रविवार, 23 फ़रवरी 2020

सरकारी सुविधाओं से महरूम ज़िन्दगानी।

तस्वीरें नोएडा के सेक्टर 16 मेट्रो स्टेशन के पास की है। आज सुब्ह 10 बजे मैं एक झुग्गी की तरफ़ जा रहा था, वहाँ रहने वाले लोगों से बातचीत कर यह जानने कि क्या उनकी ज़िन्दगी में 'सब चंगा सी' है या नहीं। लेकिन अचानक से मेरी नज़र इन लोगों पर पड़ी। देर रात को काम से लौटने के बाद सुब्ह में महिलाएं और पुरुष आपस में बात कर रहे थें।
 ऐसा कम ही होता है कि इतनी देर तक सब इकट्ठे होकर बातचीत करते हैं। काम को लेकर देर रात को अपनों के बीच लौटना और सुब्ह जल्दी उठकर काम की तलाश में निकल जाना पुरुषों की दिनचर्या होती है। यह बात इन्हीं लोगों में एक व्यक्ति ने तस्वीर ना खींचने और अपना नाम ना बताने की शर्त पर बताई। जिस व्यक्ति ने मुझसे बात की, पूरी बातचीच के दौरान लगा कि वह कैमरे की नज़र से बचना चाहता था। इस बात का एहसास तब हुआ, जब उसने कहा कि मीडिया वाले रिकॉर्डिंग करके ले जाते हैं और टीवी पर दिखा देते हैं। बाद में पुलिस आकर हमारे झोपड़ियों को तोड़ देती है। हमारे बातचीत का सिलसिला जैसे ही शुरु हुआ था, दो तीन महिलाएं क़रीब आकर मुझसे अपना दर्द बयां करने लगीं। ये सभी बिहार की राजधानी पटना के अनीसाबाद इलाक़े के रहने वाले थीं। कुछ महिलाएं और पुरुष अपनी बात साझा करने में हिचक रहे थें, जिसकी वज्ह से वो दूर से हमारे बातचीत को ग़ौर से देख रहे थें कि हम क्या कर रहे हैं या क्या करने वाले हैं। हमारी बातचीत आगे बढ़ी। मैं इन छोटे-छोटे बच्चों के बारे में पूछा कि क्या यह सभी पढ़ने जाते हैं?
 एक महिला ने बड़ी ही उदासी से कहा कि नहीं...नहीं जाता है सब पढ़ने...कहां जाएगा पढ़ने...6 महीनें तक मैं अपने बच्चों को सेक्टर 18 में एक स्कूल है...उसमें भेजी लेकिन ‘क’ भी लिखने नहीं आया। एक मास्टर जी यहीं उस पेड़ के नीचे (पास के एक पेड़ की तरफ़ इशारा करते हुए) पढ़ाने आते थें वो भी अब नहीं आते हैं। ऐसे में बच्चे कहां पढ़ पा रहे हैं। दिनभर ऐसे ही इधर-उधर खेलते रहते हैं। 

एक महिला जो सालों से यहीं रहती हैं, कहने लगी की कोई सरकारी आदमी पूछने तक नहीं आता है। और टीवीवाला पर जब दिखा देता है तो पुलिस आकर बहुत परेशान करती है। झोपड़िया तोड़ देती है। इतने में पुरुष ने कहा कि जैसे-जैसे साल बीतता जा रहा है...नोएडा में स्वच्छता बढ़ता जा रहा है...नोएडा साफ़-सुथरा होता जा रहा है...साफ़ सुथरा देखने में कितना अच्छा लगता है ना..हो सकता है कि इस वज्ह से पुलिस हमारी झोपड़ियों को तोड़ देती है। 

पुरुष उदास मन से अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहने लगा कि हमलोग क्या करें...बिहार में नौकरी हइए नहीं है..जिसकी वज्ह से हमलोगों को यह काम करना पड़ता है...मैंने कहा कि नीतीश कुमार इतने दिनों से शासन में हैं, तब भी नौकरी नहीं है? जवाब में पुरुष ने कहा कि   आप ही बताइए ना..बिहार में कहां है नौकरी...कम्पनी है ही नहीं तो रोज़गार कहाँ से मिलेगा। इसलिए हमलोगों को यह सब करना पड़ता है।

