आज पूरा देश आधुनिक भारत के प्रणेता कहे जाने वाले पहले प्रधानमंत्री को याद कर रहा है। इसी क्रम में समाजवाद पर नेहरू जी के नज़रिए को आपके साथ साझा कर रहा हूँ। मैं भारत के पहले वज़ीर-ए-आज़म को अलग-अलग माध्यमों से जानने की कोशिश करता हूँ। इसी क्रम में कुछ दिनों पहले मैंने लेखक हंसराज रहबर की लिखी किताब ' नेहरू बे-नक़ाब' पढ़ी। आइए जानते हैं कि पंडित जी का समाजवाद पर क्या नज़रिया था। पंडित जी समाजवाद के बारे में क्या सोचते थें। किताब में लिखा है-
जवाहरलाल ने करंजिया के साथ अपनी भेंट में कहा था, " मैं समाजवाद में पिछले पचास वर्षों से विश्वास करता आ रहा हूँ और उसमें विश्वास करता तथा उसके लिए काम करता रहूँगा।" ( द माइंड ऑफ़ मिस्टर नेहरू)
लेकिन उनके इस विश्वास का दार्शनिक आधार क्या था? और उनके दिमाग़ में समाजवाद की धारणा क्या थी? 15 अगस्त 1958 को नेहरू जी ने अपने 'मूलभूत दृष्टिकोण' निबंध में लिखा था," लेकिन, समाजवाद क्या है? इसका कोई ठीक उत्तर देना कठिन है और समाजवाद की अनेक परिभाषाएं हैं। कुछ लोग शायद अस्पष्ट ढंग से सिर्फ़ यह सोचते हैं कि वह कोई अच्छी चीज़ है और उसका मक़सद समानता स्थापित करना है। पर यह सोच हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाती है।" जब पंडित नेहरू के पास जब कोई ठोस उत्तर नहीं और उनके दिमाग़ में समाजवाद की कोई निश्चित परिभाषा ही नहीं तो उनका विश्वास कैसे बना? और उन्होंने किस समाजवाद के लिए क्या काम किया? इस सिलसिले में स्पष्ट बात उन्होंने सिर्फ़ इतनी ही कही है कि, " समाजवाद बुनियादी तौर पर पूंजीवाद से भिन्न मार्ग है तथापि ख़याल है कि दोनों का बड़ा अन्तर ख़त्म होता जा रहा है क्योंकि समाजवाद के बहुत से विचार धीरे-धीरे पूंजीवादी व्यवस्था का अंग बनते जा रहे हैं।" मतलब समाजवाद के विचार अपना लेने से ख़ुद पूंजीवाद के समाजवाद में बदल जाने की सम्भावना है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू समाजवाद पर मार्क्स के वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार नहीं करते थें,क्योंकि उनके अनुसार कम्युनिज्म मनुष्य की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। कम्युनिज्म में व्यक्ति को समाज पर क़ुर्बान किया जाता है। इससे भी ज़्यादा नेहरू को कम्युनिज्म से इस बात से ऐतराज़ था कि कम्युनिज्म का ताल्लुक़ हिंसा से है जो गांधी के शान्तिपूर्ण और अहिंसात्मक मार्ग से बिल्कुल विपरीत है।
(नोट- मैं नेहरूवियन नहीं हूँ। मैं नेहरू जी को जानने की कोशिश कर रहा हूँ। इसलिए मैं दावे के साथ नहीं कह रहा हूँ कि मैंने जो आपके साथ साझा किया है, वही अन्तिम सत्य है। इसलिए किसी पाठक के पास नेहरू जी का समाजवाद के प्रति इससे इतर भी नज़रिया था,तो कृपया साझा करें ताकि मैं भी जान सकूँ)