना वायरस के शिकार मरीज़ों में मुसलसल इज़ाफ़ा हो रहा है, सिर्फ़ इसलिए कि लोग लापरवाही बरत रहे हैं। एक नागरिक के रुप में इस संकट की घड़ी में आपको एक आदर्श नागरिक का परिचय देते हुए सरकार ने जो भी उपाय बताएं हैं उसका पालन करना चाहिए। बताए गए उपायों का पालन करना हमारा संवैधानिक कर्तव्य भी है। अफ़वाहों पर लोग ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं। गुरूवार को देश के कई हिस्सों से ख़बरें आईं कि लोग अपने-अपने घरों में राशन इकट्ठा करने लगे हैं। लोगों में राशन इकट्ठा करने को लेकर बे-वज्ह अफ़रा-तफ़री मची है। शायद इन्ही सब वज्हों से पीएम मोदी को देश को सम्बोधित करना पड़ा। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर तमाम कई सारी अंन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने कोरोना वायरस के ख़तरे से निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा उठाये गए क़दमों की तारीफ़ की है। आप थाली या ताली बजाएंगें या नहीं, यह आपकी मर्ज़ी है। लेकिन आप अपनी नैतिक और संवैधानिक ज़िम्मावारियों को समझते हुए बहुत ज़रूरत हो तब ही किसी से मिलिए और अफ़वाहों को फैलाने से बचिए। आप इस रूप में सोचिए कि आपकों ख़ुद को इस वायरस से बचाना है और अगर ऐसे ही सभी लोग सोचने लगेंगे तो कोरोना वायरस को आसानी से मात दिया जा सकता है।

भारत की राज-व्यवस्था

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