सोमवार, 17 दिसंबर 2018

समाज को ऐसे कई ' विजय ' की ज़रुरत है!

16 दिसम्बर 2012 की रात को भला कोई कैसे भूल सकता है,क्योंकि उस रात निर्भया के साथ दरिन्दों ने जो किया, वो अब भी हर रोज़ किसी ना किसी रूप में किसी और निर्भया के साथ हो रहा है। निर्भया दरिन्दगी की शिकार तब हुई थी,जब उस आधी रात को एक अॉटो वाले ने उसकी मदद करने से मना कर दिया था, लेकिन निर्भया काण्ड के ठीक 6 साल से एक दिन पहले यानि 15 दिसम्बर को अॉटो चालक परम चन्द और उनके बेटे विजय की एक ज़िम्मेदार नागरिक होने की सोच ने एक सम्भावित घटना को घटने से बचा लिया। बकौल परम चन्द एक स्कूली छात्रा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उनके अॉटो के पास आई। और बोली की उसको मन्दिर घूमना है। परम चन्द लड़की को छत्तरपुर मन्दिर ले गये। वहाँ के बाद लड़की को इण्डिया गेट, पार्लियामेट हाउस, राष्ट्रपति भवन वगैरह-वगैरह घुमाया। फिर लड़की ने कहा कि उसे भूख लगी है,किसी होटल में खाना खाना है। बंगाली मार्केट के एक होटल में खाना खाने के बाद लड़की थोड़ी दूर चलने के बाद अॉटो से उतर जाती है। फिर परम चन्द ने पूछा कि यहाँ क्या काम है? कहाँ जाना है? रात हो जाएगी,फिर क्या करोगी? फिर लड़की ने मण्डी हाउस पर उतारने को कहा। लड़की को मण्डी हाउस छोड़कर परम चन्द अपने घर चले गए। देर रात परम चन्द अपने घर पहुँचकर बेटे विजय को सारी बात बताई।
पिता की बात सुनकर विजय ने कहा कि आपको ऐसे लड़की को अकेले छोड़कर नहीं आना चाहिए था। आपने ग़लत किया है। चलिए चलकर उस लड़की को ढूंढते हैं। रात के 9 बजे विजय अपने पिता के साथ उस लड़की को ढूंढने निकल जाता है। काफ़ी मशक्कत के बाद लड़की अकेले बैठी नज़र आ जाती है। फिर दोनों लड़की के पास पहुँचकर काफ़ी देर तक बातचीत करते हैं। बातचीत के बाद विजय इस बात को लेकर आश्वस्त हो जाता है कि लड़की घर से भागी हुई है और घर से परेशान है। फिर विजय 100 नम्बर पर कॉल करके पुलिस को सूचित करता है। जिसके बाद पुलिस आकर उस लड़की को ले जाती है। काउंसलिंग में पता चला है कि लड़की प्रतापगढ़,यूपी से भागकर आई है और किसी बात को लेकर अपने परिवार से नाराज़ है। फिर पुलिस उसके परिवार वाले को सूचित कर देती है।
पेशे से होमगार्ड का जवान विजय का मानना है कि अगर हम अपने आप को अवेयर नहीं करेंगे, एक्टिव नहीं रहेंगे। लड़कियों के लिए लापरवाही बरतेंगे तो कभी भी कोई घटना घट सकती है। इसलिए एक नागरिक होने के नाते हम सब की ज़िम्मेदारी है कि हम अपनी ज़िम्मेदारियों को समझे।
काश! विजय की सोच हर नागरिक में समा जाता,तो हर 12 मिनट पर एक महिला के साथ बलात्कार नहीं होता है। केन्द्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के साल 2016 के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं से बलात्कार की घटनाओं में पिछले साल के मुक़ाबले 12% का इज़ाफा हुआ है। इसके अलावा अन्य हिंसाओं में 3% का इज़ाफा हुआ है। ये आंकड़ा साल दर साल बढ़ता जा रहा है। साल 2015 में रेप की 34,651 शिकायतें दर्ज हुई थी,जबकि साल 2016 में 38,947 शिकायतें दर्ज हुई। देश की राजधानी दिल्ली एक शहर और एक राज्य के रूप में रेप की घटनाओं में शीर्ष पर काबिज़ है। एक शहर के रूप में दिल्ली में साल 2016 में महिलाओं के प्रति 13803 घटनाएं हुआ,जिसमें से रेप की 1996 घटनाएं घटी,जबकि एक राज्य के रुप में महिलाओं के प्रति 19169 घटनाएँ घटी,जिसमें से रेप की 2155 घटनाएँ घटी है।

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

किसानों का कौन?