एक महिला कहने लगीं कि सरकार हमलोगों पर ध्यान देती तो हमलोग भी कुछ काम करते...शहद बेचने, सड़क किनारे बच्चों से ग़ुब्बारा बेचवाने से तो अच्छा रहता कि हमलोग भी कुछ काम करतें।

काफ़ी से देर तक बातचीत के बाद महसूस हुआ कि इनलोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बनाने के लिए सरकार को ध्यान देना चाहिए। ये लोग सरकारी योजनाओं के बारे में कुछ नहीं जानते हैं। ऐसे में सरकार की ज़िम्मावारी होनी चाहिए कि अपने कर्मचारियों को ऐसे लोगों के बीच भेज कर, इनलोगों से बात करे। ऐसे लोगों को शिक्षा,स्वास्थ्य और आवास उपलब्ध कराये।

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

रिश्ते की बुनियाद में ‘तहज़ीब’ होनी चाहिए।

हर कोई किसी ना किसी रिश्ते की डोर में बंधा होता है और रिश्ते की पहली शर्त होती है कि हर कोई उम्मीद करता है कि चाहे वह ख़ुद कैसे भी बोले/ बात करे लेकिन सामने वाला तहज़ीब से बात करे। लेकिन आज के समय में ऐसी उम्मीद करना शायद ख़ुद से बेईमानी करने जैसा है। जैसे को तैसा वाले समय में हर किसी को समझना पड़ेगा कि आप जब किसी का सम्मान नहीं करेंगे तो शायद ही सामने वाला भी आपका सम्मान करेगा। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपके रिश्तों में मतभेद का होना तय है। इसलिए बहुत ज़रूरी है कि बातचीत करते वक़्त तहज़ीब यानि तरीक़े से बात करें। हमारे समाज में सास-बहू का रिश्ता ऐसा है जिसके मतभेद में यह तय करना लगभग नामुमकिन होता है कि सास ग़लत है या बहू। इस रिश्ते में मतभेद के अनन्त किस्से हैं। मैं आपको यहाँ एक उदाहरण दे रहा हूँ कि तहज़ीब कैसे रिश्ते में मतभेद नहीं होने देता है।

अभी कुछ दिनों पहले मैं अपने एक परिचित के घर गया हुआ था। हाल ही में उनके बेटे की शादी हुई है। मैं उनके साथ बैठकर बातें कर रहा था, तो देखा कि उनकी बहू गिलास में दाल लेकर आई। दाल एक ऐसी चीज़ है जो थोड़ी बहुत बच ही जाती है। मुझे याद है कि जब मैं छोटा था तो शाम को जो दाल बच जाती थी, उनको कई बार मुझे पीने के लिए दिया जाता था। हम दोनों एक दूसरे से भोजपुरी में बात कर रहे थे,इसलिए मैं उनकी बातों को भोजपुरी में लिख रहा हूँ ताकि समझने में आसानी हो कि किसी बात को समझाने का लहजा कैसा होना चाहिए।

बताव..तू जोन इ रोज़-रोज़ दाल फेंक देवे लू...केतना महंगा आवेला...या त कम बनावअ चाहे बच जाए तक हमनी के दे द पीए ला...फेंकला पर त बर्बादे नू होई...कहने मतलब यह है कि जो रोज़- रोज़ दाल बच जाती थी उसको उनकी बहू फेंक देती थी। जब उन्होंने बहू को समझा दिया तो शाम को जब भी बर्तन धोने जाती है, बचे हुए दाल या जो कुछ भी बचा रहता है उसको फेंकने की बजाय खाने के लिए दे जाती है।

कहने तात्पर्य यह है किसी से भी बात करने का लहजा बिल्कुल ही शान्त और नर्म होने चाहिए।   

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...