राजस्थान में सियासी घमासान जारी है। आज कांग्रेस के आला कमान ने सचिन पायलट को उप-मुख्यमंत्री और राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया है, जिसके बाद टोंक ज़िले के 59 ऑफ़िस बेयर्स ने इस्तीफ़े का ऐलान कर दिया है। आने वाले समय में कांग्रेस की मुश्किलें और नहीं बढ़ सकती, ऐसा नहीं कहा जा सकता है। रणदीप सुरजेवाला ने जब सचिन को पद से बर्ख़ास्त किए जाने का ऐलान किया है, उसके बाद कांग्रेस के बहुत सारे नेता ट्वीटर पर अफ़सोस जता रहे हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद एक और तेज़ तर्रार नेता का नाता कांग्रेस पार्टी से टूट गया है। हाल कांग्रेस पार्टी के बहुच सारे नेता कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के ख़िलाफ़ बोल तो रहे हैं लेकिन संजय झा जितना खुल कर कोई क्यूँ नहीं बोल रहा है, यह समझ से परे है। आख़िर ऐसे नेताओं को किस बात का डर है, पार्टी से निकाल दिए जाने या पार्टी में किसी पद पर हैं तो उससे हटा दिए जाने का? नेहरू परिवार के ग़लत और वक़्त की मांग के अनुसार राजनीतिक समझ में फ़ेल होने से अगर जीते हुए राज्य से भी सत्ता हाथ से चली जाए तो फिर पार्टी में रहने का क्या मतलब है?पार्टी की बदहाली पर ट्वीट करने वाले सभी नेताओंं को एकजुट होना चाहिए और सोनिया और राहुल गांधी से बात करनी चाहिए। बातचीत करने से समस्या का समाधान होता है इसलिए बातचीत करनी चाहिए। हो सकता है कि सोनिया और राहुल गांधी समझ जाएं कि कांग्रेस एक प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी नहीं है जिसकी बागडोर हमेशा नेहरू परिवार के हाथों में रहेगी। सोचिए अगर सोशल मीडिया पर लिखने/ बोलने वाले नेता इस बात में कामयाबी हासिल कर लेंगे तो कैसा होगा। कांग्रेस की कायाकल्प ही हो जाएगी। लेकिन इसके लिए बात करनी होगी।
साल 2018 में राजस्थान और मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से ही फ़र्स्ट और सेकेण्ड जनरेशन के नेताओं के बीच सत्ता की बागडोर सम्भालने के लेकर घमासान जारी है। एमपी में आपने पहले ही देख लिया और अब राजस्थान में घमासान जारी है। मुझे ठीक-ठीक याद है कि जब इन दोनों विधानसभा के नतीजे आए थे इस वक़्त भी मुख्यमंत्री पद लेकर घमासान मचा हुआ था। सचिन तो आसानी से मान गये थे,लेकिन ज्योतिरादित्य ने नहीं माना था। ज्योतिरादित्य अब बीजेपी में हैं, सचिन अपनी राजनीति को कैसे आगे बढ़ाते हैं इसके लिए इन्तज़ार करना होगा। क्योकिं ज्योतिरादित्य की तरह सचिन ने कभी कुछ ऐसे संकेत नहीं दिए है कि अगर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व उनकी नहीं सुनता है तो उनके लिए बीजेपी के द्वार खुले हुए हैं।
मुझे लगता है कि सोनिया और राहुल गांधी को अब यह समझ लेना चाहिए कि मां-बेटे के नेतृत्व वाली कांग्रेस को शायद देश की जनता और पार्टी के बहुत सारे नेता स्वीकार नहीं कर रहे है। वक़्त बदल चुका है देश की जनता नए जनरेशन के युवा नेताओं के साथ नए तरीक़े से आगे बढ़ना चाहती है। युवा नेता कहे जाने वाले राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का क्या हाल हुआ है,किसी से छिपा नहीं है। पत्रकारों की तरह प्रियंका गांधी वाड्रा में इंदिरा गांधी जैसी करिश्माई शैली देखकर वक़्त बर्बाद करने से कोई फ़ाइदा नहीं है। प्रियंका गांधी कांग्रेस को जितना बुलन्द कर सकती थीं कर दी, अब इससे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकती हैं। मतलब नेहरू परिवार से कांग्रेस पार्टी की बागडोर किसी अन्य व्यक्ति के हाथों में जाना चाहिए, जो बदलती राजनीति को समझता हो। एक युवा नेता के भरोसे पार्टी कितने दिनों तक चलेगी। वक़्त बदल गया है दूसरे युवाओं को भी मौक़ा मिलना चाहिए।