हाल ही में देशभर के किसान अपनी माँगों को लेकर दिल्ली में इस उम्मीद से इकट्ठा हुए कि उनकी माँगों को केन्द्र सरकार द्वारा मान लिया जाएगा। लेकिन हुआ वही जो हर बार होता है। किसानों को वापस लौटना पड़ा और उनकी समस्याओं पर चर्चा बन्द हो गई।वो सारे नेता जो किसानों की रैली में हाथ से हाथ जोड़कर फ़ोटो खिंचवाये थें। उनमें से कुछ चुनाव प्रचार में व्यस्त हो गए और कुछ इस उम्मीद में अपने राज्य को लौट गए कि फिर फ़ोटो खिंचवाने का मौका तो आएगा ही।

इस बार किसानों की रैली हर बार की तरह नहीं थी। पहले किसानों की माँग होती थी कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाए,लेकिन इस बार किसानों की माँग थी कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर संसद में बहस हो। जिसमें सिर्फ़ किसानों के क़र्ज या फसल की कीमतों पर ही नहीं,बल्कि समूचे कृषि संकट पर बात हो। साथ ही ऑल इण्डिया किसान संघर्ष समिति द्वारा क़र्जा मुक्ति बिल और एमएसपी का बिल ड्राफ़्ट किया गया था। जिस पर बहस के लिए संसद का कम से कम तीन हफ़्ते का स्पेशल सेशन हो। अब हम सबको उस दिन का इन्तज़ार करना चाहिए कि कब कृषि की समस्याओं पर बहस के लिए संसद का स्पेशल सेशन बुलाया जा रहा है।
किसानों की समस्या वाकई जटिल है,जो एक दिन या एक साल में तो नहीं जाएगा। लेकिन विपक्षी दलों के नेताओं के भाषण सुनने के बाद ऐसा लगता है कि क़र्ज माफ़ी और स्वामीनाथन आयोग के रिपोर्ट में जो एमएसपी तय करने की प्रक्रिया बताई गई है,को लागू कर देने से सारी समस्याओं का निदान हो जाएगा। 30 नवम्बर 2018 के दिन जब किसानों की रैली में राहुल गाँधी,अरविन्द केजरीवाल,सीताराम येचुरी,शरद यादव,फ़ारुक़ अब्दुल्लाह वग़ैरह-वग़ैरह फ़ोटो सेशन से पहले किसानों की क़र्ज माफ़ी को किसानों की समस्या का समाधान बता रहे थें,उसी दिन प्रोफ़ेसर स्वामीनाथन ने अपनी वेबसाइट पर लिखा कि I only feel sorry that in the election politics solutions like loan waiver are given importance. The basic difficulties of farmers can be overcome only if integrated attention is given to pricing, procurement and public distribution. Compounding the difficulties of today,farmers are facing serious problems from climate change. क्या आपने कभी किसी नेता को बदले मौसम से किसानों को होने वाली समस्याओं पर बात करते सुना है? क्यों सुख़ाग्रस्त इलाक़ों से किसानों के द्वारा जल संचय की प्रक्रिया अपनाने की बड़े पैमाने पर कोई तस्वीरें सामने नहीं आती है? सुखाग्रस्त इलाक़ों के किसानों को भी सोचना पड़ेगा कि उनके इलाक़े में पानी का जलस्तर कैसे बढ़ेगा?
मोदी सरकार ने किसानों की क़र्ज माफ़ी और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में  एमएसपी तय करने की प्रक्रिया पर अपना रुख़ पहले ही साफ़ कर दिया है। साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाख़िल करके कह दिया था कि लागत पर 50 प्रतिशत अधिक नहीं दिया जा सकता,क्योंकि ये बाज़ार ख़राब कर देगा। Indiatvpaisa.com पर 20 जून 2017 को ही छपा है कि जब पंजाब सरकार ने 10 लाख़ किसानों के क़र्ज माफ़ किए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। तब केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साफ़-साफ़ कह दिया था कि केन्द्र सरकार किसानों के क़र्ज माफ़ किए जाने के प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है। इससे पहले जब महाराष्ट्र और यूपी सरकार ने भी किसानों की क़र्ज माफ़ी का एलान किया था, तब 12 जून को भी वित्त मंत्री ने कह दिया था कि केन्द्र राज्यों को क़र्ज माफ़ी के लिए सहायना नहीं देगा और अगर वे ऋण माफ़ करते हैं तो उसके लिए धन की व्यवस्था उन्हें अपने कोष से करनी पड़ेगी।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी हर राज्य के चुनावी भाषण में कह रहें है कि अगर कांग्रेस की सरकार बनी तो 10 दिनों के भीतर किसानो का क़र्ज माफ़ करेंगे। लेकिन वर्तमान में जिस राज्य में उनकी सरकार है,वहाँ क्या हालत ये जानना ज़रूरी है। 17 मई 2018 के एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ 24 घंटे के भीतर पंजाब के भठिंडा ज़िले के अलग-अलग गाँवों के 5 किसानों ने क़र्ज की वजह से आत्महत्या कर ली और किसी भी मृतक परिवार से मिलने पंजाब का एक भी मंत्री नहीं गया। पंजाब में ही गन्ना किसान लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। 05 नवम्बर 2018 की रिपोर्ट है कि कर्नाटक में किसानों द्वारा क़र्ज चुकाने में देरी की वजह से बैंकों द्वारा अरेस्ट वारंट भेजा जा रहा है। जिसको लेकर किसान गुस्से में हैं और विधानसभा को घेरने की धमकी भी दिए हैं।
स्वामीनाथन आयोग ने यूपीए-1 के कार्यकाल में चार रिपोर्ट क्रमश: दिसम्बर 2004,अगस्त 2005,दिसम्बर 2005 और अप्रैल 2006 में सौंप दिए थें। अक्टूबर 2006 में अन्तिम और पांचवे रिपोर्ट को सौंपते वक़्त कहा था कि यदि 11 वर्षीय प्लान के साथ काम किया गया तो कृषि में जल्दी और अच्छी विकास होगी। लेकिन कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में किसानों के लिए क्या किया कौन नहीं जानता है।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

