भारत-चीन सीमा विवाद में 20 जवानों की शहादत के बाद चीन के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर आक्रोश और अपशब्दों के बाढ़ आ गए हैं। क्या आम क्या ख़ास, सब ग़ुस्से में हैं। और हो भी क्यूँ ना, माँ भारती की रक्षा में हमारे 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए हैं। लेकिन ग़ुस्से का इज़हार करते वक़्त याद रखना चाहिए कि आवेश में आकर हम कुछ ऐसा तो नहीं कर रहे हैं, जिससे दुश्मन को फ़ाइदा हो जाए... हमारे किए को सबूत बनाकर वैश्विक स्तर पर भारत के ख़िलाफ़ चाइना उसका इस्तेमाल ना कर लें।
बहुत सारे पत्रकारों का भी पोस्ट पढ़ा, वे लोग भी भड़काने जैसे वाक्य लिखे हैं। कई तो कह रहे हैं कि तोप,बम-बारूद किस लिए रखे हो..चीन को सबक़ सिखाने के लिए उसका इस्तेमाल करना चाहिए। ऐसे बन्धुओं से अनुरोध है कि जब ग़ुस्सा आए तो एक गिलास ठंडा पानी पिएं और फिर सोचे कि वो जो हिंसक ख़याल उनके मन में आया है,उससे कोई फ़ाइदा होगा? युद्ध से ना तो विवाद समाप्त होता और ना ही शान्ति स्थापित होती है, फिर युद्ध क्यों करना? गांधी की धरती से पूरी दुनिया में अहिंसा का सन्देश फैला और उन्ही की धरती से मरने-मारने की बात होना,थोड़ा अजीब है।
जैसा कि हम सब जानते हैं कि चाइना एक धोखेबाज़ देश है। छल उसके डीएनए में है। यह कई मौक़ों पर साबित हो चुका है और इस बार फ़िर उसने साबित कर दिया है। 6 जून को कमांडर लेवल की बातचीत में तय हो गया था कि दोनों देश के सैनिक अपनी-अपनी सीमा में लौट जाएंगे, लेकिन चीन ने ऐसा नहीं किया है। अभी कुछ देर पहले दोनों देश के विदेश मंत्रियों की बातचीत में भारत के विदेश मंत्री एस.जयशंकर ने चेताया है कि LAC पर चीन अगर अपनी आदत से बाज नहीं आता है तो द्विपक्षीय रिश्ते पर असर पड़ेगा। बातचीत में दोनों से कशीदगी कम करने पर सहमति बनी है। देखना होगा चाइना क्या करता है।
भारत सरकार सीमा-विवाद को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी देती नहीं है, यह आदत बदलनी चाहिए। भारत..चाइना जैसा नहीं है कि कितने जवान मारे गए, उसकी जानकारी अपने देशवासियों को भी नहीं देता है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और सरकार की ज़िम्मेवारी होती है विपक्षी दलों और देशवासियों को जानकारी दे कि सीमा पर क्या हालात हैं। लोगों को भी सरकार से सवाल पूछना चाहिए, ज़िम्मेवारी तय करनी चाहिए कि सीमा पर क्या हालात है, वरना चाइनीज़ ऐप अन-इंस्टॉल और चाइनीज़ सामानों का बहिष्कार करते रह जाएंगे और चीन हम पर ज़ुल्म करता रहेगा।