शनिवार, 30 नवंबर 2019

इंसानियत अब भी ज़िन्दा है!

अपने गांव आया हूँ। क़रीब सालों बाद इस बार 10 दिनों की छुट्टी मिली है, जिसकी वज्ह से परिवार वालों और अपने गांव वालों से बीच बिल्कुल वैसे ही समय बीत रहा है, जैसे कभी बीतता था। काफ़ी अच्छा लग रहा है, उन लोगों के बीच ख़ुद को पाकर। तस्वीर में मेरे साथ जो भाई दिख रहा है, ये उन्हीं में से एक है जिनको बचपन से देखता आ रहा हूँ। पेशे से ये यदि इंग्लिश में कहे तो ये Assistance stonemanson हैं। शुक्रवार को इनको जितना जानता था उससे और ज़्यादा जानने का मौक़ा मिला। ये तो पहले से ही जानता था कि ये गूंगे हैं, लेकिन इस बार इनकी ज़ातीय ज़िन्दगी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला। शुक्रवार को जब ये मेरे यहां काम करने आयें, तो मैंने हर सम्भव कोशिश की इनको किसी तरह की समस्या ना हो। खैनी खाते हैं तो इनको एक पुड़िया खैनी ख़रीदकर ला दिया ताकि समय-समय पर खाते रहें और पानी पीते रहे। एक वक़्त ऐसा आया था जब दीवार से ये पुरानी खिड़की निकाल रहे थें, उसी दरम्यान राजमिस्त्री कुछ पल के लिए ग़ायब हो गया था, तो मैंने ख़ुद जाकर इनका सहयोग किया। सीमेंट-बालू को मिलाकर जब भी मसाला बनाते थें तो मैं इनकी हेल्प करता था। 

काम के साथ-साथ जैसे-जैसे वक़्त बीतता जा रहा था, बहुत सारी ऐसी बातें इनसे सीखने को मिली, जो जिन्दगी में काम आएंगे। ये बोल नहीं सकते हैं,जिसकी वज्ह से ये सिर्फ़ इशारा करके अपनी बात बताते हैं। काम समाप्त होने के बाद मैं, राजमिस्त्री और ये,साथ बैठकर चाय पी रहे थें। राजमिस्त्री इनके पड़ोसी ही थे,जिनसे इनकी काफ़ी अच्छी ट्यूनिंग है, वो इनके बारे में बताने लगे। इनके घर की कहानी वैसी ही हैं,जो आमतौर पर हर घर में पाई जाती है। लेकिन कुछ बाते जिसने मुझे बहुत ही मुतासिर किया,उसको आपके साथ साझा कर रहा हूँ। इनकी शादी हो चुकी है। पत्नी को मोतियाबिन्द की बीमारी है जिसका इलाज हो रहा है। इनको एक बेटी-बेटा है। दोनों अभी बिल्कुल छोटे हैं। काम समाप्त होने के बाद जब हम लोग चाय पीते-पीते बातों में व्यस्त हो गये थें, तो इन्होंने इशारे में बताया कि उनको लेट हो रहा है, घर जाना होगा,बच्चे इनका इन्तज़ार कर रहे होंगे। तब राजमिस्त्री ने बताया कि रोज़ काम से लौटने के बाद खाना बनाकर अपनी पत्नी और बच्चों को खिलाते हैं। एक शाम मैंने देखा भी था कि अपने दोनों बच्चों को एक साथ गोद में लेकर उन सबों को कुछ ख़रीदने के लिए दुकान पर आये थें। 
एक और बात जिसने मुझे बहुत मुतासिर किया वो ये है कि कुछ दिनों पहले किसी ने इनके बच्चे को किसी ने धक्का मार दिया था,जिसकी वज्ह से इनका बेटा गम्भीर रूप से घायल हो गया था। आनन-फ़ानन में अपने बच्चे को लेकर हस्पताल गए। ज़ख़्म कमर में था,लेकिन डॉक्टर ने पैर में प्लास्टर कर दिया । कुछ दिनों में जब सुधार नहीं हुआ तो लोगों ने दूसरे डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी। दूसरे डॉक्टर के पास जब बच्चे को दिखाया गया तो डॉक्टर ने कहा कि समस्या कमर में है ना कि पैर में। बे-वज्ह प्लास्टर होने से बच्चे का पैर पीला पड़ था। डॉक्टर ने इलाज के लिए जो रक़म बताया था, उतने पैसे इनके पास नहीं थे। फिर गांवभर के लोगों ने रूपये इकट्ठा कर, इनके बेटे का इलाज करवाया। भगवान की कृपा से अब बच्चा बिल्कुल ठीक है।

भारत की राज-व्यवस्था

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