कांग्रेस,एनसी और पीडीपी को इन सवालों का भी जवाब देना चाहिए।

बुधवार की रात क़रीब 8 बजे पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ़्ती के एक ट्वीट के बाद जम्मू-कश्मीर की राजनीति में भूचाल आ गया था। क़रीब 5 महीनें के बाद राज्य में सरकार बनाने को लेकर उन सभी की ख़ामोशी घंटेभर के लिए टूट गए,जिनकी ज़िम्मेदारी थी राज्य में सरकार बनाने की। लेकिन राज्य के वर्तमान मुखिया को अचानक से टूटी ख़ामोशी राश नहीं आई। और वो किया जो उनको राज्य के लिए बेहतर लगा। राज्यपाल के द्वारा विधानसभा भंग करने को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब, गुरुवार को राज्यपाल सत्य पाल मलिक ने ख़ुद दिया है। उन्होंने कहा है कि मैंने ये काम जम्मू-कश्मीर के संविधान में जो व्यवस्था है,उसके तहत किया है। जिस दिन मैं यहाँ का राज्यपाल बना, उस दिन से ही मैं चाहता था कि जम्मू-कश्मीर में चुनी हुई सरकार काम करें। लेकिन मेरे राज्यपाल बनने से अब तक कोई भी सरकार बनाने के लिए एक बार भी मिलने नहीं आया। 15-20 दिनों से रिपोर्टस आ रही थी कि यहाँ बहुत बड़े पैमाने पर विधायको को डराया जा रहा है, धमकी दी जा रही है और अलग-अलग तरीक़े के अंडरहैण्ड काम चल रहे थे। महबूबा जी ने ख़ुद मुझे एक हफ्ता पहले फ़ोन करके कहा कि मेरे एमएलएस को एनआईए की डर से डराया जा रहा है। दूसरे पक्ष के लोगों ने कहा कि बहुत बड़े पैमाने पर रुपये का लालच दिया जा रहा है। मतलब हॉर्स ट्रेडिंग 20 दिन पहले ही शुरु हो चुकी थी। इसलिए मैंने किसी को भी मौक़ा नहीं दिया। अगर किसी भी पक्ष को मौका देता और उसको जो टाइम देता उसमे और बड़े पैमाने पर हॉर्स ट्रेडिंग होती। और यहाँ का पूरा पॉलिटिकल वैल्यू सिस्टम ख़त्म हो जाता। जिस तरीक़े से दूसरे स्टेटस में होता है। इसलिए मैं वो अफ़ोर्ड नहीं कर सकता था।
राज्यपाल के द्वारा उठाए गए कदम की शोर में अबतक कई ऐसे सवाल हैं, जिसका जवाब ना तो कांग्रेस, ना ही  पीडीपी और ना ही एनसी ने दिया है। इन पार्टी के बयानवीरों को ये बताना चाहिए था कि-
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तमाम राजनीतिक मतभेदों के बावजूद घंटेभर में ऐसा क्या हो गया कि वो कांग्रेस, जो पीडीपी और बीजेपी की गठबंधन की सरकार थी, तो पीडीपी पर एक भी हमले का मौक़ा नहीं छोड़ती थी। उसके साथ सरकार बनाने को तैयार हो गई?

- विधानसभा भंग होने के बाद वृहस्पतिवार को नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्लाह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्पस्ट किया कि एनसी का अपने ऐतिहासिक विरोधी पीडीपी के साथ असेम्बली इलेक्शन लड़ने का कोई इरादा नहीं है। अब्दुल्लाह ने ये भी कहा हम लोगों ने राज्यपाल को कोई पत्र नहीं भेजा है। राज्यपाल के विधानसभा को भंग करने वाले कदम को चुनौती देने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी पीडीपी की है। अब यहाँ सवाल है कि  इन दो ऐतिहासिक विरोधी पार्टियों में क्या रायशुमारी हुई थीकि सरकार बनाने को तैयार हो गये थे?

- इन तीनों दलों ने संवैधानिक प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई। श्रीनगर से जम्मू की दूरी हवाई जहाज़ से मुश्किल से घंटेभर की भी नहीं है। फिर क्यों नहीं अपने प्रतिनिधि को राज्यपाल के पास भेजा? राज्यपाल को सरकार बनाने की कोई सबूत क्यों नहीं दी? किसी ने कोई एमएलएस की परेड नहीं कराई?

- क्या ये तीनों पार्टियां नहीं जानती है कि सरकार सोशल मीडिया से नहीं बनती है?

- क्या तीनों दलों के नेताओं बीच कोई मीटिंग हुई? महबूबा मुफ्ती के ट्वीटर पर सरकार के गठन की जानकारी देने से पहले, क्या कोई रणनीति बनाई गई थी? यदि ऐसा कुछ भी हुआ तो मीडिया में ख़बरें क्यों नहीं आई?

- जब तीनों दलों को ऐसा लग रहा है कि राज्यपाल ने ग़लत किया है, तो विधानसभा के भंग हुए क़रीब 48 घंटे और राज्यपाल को ये बात 'मैं चाहता हूँ कि वो कोर्ट में जाएँ।उनका अधिकार है। उन्हें कोर्ट जाना चाहिए' कहे हुए क़रीब 24 घंटे से भी ज़्यादा हो गए है। लेकिन अब तक सिर्फ़ बयानबाज़ी के अलावा कोई न्यायालय की तरफ़ रूख़ क्यों नहीं किया?

शनिवार, 4 अगस्त 2018

कांग्रेस से अपमान का बदला सत्ता से बेदखल करके!

फ़ोटो क्रेडिट- इण्डिया टुडे
इतिहास से वर्तमान तक भारतीय राजनीति में कई ऐसी घटनाएं हैंजिसको जानने के बाद लगता है कि ये नहीं होना चाहिए था। लेकिन सत्ता की हनक और कुर्सी की चाहत ऐसी होती है कि क़ानून और मर्यादा को ताक़ पर रखकर जनहित और जन भावनाओं से खिलवाड़ करने में सियासी दल गुरेज नहीं करते हैं। 80 के दशक की ऐसी ही एक घटना है आन्ध्र प्रदेश की। जब देश में कहीं अलग राज्य,कहीं देश से अलग देश, तो राज्यों के भीतर हीं कुछ इलाकों की स्वायत्तता की मांग चल रही थी। उसी दौर में कांग्रेस के पुराने गढ़ आन्ध्र प्रदेश के लोग कांग्रेस के रवैये से नाराज़ चल रहे थें। आन्ध्र के लोग इस बात से नाराज़ थे कि केन्द्र की तरफ़ से बार-बार क्यों मुख्यमंत्री थोपा जा रहा है। राजनीति मेंयस मैनकी पूछ होती हैशायद इसी वजह से इन्दिरा गांधी ने 1978-1982 के बीच कम से कम चार बार मुख्यमंत्री बदल दिए।
फ़रवरी 1982 में राजीव गांधी के निजी यात्रा के दौरान, स्वागत के लिए कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री टी अंजय्या अपने समर्थकों की भीड़ के साथ बेगमपेट हवाई अड्डा,हैदराबाद पर स्वागत करने गए थें। हवाई अड्डे पर हीं राजीव गांधी ने टी अंजय्या को उनके ही समर्थकों के बीच इतनी फ़टकार लगाई कि उनके आंखों में आंसू गए। मुख्यमंत्री को यह अपमान तो निजी तौर पर महसूस हुआ ही, साथ ही तेलुगु मीडिया ने इसे तेलुगु गौरव के अपमान की तरह पेश किया। तेलुगु गौरव के अपमान से उत्तेजित लोगों ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने का फ़ैसला ले लिया। तेलुगु फ़िल्मों के महानायक एन.टी. रामाराव ने अपने 60 वें जन्मदिन पर एक क्षेत्रीय पार्टी 'तेलुगु देशम पार्टी' का गठन किया। यह पार्टी क़रीब 6 करोड़ तेलुगु भाषी लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की रक्षा के लिए बनाई गई थी। एनटीआर ने कहा कि अब आगे से आन्ध्र प्रदेश जैसा गौरवशाली राज्य कांग्रेस पार्टी के शाखा कार्यालय की तरह काम नहीं करेगा।
साल 1982 के अन्त में राज्य विधानसभा का चुनाव होना था। एनटीआर ने राज्यभर में घुम-घुमकर कांग्रेस के भ्रष्ट शासन के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द की। रथ के आकार की एक गाड़ी से राज्यभर का दौरा किया। चुनाव में रथ इस्तेमाल करने वाले पहले नेता थें एनटीआर। रथ का नाम चैतन्य रथम था। एनटीआर वहां के लोगों से विश्वविद्यालय और राज्य की नौकरियों में वरियता देने का वादा किया। इनको सुनने के लिए जनसभाओं में महिलाओं की भी भारी भीड़ उमड़ती थी। जनसभाओ में वे अचानक हीं गाड़ी के ऊपर प्रकट होते थे, जिसका मंच एक जेनरेटर के सहारे ऊपर उठा होता था। जिस भगवा का डर दिखाकर वर्तमान में कांग्रेस राजनीति करती है, वही भगवा वस्त्र धारण करके एनटीआर ने चुनाव प्रचार किया। भगवा सन्यास का प्रतीक होता है। एनटीआर के भगवा धारण करने का मतलब था कि उन्होंने जनता की सेवा के लिए अपने फ़िल्मी करियर को छोड़ दिया है।
राज्य विधानसभा चुनाव में तेलुगु देशम पार्टी ने दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। जनवरी 1983 के दूसरे सप्ताह में रामाराव के हैदराबाद के फ़तेह मैदान में आन्ध्र प्रदेश के 10 वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई। शपथ ग्रहण समारोह  में क़रीब दो लाख़ लोगों की भीड़ जुटी। एक समाजवादी ने कहा था- अगर प्रधानमंत्री सोचती हैं कि वह खुद हीं हिन्दुस्तान हैंतो एनटीआर भी क़रीब 6 करोड़ लोगों के एकमात्र प्रतिनिधि हैं।

भारत की राज-व्यवस्था

- भारत के संविधान को बनने में 2 वर्ष 11 माह और 18 दिन लगे थे। -1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन हुआ। - महारानी एलिजाबेथ प्र...